02 Oct सुपर एल नीनो अभियान क्यों है जरूरी? जानिए भारत पर प्रभाव
✎ अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि है, जो वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करता है और भारत में अक्सर कमजोर मानसून तथा सूखे का कारण बनता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारतीय भूगोल, विश्व भूगोल) | GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी (जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन), भारतीय अर्थव्यवस्था (कृषि)
- Prelims: अल नीनो, ला नीना, भारतीय मानसून, विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO), राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA), समुद्री सतह का तापमान, जलवायु परिवर्तन, सूखा, खाद्य सुरक्षा
- Essay: जलवायु परिवर्तन और भारत की कृषि अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव, आपदा प्रबंधन: भारत के लिए चुनौतियाँ और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि है, जो वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करता है और भारत में अक्सर कमजोर मानसून तथा सूखे का कारण बनता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) सहित प्रतिष्ठित वैश्विक वैज्ञानिक संस्थानों ने वर्ष 2026 में एक ‘सुपर अल नीनो’ घटना की उच्च संभावना व्यक्त की है, जिसके 2027 के वसंत तक जारी रहने का अनुमान है। प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में 2°C से अधिक की वृद्धि की आशंका है, जो एक दुर्लभ और गंभीर घटना मानी जा रही है। संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि यह ‘सुपरसाइज्ड’ अल नीनो वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं पर भारी प्रभाव डाल सकता है। भारत के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि अल नीनो का भारतीय मानसून पर सीधा और गहरा प्रभाव पड़ता है, जिससे सूखे और खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) का खतरा बढ़ जाता है।
पृष्ठभूमि
- अल नीनो एक जटिल मौसम पैटर्न है जो प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि से जुड़ा है। यह घटना वैश्विक मौसम प्रणालियों को प्रभावित करती है।
- भारतीय मानसून, विशेषकर दक्षिण-पश्चिम मानसून, अल नीनो की घटनाओं से निकटता से जुड़ा हुआ है। मजबूत अल नीनो अक्सर भारत में सूखे की स्थिति पैदा करता है।
- अतीत में, 1972, 2002 और 2009 जैसे वर्षों में, भारत ने मजबूत अल नीनो के साथ-साथ गंभीर सूखे का अनुभव किया है।
- वैश्विक तापन (Global Warming) के दीर्घकालिक रुझान के कारण चरम मौसमी घटनाएँ (Extreme Weather Events) बढ़ रही हैं, जिससे अल नीनो जैसी घटनाओं के प्रभाव और भी गंभीर हो सकते हैं।
- भारत में 2023 में, 86 प्रतिशत दिनों में चरम मौसमी घटनाएँ देखी गईं, जिससे 22 लाख हेक्टेयर से अधिक फसल भूमि क्षतिग्रस्त हुई। देश के लगभग 85 प्रतिशत जिले बाढ़, सूखे या चक्रवातों के प्रति संवेदनशील हैं।
- भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS) ने अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों में गंभीर ताप तनाव का अनुमान लगाया है, जिसका चरम मार्च 2027 के आसपास होने की संभावना है, जिससे लाखों मछुआरों की आजीविका प्रभावित होगी।
अल नीनो क्या है?
