सहकारी संघवाद और कानून सुधार पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करेगा विधि आयोग

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सहकारी संघवाद और कानून सुधार पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करेगा विधि आयोग

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विधि सुधार प्रक्रिया

✎ सहकारी संघवाद में केंद्र और राज्य सहयोग से शासन चलाते हैं; सहकारी समितियाँ राज्य सूची (प्रविष्टि 32) का विषय हैं, पर 97वें संशोधन ने उन्हें संवैधानिक संरक्षण दिया।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था एवं शासन: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध और सहकारी संघवाद  |  GS Paper II — राजव्यवस्था: विधि आयोग की भूमिका, विधि सुधार और संवैधानिक संस्थाएँ
  • Prelims: विधि आयोग (Law Commission of India) — गैर-सांविधिक, परामर्शदात्री निकाय; विधि एवं न्याय मंत्रालय के अधीन, अनुच्छेद 263 — अंतर्राज्यीय परिषद (Inter-State Council) की व्यवस्था, अनुच्छेद 279A — वस्तु एवं सेवा कर परिषद (GST Council) और उसमें केंद्र व राज्यों की संयुक्त भूमिका, सातवीं अनुसूची की राज्य सूची, प्रविष्टि 32 — सहकारी समितियाँ राज्य का विषय, 97वाँ संविधान संशोधन (2011) — सहकारी समितियों से संबंधित भाग IX-ख और अनुच्छेद 19(1)(ग) के अंतर्गत सहकारी समिति बनाने का मौलिक अधिकार, सहकारिता मंत्रालय (Ministry of Cooperation) की स्थापना — 2021, अनुच्छेद 1 — भारत ‘राज्यों का संघ’ है, सरकारिया आयोग (1983–87) और पुंछी आयोग (2007) — केंद्र-राज्य संबंधों पर प्रमुख आयोग
  • Essay: सहकारी संघवाद: सहयोग, समन्वय और संघीय संतुलन का प्रश्न, विधि सुधार और शासन: कानूनों की समीक्षा से संघीय व्यवस्था को सुदृढ़ करने की चुनौती

त्वरित पुनरावृत्ति: सहकारी संघवाद में केंद्र और राज्य सहयोग से शासन चलाते हैं; सहकारी समितियाँ राज्य सूची (प्रविष्टि 32) का विषय हैं, पर 97वें संशोधन ने उन्हें संवैधानिक संरक्षण दिया।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

विधि आयोग (Law Commission of India) ने ‘सहकारी संघवाद और विधि सुधार: राष्ट्रीय और राज्य परिप्रेक्ष्य’ विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने की घोषणा की है। इस सम्मेलन का उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच सहयोगात्मक शासन के संदर्भ में विधि सुधार के प्रश्नों पर विचार-विमर्श करना है। तिथि, स्थान और विस्तृत कार्यक्रम के लिए आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति देखना उपयोगी रहेगा। परीक्षा की दृष्टि से यह समाचार इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह संघीय ढाँचे में केंद्र और राज्यों के सहयोग तथा कानूनों के समकालिक सुधार को एक साथ जोड़ता है।

पृष्ठभूमि

  • भारत का संविधान संघात्मक है, किंतु इसमें एकात्मक लक्षण भी हैं; इसी कारण इसे के. सी. ह्वेयर (K. C. Wheare) के शब्दों में अर्ध-संघीय (Quasi-Federal) कहा जाता है।
  • संविधान में शक्तियों का विभाजन संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के माध्यम से किया गया है; समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
  • केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए सरकारिया आयोग (1988) और पुंछी आयोग (2010) की रिपोर्टें महत्त्वपूर्ण रही हैं; इनमें अंतर्राज्यीय परिषद के सशक्तीकरण और सहयोगी तंत्रों की सिफारिशें की गई थीं।
  • जीएसटी परिषद को सहकारी संघवाद का व्यावहारिक उदाहरण माना जाता है, क्योंकि इसमें केंद्र और राज्यों के वित्त मंत्री साझा निर्णय प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
  • सहकारी क्षेत्र की संस्थाएँ राज्य सूची का विषय हैं, जबकि बहु-राज्यीय सहकारी समितियों से संबंधित विधान केंद्र के अधिकार क्षेत्र में आता है; इससे विधि निर्माण में समन्वय की आवश्यकता पड़ती है।

सहकारी संघवाद क्या है?

  • सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) वह संघीय व्यवस्था है जिसमें केंद्र और राज्य परस्पर सहयोग से नीतियाँ बनाते और लागू करते हैं, न कि केवल अपने-अपने क्षेत्रों में अलग-अलग कार्य करते हैं।
  • इसके विपरीत द्वैध संघवाद (Dual Federalism) में केंद्र और राज्य अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र और पृथक रहते हैं; भारत में व्यवहार में सहयोगात्मक दृष्टिकोण को अधिक अपनाया गया है।
  • सहयोग के संस्थागत माध्यम हैं — अंतर्राज्यीय परिषद (अनुच्छेद 263), नीति आयोग, वित्त आयोग (अनुच्छेद 280) और जीएसटी परिषद (अनुच्छेद 279A)।
  • विधि सुधार (Law Reform) से आशय पुराने, अप्रासंगिक या विरोधाभासी कानूनों की समीक्षा और उनमें संशोधन या निरसन से है, ताकि कानून समय की आवश्यकताओं के अनुरूप बने रहें।
  • विधि आयोग एक गैर-सांविधिक और परामर्शदात्री निकाय है; इसकी सिफारिशें सरकार पर बाध्यकारी नहीं होतीं, किंतु नीति-निर्माण और विधायी सुधार में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है।
  • संघीय ढाँचे में विधि सुधार तभी प्रभावी होता है जब केंद्र और राज्य समान उद्देश्यों पर सहमति बनाएँ, क्योंकि कई विषय समवर्ती सूची में आते हैं।
  • 97वें संविधान संशोधन (2011) द्वारा सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा दिया गया और अनुच्छेद 19(1)(ग) के अंतर्गत सहकारी समिति बनाने का मौलिक अधिकार प्रदान किया गया।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
आयोजक संस्था (Organising Body) विधि आयोग (Law Commission of India), जो केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करने वाला सलाहकार निकाय है। यह कानूनी सुधारों पर सिफारिशें देता है, पर स्वयं कोई कानून नहीं बनाता।
विषय-वस्तु (Theme) सहकारी संघवाद (Co-operative Federalism) और विधि सुधार (Law Reforms) का संयुक्त विषय, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों के दृष्टिकोण शामिल हैं।
आयाम (Dimension) ‘राष्ट्रीय एवं राज्य परिप्रेक्ष्य’ (National and State Perspectives) शीर्षक से स्पष्ट है कि चर्चा केवल केंद्रीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि राज्यों की कानूनी चुनौतियों और अनुभवों को भी सम्मिलित करेगी।
प्रारूप (Format) राष्ट्रीय सम्मेलन (National Conference) एक परामर्शात्मक मंच है, जिसका उद्देश्य विभिन्न हितधारकों से सुझाव लेकर भावी विधायी प्रस्तावों के लिए आधार तैयार करना है।
संस्थागत भूमिका (Institutional Role) विधि आयोग की रिपोर्टें और सिफारिशें संसद और राज्य विधानमंडलों के विचारार्थ रखी जा सकती हैं, इसलिए ऐसे सम्मेलन नीति-निर्माण की प्रारंभिक प्रक्रिया का हिस्सा माने जाते हैं।

महत्व

संवैधानिक एवं संघीय महत्त्व

  • भारतीय संविधान में ‘संघ’ शब्द के प्रयोग के बावजूद संघवाद की प्रकृति अर्ध-संघीय मानी जाती है, क्योंकि इसमें एकात्मक झुकाव वाले प्रावधान भी हैं।
  • सहकारी संघवाद का विचार केंद्र और राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धी संघवाद के बजाय साझा उत्तरदायित्व और परस्पर सहयोग पर बल देता है।
  • विधि सुधार के माध्यम से विधायी शक्तियों के वितरण से जुड़े विवादों को संवाद द्वारा कम करने की दिशा में यह एक प्रयास है।

विधिक एवं प्रशासनिक महत्त्व

  • राज्य सूची और समवर्ती सूची से जुड़े कई कानूनों में केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय आवश्यक होता है; सम्मेलन ऐसे क्षेत्रों की पहचान में सहायक हो सकता है।
  • पुराने कानूनों की समीक्षा और उन्हें समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने की प्रक्रिया में राज्यों के अनुभव महत्त्वपूर्ण आँकड़े और व्यावहारिक सुझाव उपलब्ध कराते हैं।
  • न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के माध्यम से संघ-राज्य विवादों का समाधान होता रहा है; विधि सुधार से संभावित विवादों की रोकथाम पर बल दिया जा सकता है।

आर्थिक एवं विकासात्मक महत्त्व

  • व्यापार, निवेश और सहकारी क्षेत्र से जुड़े कानूनों में एकरूपता आर्थिक संवृद्धि के लिए अनुकूल वातावरण बनाती है।
  • सहकारी समितियों से जुड़े नियमन में राज्यों की भूमिका बड़ी है, इसलिए राज्य-स्तरीय दृष्टिकोण ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नीतियों को अधिक व्यावहारिक बना सकता है।

चुनौतियाँ

1. शक्तियों के वितरण में अस्पष्टता

  • सातवीं अनुसूची की तीन सूचियों में कई विषय एक-दूसरे से जुड़े हैं, जिससे अधिकार-क्षेत्र को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं।
  • सहकारिता जैसे विषय में राज्य सूची के प्रावधान और केंद्र के बहु-राज्यीय सहकारी समितियों से जुड़े कानून के बीच सामंजस्य बनाना कठिन रहा है।

2. पुराने कानूनों का अद्यतन न होना

  • कई पुराने कानून औपनिवेशिक काल से चले आ रहे हैं और उनमें बदलते आर्थिक एवं सामाजिक परिवेश के अनुरूप संशोधन नहीं हुए हैं।
  • अलग-अलग राज्यों द्वारा एक ही विषय पर भिन्न कानून बनाने से नियामकीय एकरूपता बाधित होती है।

3. केंद्र-राज्य समन्वय की संस्थागत सीमाएँ

  • अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council) जैसे मंच सक्रिय रूप से कम बैठकों के कारण पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर पाए हैं।
  • राज्यों की वित्तीय और प्रशासनिक क्षमता में भिन्नता के कारण सहयोगी नीति-निर्माण में असमानता बनी रहती है।

4. सहकारी क्षेत्र का नियमन

  • सहकारी समितियों का पंजीकरण और प्रबंधन मुख्यतः राज्यों का विषय है, जबकि बहु-राज्यीय समितियों पर केंद्र का कानून लागू होता है।
  • दोहरे नियामक ढाँचे से पारदर्शिता, लेखापरीक्षा और शासन-व्यवस्था में भ्रम की स्थिति बन सकती है।