- अल नीनो दक्षिणी दोलन (El Niño-Southern Oscillation – ENSO) नामक एक बड़ी जलवायु पैटर्न का गर्म चरण है। यह भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि को संदर्भित करता है।
- सामान्यतः, पूर्वी प्रशांत महासागर में ठंडी जलधाराएँ होती हैं, लेकिन अल नीनो के दौरान, ये जलधाराएँ गर्म हो जाती हैं और पश्चिमी प्रशांत की ओर बढ़ती हैं।
- यह घटना प्रशांत महासागर में वायुमंडलीय दाब पैटर्न और व्यापारिक पवनों (Trade Winds) को बाधित करती है, जिससे वैश्विक मौसम पैटर्न में बड़े बदलाव आते हैं।
- अल नीनो आमतौर पर हर 2 से 7 साल में होता है और 9 से 12 महीने तक चल सकता है, हालांकि कुछ घटनाएँ लंबी भी हो सकती हैं।
- इसके विपरीत, ला नीना (La Niña) ENSO का ठंडा चरण है, जिसमें पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्री सतह का तापमान सामान्य से अधिक ठंडा हो जाता है।
- अल नीनो के प्रमुख प्रभावों में कुछ क्षेत्रों में सूखा और अन्य में भारी वर्षा, वैश्विक तापमान में वृद्धि, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव (जैसे प्रवाल विरंजन – Coral Bleaching) और कृषि उत्पादन में कमी शामिल हैं।
- भारत के संदर्भ में, एक मजबूत अल नीनो अक्सर दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर करता है, जिससे वर्षा में कमी आती है और सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है, जिसका कृषि और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अल नीनो (El Niño) | यह प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि की घटना है, जो वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है। |
| सुपर अल नीनो | यह अल नीनो का एक तीव्र रूप है, जहाँ समुद्री सतह का तापमान सामान्य से 2°C से अधिक बढ़ जाता है। |
| वैश्विक तापमान वृद्धि (Global Warming) | यह पृथ्वी के औसत तापमान में दीर्घकालिक वृद्धि है, जो अल नीनो जैसी चरम मौसमी घटनाओं को और गंभीर बना सकती है। |
| भारतीय मानसून | यह भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है; अल नीनो अक्सर मानसून को कमजोर करता है, जिससे सूखा पड़ता है। |
| समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र | अल नीनो समुद्री जीवन, विशेषकर प्रवाल भित्तियों (coral reefs) और मछली पकड़ने वाले समुदायों को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। |
| चरम मौसमी घटनाएँ | बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी घटनाएँ जो अल नीनो और वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण अधिक बारंबार और तीव्र हो रही हैं। |
महत्व
पर्यावरणीय महत्व
- अल नीनो के कारण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, जैसे प्रवाल विरंजन (coral bleaching) और समुद्री प्रजातियों का पलायन।
- यह स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्रों, जैसे घास के मैदानों, वनों और नदी प्रणालियों पर भी अज्ञात प्रभाव डाल सकता है।
- चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि, जिससे प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ता है।
आर्थिक महत्व
- अल नीनो भारतीय मानसून को कमजोर कर सकता है, जिससे कृषि उत्पादन (विशेषकर चावल, दालें, कपास और मक्का) प्रभावित होता है और खाद्य मुद्रास्फीति (food inflation) का खतरा बढ़ जाता है।
- मछली पकड़ने वाले समुदायों की आजीविका पर सीधा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि समुद्री ताप तनाव के कारण मछली पकड़ने में कमी आ सकती है।
- सूखे और बाढ़ जैसी आपदाओं से फसलों और बुनियादी ढाँचे को भारी नुकसान होता है, जिससे अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
सामाजिक महत्व
- अल नीनो से प्रभावित समुदायों, विशेषकर किसानों और मछुआरों की आजीविका पर सीधा असर पड़ता है, जिससे ग्रामीण गरीबी और खाद्य असुरक्षा बढ़ सकती है।
- पानी की कमी और फसल के नुकसान से पलायन और सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।
- स्वास्थ्य पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि पानी जनित बीमारियों और कुपोषण का खतरा बढ़ जाता है।
शासन और नीतिगत महत्व
- अल नीनो जैसी चरम घटनाओं से निपटने के लिए बेहतर आपदा प्रबंधन (disaster management) और अनुकूलन रणनीतियों की आवश्यकता है।
- मौसम पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना आवश्यक है ताकि समुदायों को समय पर तैयार किया जा सके।
- जलवायु परिवर्तन (climate change) के प्रभावों को कम करने और अनुकूलन के लिए दीर्घकालिक नीतियों की आवश्यकता है।
चुनौतियाँ
1. डेटा और अनुसंधान की कमी
- अल नीनो के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों और आजीविका पर पड़ने वाले प्रभावों पर व्यवस्थित डेटा का अभाव है।
- देश के भीतर स्थलीय प्रणालियों और पौधों की वृद्धि पर इसके सटीक प्रभावों को समझना मुश्किल है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी, आपदा प्रबंधन
2. कृषि पर प्रभाव
- कमजोर मानसून के कारण चावल, दालें, कपास और मक्का जैसी खरीफ फसलों को नुकसान।
- रबी की बुवाई से पहले जलाशयों में पानी का कम स्तर, जिससे सिंचाई पर असर।
यूपीएससी लिंक: कृषि, भारतीय अर्थव्यवस्था
3. समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और आजीविका पर प्रभाव
- प्रवाल भित्तियों का विरंजन (bleaching) और मृत्यु, जिससे समुद्री जैव विविधता को खतरा।
- अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में गंभीर ताप तनाव, जिससे मछुआरों की आजीविका प्रभावित होती है और मछली पकड़ने में कमी आती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी, भारतीय अर्थव्यवस्था
4. चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति
- वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण अल नीनो के साथ-साथ अन्य चरम मौसमी घटनाएँ (बाढ़, सूखा, चक्रवात) अधिक तीव्र और बारंबार हो रही हैं।
- इन घटनाओं से निपटने के लिए मौजूदा आपदा प्रबंधन प्रणालियों पर दबाव बढ़ रहा है।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन, पर्यावरण और पारिस्थितिकी
5. प्रारंभिक चेतावनी और तैयारी
- भविष्य में आने वाले ‘सुपर अल नीनो’ के संभावित गंभीर प्रभावों के लिए पर्याप्त तैयारी का अभाव।
- समुदायों को समय पर और प्रभावी ढंग से चेतावनी देने तथा उन्हें तैयार करने की चुनौती।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन, विज्ञान और प्रौद्योगिकी
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| डेटा और अनुसंधान की कमी | अल नीनो के पारिस्थितिकी तंत्रों और आजीविका पर प्रभावों का व्यवस्थित डेटा उपलब्ध नहीं है। |
| कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव | कमजोर मानसून और जलाशयों में पानी की कमी से फसलें प्रभावित होती हैं तथा खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ती है। |
| समुद्री जीवन और मछुआरों की आजीविका | प्रवाल विरंजन और समुद्री ताप तनाव से समुद्री जैव विविधता और मछली पकड़ने वाले समुदायों को खतरा। |
| चरम मौसमी घटनाओं की तीव्रता | अल नीनो और वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी घटनाएँ अधिक गंभीर हो रही हैं। |
| प्रारंभिक चेतावनी और तैयारी का अभाव | आगामी ‘सुपर अल नीनो’ के लिए पर्याप्त तैयारी और समुदायों को प्रभावी ढंग से सूचित करने की चुनौती। |
आगे की राह
- अल नीनो और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर व्यवस्थित डेटा संग्रह और अनुसंधान को प्राथमिकता देना।
- कृषि क्षेत्र के लिए सूखा-प्रतिरोधी फसल किस्मों को बढ़ावा देना और सिंचाई के वैकल्पिक स्रोतों का विकास करना।
- मछली पकड़ने वाले समुदायों के लिए वैकल्पिक आजीविका के अवसर विकसित करना और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण के उपाय करना।
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना और आपदा प्रबंधन योजनाओं को अद्यतन करना।
- जलवायु परिवर्तन अनुकूलन (climate change adaptation) और शमन (mitigation) रणनीतियों को राष्ट्रीय विकास योजनाओं में एकीकृत करना।
- समुदायों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति संवेदनशील बनाना और उन्हें तैयारी के लिए प्रशिक्षित करना।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना ताकि अल नीनो जैसी वैश्विक घटनाओं से निपटने के लिए साझा रणनीतियाँ विकसित की जा सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अल नीनो · भारतीय मानसून · जलवायु परिवर्तन · चरम मौसमी घटनाएँ · कृषि पर प्रभाव · समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र · खाद्य सुरक्षा · आपदा प्रबंधन · राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन · सतत विकास
अवधारणा प्रवाह
प्रशांत महासागर में समुद्री सतह का तापमान बढ़ता है (अल नीनो) → यह वैश्विक पवन प्रणालियों को बाधित करता है → भारतीय मानसून कमजोर होता है और सूखा पड़ता है → कृषि उत्पादन घटता है और खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ती है → समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (प्रवाल, मछली) प्रभावित होते हैं → चरम मौसमी घटनाएँ (बाढ़, सूखा) अधिक तीव्र होती हैं → आजीविका और अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अल नीनो प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि से संबंधित एक मौसमी घटना है।
2. एक मजबूत अल नीनो घटना अक्सर भारत में कमजोर मानसून और सूखे से जुड़ी होती है।
3. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) अल नीनो घटनाओं की निगरानी और पूर्वानुमान के लिए जिम्मेदार एक प्रमुख वैश्विक संस्था है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अल नीनो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है। कथन 2 सही है। अल नीनो का भारतीय मानसून पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे अक्सर कम वर्षा और सूखे की स्थिति बनती है। कथन 3 सही है। WMO संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है जो मौसम, जलवायु और जल विज्ञान से संबंधित है और अल नीनो सहित वैश्विक मौसमी घटनाओं की निगरानी करती है।
Q2. अल नीनो के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. यह प्रशांत महासागर में व्यापारिक पवनों को मजबूत करता है।
2. यह भारत में रबी फसलों के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करता है।
3. यह समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र, विशेषकर प्रवाल भित्तियों (coral reefs) पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1
- केवल 2 और 3
- केवल 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 3 — कथन 1 गलत है। अल नीनो प्रशांत महासागर में व्यापारिक पवनों को कमजोर करता है, जिससे गर्म पानी पूर्व की ओर बढ़ता है। कथन 2 गलत है। अल नीनो खरीफ फसलों को प्रभावित करता है, लेकिन रबी फसलों पर इसका सीधा प्रभाव कम होता है, हालांकि जलाशयों में पानी की कमी से रबी की सिंचाई प्रभावित हो सकती है। कथन 3 सही है। अल नीनो से समुद्री सतह का तापमान बढ़ने से प्रवाल विरंजन (coral bleaching) और समुद्री जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अल नीनो घटनाएँ भारतीय अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी तंत्र पर किस प्रकार प्रभाव डालती हैं? इन प्रभावों को कम करने के लिए भारत सरकार द्वारा क्या उपाय किए जा सकते हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** अल नीनो की संक्षिप्त परिभाषा और भारतीय मानसून से इसका संबंध।
2. **भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:**
* **कृषि:** खरीफ फसलों (धान, दालें, कपास, मक्का) पर नकारात्मक प्रभाव, सूखे की स्थिति, कृषि आय में कमी, ग्रामीण संकट।
* **खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation):** फसल उत्पादन में कमी से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ना।
* **जल संसाधन:** जलाशयों में जल स्तर में कमी, सिंचाई और पेयजल की समस्या।
* **ऊर्जा:** जलविद्युत उत्पादन पर प्रभाव।
* **GDP पर प्रभाव:** कृषि क्षेत्र के योगदान के कारण समग्र आर्थिक संवृद्धि (economic growth) पर नकारात्मक असर।
3. **भारतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव:**
* **जलीय पारिस्थितिकी तंत्र:** नदियों और झीलों में जल स्तर में कमी, जलीय जीवन पर प्रभाव।
* **वन और घास के मैदान:** सूखे के कारण जंगल की आग का खतरा बढ़ना, वनस्पति पर नकारात्मक प्रभाव।
* **समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र:** समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि से प्रवाल विरंजन, मछली पकड़ने पर प्रभाव (जैसे सार्डिन और मैकेरल की कमी), मछुआरों की आजीविका पर असर।
* **जैव विविधता:** चरम मौसमी घटनाओं से प्रजातियों का विस्थापन या हानि।
4. **प्रभावों को कम करने के उपाय:**
* **कृषि क्षेत्र में:** सूखा प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देना, सूक्ष्म सिंचाई (micro-irrigation) प्रणालियों का विस्तार, फसल बीमा योजनाओं (जैसे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना) का प्रभावी क्रियान्वयन, कृषि-मौसम सलाह सेवाओं का विस्तार।
* **जल प्रबंधन:** वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण, अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का समाधान, जलाशयों का कुशल प्रबंधन।
* **आपदा प्रबंधन:** पूर्व चेतावनी प्रणालियों (early warning systems) को मजबूत करना, आपदा प्रतिक्रिया तंत्र को सुदृढ़ करना, समुदाय-आधारित आपदा तैयारी।
* **खाद्य सुरक्षा:** सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को मजबूत करना, बफर स्टॉक का उचित प्रबंधन, आयात-निर्यात नीतियों का विवेकपूर्ण उपयोग।
* **समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण:** प्रवाल भित्तियों के संरक्षण के प्रयास, समुद्री संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार, मछुआरों के लिए वैकल्पिक आजीविका के अवसर।
* **अनुसंधान और विकास:** अल नीनो के प्रभावों पर व्यवस्थित डेटा संग्रह और अनुसंधान, जलवायु-स्मार्ट कृषि तकनीकों का विकास।
* **अंतर्राष्ट्रीय सहयोग:** जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक प्रयासों में भागीदारी।
5. **निष्कर्ष:** अल नीनो के प्रभावों को कम करने के लिए एक बहुआयामी और समन्वित दृष्टिकोण की आवश्यकता, जिसमें दीर्घकालिक जलवायु अनुकूलन रणनीतियाँ शामिल हों।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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