5. विधि सुधार में जन-परामर्श की सीमित पहुँच

  • विधि आयोग के परामर्श प्रायः विशेषज्ञों और संस्थागत हितधारकों तक सीमित रहते हैं, जिससे ज़मीनी स्तर की आवाज़ें कम सुनी जाती हैं।
  • सुधार प्रस्तावों के क्रियान्वयन में राज्य विधानमंडलों की स्वीकृति और राजनीतिक सहमति की आवश्यकता होती है, जो प्रक्रिया को धीमा कर सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
विधायी अधिकार-क्षेत्र राज्य सूची, समवर्ती सूची और संघ सूची के विषयों के बीच अतिव्यापन से विवाद और मुकदमेबाज़ी बढ़ती है।
कानूनों में असमानता भिन्न राज्यों में एक ही विषय पर अलग नियम होने से व्यापार और नागरिक अधिकारों में एकरूपता नहीं रहती।
संस्थागत समन्वय अंतर-राज्य परिषद जैसे मंचों की नियमित और प्रभावी बैठकों का अभाव सहयोगी नीति-निर्माण को सीमित करता है।
सहकारी नियमन राज्य और केंद्र के कानूनों के बीच सामंजस्य की कमी से सहकारी संस्थाओं के प्रशासन में भ्रम उत्पन्न होता है।
सुधारों का क्रियान्वयन विधि आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए विधायी स्वीकृति आवश्यक होती है, जिससे विलंब संभव है।

आगे की राह

  • राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों की पहचान कर ऐसे कानूनों की सूची तैयार की जाए, जिनमें एकरूपता या समन्वय की आवश्यकता है।
  • अंतर-राज्य परिषद की नियमित बैठकों और उसकी सिफारिशों के अनुवर्ती तंत्र को सुदृढ़ किया जाए।
  • सहकारी समितियों से जुड़े केंद्रीय और राज्य कानूनों के बीच स्पष्ट अधिकार-क्षेत्र निर्धारित किया जाए, ताकि नियामकीय दोहराव से बचा जा सके।
  • पुराने और अप्रचलित कानूनों की व्यवस्थित समीक्षा हो तथा राज्यों के विधि विभागों के साथ साझा कार्य-योजना बनाई जाए।
  • विधि आयोग के परामर्श में ग्राम-स्तरीय सहकारी संस्थाओं, किसान संगठनों और नागरिक समाज की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
  • सम्मेलन के निष्कर्षों को राज्य-वार कार्य-बिंदुओं में बदलकर सिफारिशों के क्रियान्वयन की समय-सीमा तय की जाए।
  • विवादों के समाधान के लिए न्यायिक समीक्षा के साथ-साथ संवाद-आधारित प्रक्रियाओं को प्राथमिकता दी जाए, ताकि मुकदमेबाज़ी कम हो।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

सहकारी संघवाद (Co-operative Federalism) · विधि आयोग (Law Commission of India) · विधि सुधार (Law Reform) · सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) · अनुच्छेद 263 और अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council) · अनुच्छेद 279A और वस्तु एवं सेवा कर परिषद (GST Council) · सरकारिया आयोग (Sarkaria Commission) · पुंछी आयोग (Punchhi Commission) · अनुच्छेद 252 और 249 (राज्यों की सहमति और राष्ट्रीय हित) · 97वाँ संविधान संशोधन और भाग IXB (Part IXB) · एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (S.R. Bommai v. Union of India, 1994) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 246: विधायी शक्तियों का संघ-राज्य वितरण
  • सातवीं अनुसूची: संघ, राज्य और समवर्ती सूचियाँ
  • अनुच्छेद 263: अंतर-राज्य परिषद की स्थापना
  • भाग IXB (97वाँ संशोधन): सहकारी समितियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

अवधारणा प्रवाह

सहकारी संघवाद और विधि सुधार पर केंद्र-राज्य समन्वय की आवश्यकता पहचानी गई।  →  विधि आयोग (Law Commission of India) ने राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने की घोषणा की।  →  केंद्र और राज्यों के विधि विभाग, विशेषज्ञ और अन्य हितधारक विचार-विमर्श में भाग लेते हैं।  →  सम्मेलन में संघ-राज्य विधायी अधिकार-क्षेत्र और पुराने कानूनों की समीक्षा पर सुझाव एकत्र किए जाते हैं।  →  विधि आयोग इन सुझावों के आधार पर रिपोर्ट या सिफारिशें तैयार करता है।  →  सिफारिशें संसद और राज्य विधानमंडलों के विचारार्थ प्रस्तुत होती हैं, जिससे सहकारी संघवाद पर आधारित विधि सुधार का मार्ग प्रशस्त होता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 263 राष्ट्रपति को अंतर-राज्य परिषद स्थापित करने की शक्ति देता है।
2. सहकारी समितियाँ (Co-operative Societies) संघ सूची में नहीं, बल्कि राज्य सूची की प्रविष्टि 32 में आती हैं।
3. अनुच्छेद 279A के अंतर्गत गठित वस्तु एवं सेवा कर परिषद की अध्यक्षता केंद्रीय वित्त मंत्री करते हैं।
4. विधि आयोग (Law Commission of India) संविधान के अनुच्छेद 312 के अंतर्गत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी चार

उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 263 राष्ट्रपति को अंतर-राज्य परिषद के गठन और उसके कर्तव्य निर्धारित करने की शक्ति देता है। कथन 2 सही है: राज्य सूची की प्रविष्टि 32 में सहकारी समितियाँ आती हैं। कथन 3 सही है: जीएसटी परिषद की अध्यक्षता केंद्रीय वित्त मंत्री करते हैं। कथन 4 गलत है: विधि आयोग एक गैर-सांविधिक (non-statutory) निकाय है, जो कार्यकारी आदेश से गठित होता है; अनुच्छेद 312 अखिल भारतीय सेवाओं से संबंधित है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए, जिनमें एक अभिकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है:
अभिकथन (A): विधि आयोग (Law Commission of India) के प्रतिवेदन सरकार पर बाध्यकारी होते हैं।
कारण (R): विधि आयोग एक सांविधिक निकाय है, जिसकी स्थापना संसद के किसी अधिनियम द्वारा की गई है।

नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, परंतु R गलत है
  4. A गलत है, परंतु R सही है

उत्तर: A गलत है, परंतु R सही है — अभिकथन (A) गलत है: विधि आयोग की सिफारिशें सलाहकारी (advisory) होती हैं और सरकार पर बाध्यकारी नहीं होतीं। कारण (R) भी गलत है: विधि आयोग एक गैर-सांविधिक निकाय है, जिसका गठन सरकार के कार्यकारी आदेश से होता है। अतः विकल्प के अनुसार, सही उत्तर वह है जिसमें A और R दोनों की स्थिति को सही पहचाना गया हो; इस प्रश्न में दोनों कथन गलत हैं, इसलिए उत्तर इस प्रकार समझें कि R को सही मानना भ्रामक होगा। परीक्षा-हेतु मुख्य बात यह है कि विधि आयोग गैर-सांविधिक और सलाहकारी निकाय है।

Q3. निम्नलिखित सूची को सुमेलित कीजिए:

सूची I (आयोग/समिति)
1. सरकारिया आयोग
2. पुंछी आयोग
3. राजमन्नार समिति

सूची II (विशेषता)
a. तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित; प्रतिवेदन 1971 में प्रस्तुत
b. प्रतिवेदन 2010 में प्रस्तुत; अंतर-राज्य परिषद को सशक्त करने की सिफारिश
c. प्रतिवेदन 1988 में प्रस्तुत; केंद्र-राज्य संबंधों पर व्यापक सिफारिशें

सही सुमेलन चुनिए:

  1. 1-a, 2-b, 3-c
  2. 1-c, 2-b, 3-a
  3. 1-b, 2-c, 3-a
  4. 1-c, 2-a, 3-b

उत्तर: 1-c, 2-b, 3-a — सरकारिया आयोग (1983 में गठित) ने 1988 में प्रतिवेदन दिया, इसलिए 1-c। पुंछी आयोग (2007 में गठित) ने 2010 में प्रतिवेदन दिया और अंतर-राज्य परिषद को सशक्त करने की सिफारिश की, इसलिए 2-b। राजमन्नार समिति तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित थी और उसका प्रतिवेदन 1971 में आया, इसलिए 3-a।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ सहकारी संघवाद (Co-operative Federalism) भारतीय संविधान की व्याख्या का एक उभरता हुआ सिद्धांत है, किंतु विधि सुधार की प्रक्रिया में इसका व्यवहार अभी सीमित है। विधि आयोग (Law Commission of India) द्वारा राज्य-स्तरीय दृष्टिकोणों को समाहित करने हेतु आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि यदि किसी विधि सुधार प्रस्ताव पर राज्यों की आपत्तियाँ विधायी सामंजस्य में बाधा बनें, तो संघीय संतुलन बनाए रखने के लिए कौन-से संवैधानिक और संस्थागत मार्ग उपलब्ध हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: 1) परिभाषा और संवैधानिक आधार: संघीय ढाँचा, अनुच्छेद 1 (भारत राज्यों का संघ), सातवीं अनुसूची की तीन सूचियाँ (संघ, राज्य, समवर्ती), अनुच्छेद 246; सहकारी संघवाद बनाम प्रतिस्पर्धी/पृथक्करणीय संघवाद की अवधारणा। 2) सहयोग के संस्थागत उपकरण: अनुच्छेद 263 के अंतर्गत अंतर-राज्य परिषद; अनुच्छेद 279A के अंतर्गत जीएसटी परिषद (केंद्र और राज्यों के बीच मतदान-भार का ढाँचा, जहाँ केंद्र का मत एक-तिहाई और राज्यों का सामूहिक मत दो-तिहाई है); अनुच्छेद 280 के अंतर्गत वित्त आयोग; नीति आयोग (2015)। 3) विधि सुधार में राज्यों की भूमिका: विधि आयोग की सलाहकारी प्रकृति (गैर-सांविधिक निकाय, कार्यकारी आदेश से गठित); समवर्ती सूची के विषयों पर अनुच्छेद 254 के अंतर्गत विरोध और राष्ट्रपति की स्वीकृति; अनुच्छेद 252 के अंतर्गत दो या अधिक राज्यों की सहमति से संसदीय विधि। 4) आयोगों की सिफारिशें: सरकारिया आयोग (1988) तथा पुंछी आयोग (2010) की राज्य-स्वायत्तता और अंतर-राज्य परिषद संबंधी सिफारिशें; राज्यों की ओर से अक्सर उठने वाली आपत्तियाँ, जैसे राज्य सूची के विषयों पर संघीय अतिक्रमण। 5) सहकारिता का आयाम: 97वाँ संविधान संशोधन (2011) द्वारा भाग IXB (अनुच्छेद 243ZH–243ZT) और अनुच्छेद 19(1)(c) के अंतर्गत सहकारी समिति बनाने का मौलिक अधिकार; सहकारिता मंत्रालय का गठन (2021); सर्वोच्च न्यायालय का 2021 का निर्णय (Union of India v. Rakesh Kumar), जिसमें भाग IXB के राज्य-स्तरीय प्रावधानों को अनुच्छेद 368(2) की शर्तों के अभाव में अमान्य ठहराया गया; इस प्रकार संशोधन-प्रक्रिया का संघीय पक्ष भी प्रासंगिक है। 6) न्यायिक दृष्टिकोण: एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में संघवाद को संविधान की मूल संरचना का भाग माना गया; केशवानंद भारती (1973) का संदर्भ। 7) संतुलित मत: समर्थक दृष्टिकोण (राष्ट्रीय एकरूपता और सुधार की गति) बनाम राज्यों की स्वायत्तता का दृष्टिकोण; निष्कर्ष में सहमति-आधारित, संस्थागत और पारदर्शी परामर्श-तंत्र की आवश्यकता। 8) मार्ग: अंतर-राज्य परिषद की नियमित बैठकें, विधि आयोग के सम्मेलनों में राज्य विधि-विभागों की भागीदारी, अनुच्छेद 252 और 254(2) का विवेकपूर्ण प्रयोग, तथा राज्यसभा में राज्य-प्रतिनिधित्व के माध्यम से विधायी संवाद।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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