02 Nov तमिलनाडु राज्य वन्यजीव बोर्ड का पुनर्गठन: मुख्यमंत्रियों की भूमिका
✎ राज्य वन्यजीव बोर्ड वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 6 के अंतर्गत गठित परामर्शी निकाय है, जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री करते हैं और जो संरक्षित क्षेत्रों, वन्यजीव नीतियों तथा वनवासी समुदायों के हितों पर राज्य सरकार को सलाह…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी, जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण | GS Paper II — संघीय ढाँचे में राज्य सरकार की भूमिका और सांविधिक निकाय
- Prelims: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 6 — राज्य वन्यजीव बोर्ड का गठन, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (National Board for Wildlife) और राज्य वन्यजीव बोर्ड में अंतर, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम की अनुसूचियाँ (I से VI) और उनका संरक्षण स्तर, संरक्षित क्षेत्रों की श्रेणियाँ: राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, संरक्षण आरक्षित क्षेत्र और सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र, वन्यजीव संरक्षण का विषय समवर्ती सूची की प्रविष्टि 17-ख (Entry 17-B) में, अनुच्छेद 48-क (राज्य नीति का निदेशक तत्व) और अनुच्छेद 51-क(छ) (मूल कर्तव्य), अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006, भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India) और भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (Botanical Survey of India) की भूमिका
- Essay: संरक्षण और आजीविका के बीच संतुलन: वन्यजीव प्रबंधन में वनवासी समुदायों की भागीदारी, सहकारी संघवाद और पर्यावरण शासन: केंद्र और राज्य की भूमिकाएँ
त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य वन्यजीव बोर्ड वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 6 के अंतर्गत गठित परामर्शी निकाय है, जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री करते हैं और जो संरक्षित क्षेत्रों, वन्यजीव नीतियों तथा वनवासी समुदायों के हितों पर राज्य सरकार को सलाह देता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
तमिलनाडु सरकार ने पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और वन विभाग के 28 अक्टूबर 2026 के सरकारी आदेश (G.O.) द्वारा राज्य वन्यजीव बोर्ड का पुनर्गठन किया है। यह कदम वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 6(1) के अंतर्गत उठाया गया है। बोर्ड की अध्यक्षता राज्य के मुख्यमंत्री करेंगे और वन मंत्री उपाध्यक्ष होंगे। पुनर्गठन का कारण यह है कि अप्रैल 2022 में गठित बोर्ड के गैर-सरकारी सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो गया था। प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) और मुख्य वन्यजीव वार्डन (Chief Wildlife Warden) के अनुरोध पर यह प्रक्रिया शुरू की गई। समाचार में बोर्ड की सदस्य-संरचना, गैर-सरकारी सदस्यों के दो वर्षीय कार्यकाल और संरक्षित क्षेत्रों, वन्यजीव नीतियों तथा जनजातीय हितों से संबंधित उसके परामर्शी कार्यों का उल्लेख है।
पृष्ठभूमि
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 भारत में वन्यजीव संरक्षण का प्रमुख विधिक ढाँचा है। इसमें केंद्र स्तर पर राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड और राज्य स्तर पर राज्य वन्यजीव बोर्ड का प्रावधान है।
- वन्यजीव संरक्षण का विषय 42वें संविधान संशोधन (1976) के बाद समवर्ती सूची में रखा गया है। इसलिए केंद्र और राज्य दोनों इस पर विधि बना सकते हैं, और संरक्षित क्षेत्रों का प्रबंधन मुख्य रूप से राज्य सरकारों के हाथ में रहता है।
- राज्य वन्यजीव बोर्ड का गठन पहली बार वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के अंतर्गत किया गया था। उसके बाद समय-समय पर उसका पुनर्गठन होता रहा है। तमिलनाडु में पिछला पुनर्गठन अप्रैल 2022 में हुआ था।
- गैर-सरकारी सदस्यों का कार्यकाल सीमित होता है, इसलिए उनकी नियुक्ति का नवीकरण नियमित रूप से करना आवश्यक होता है। इस प्रक्रिया में राज्य के वन विभाग की भूमिका केंद्रीय होती है।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अंतर्गत वनवासी समुदायों के अधिकार मान्यता प्राप्त हैं। इसलिए संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन में उनके हितों का समन्वय संरक्षण नीति का एक आवश्यक पहलू है।
राज्य वन्यजीव बोर्ड क्या है?
- राज्य वन्यजीव बोर्ड (State Board for Wildlife) वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 6 के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा गठित एक सांविधिक परामर्शी निकाय है।
- इसकी अध्यक्षता राज्य के मुख्यमंत्री करते हैं। वन मंत्री सामान्यतः उपाध्यक्ष होते हैं, और मुख्य वन्यजीव वार्डन इसके सदस्य-सचिव होते हैं।
- बोर्ड में वन्यजीव विशेषज्ञ, गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि, संरक्षणवादी, जीव वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् शामिल होते हैं। राज्य विधानमंडल के कुछ सदस्यों को भी नामित किया जा सकता है।
- बोर्ड का मुख्य कार्य राज्य सरकार को परामर्श देना है। इसमें संरक्षित क्षेत्रों के चयन और प्रबंधन, वन्यजीव संरक्षण नीतियों और वन्यजीव अनुसूचियों में संशोधन जैसे विषय आते हैं।
- बोर्ड का एक महत्वपूर्ण कार्य वनवासी और अन्य वन-आश्रित समुदायों की आवश्यकताओं को वन्यजीव संरक्षण के साथ समन्वित करना है।
- बोर्ड की सिफारिशें बाध्यकारी आदेश नहीं होतीं। अंतिम निर्णय राज्य सरकार के पास रहता है, परंतु ये सिफारिशें नीति-निर्माण में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम की अनुसूची I से IV में दर्ज प्रजातियों को विधिक संरक्षण प्राप्त है। अनुसूचियों में संशोधन के लिए राज्य बोर्ड की परामर्श-भूमिका महत्वपूर्ण है।
- गैर-सरकारी सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष का होता है। इसके बाद पुनर्नियुक्ति या नया गठन आवश्यक होता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| गठन का आधार | वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife (Protection) Act, 1972) की धारा 6(1) के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा जारी शासकीय आदेश (G.O.), दिनांक 28 अक्टूबर 2026 |
| अध्यक्ष और उपाध्यक्ष | मुख्यमंत्री पदेन अध्यक्ष और वन मंत्री उपाध्यक्ष होते हैं, जिससे बोर्ड को राज्य स्तर पर शीर्ष नीतिगत नेतृत्व प्राप्त होता है |
| सदस्य-सचिव | प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव वार्डन (Principal Chief Conservator of Forests and Chief Wildlife Warden) सदस्य-सचिव के रूप में बोर्ड के प्रशासनिक कार्य संभालते हैं |
| गैर-सरकारी सदस्य | गैर-सरकारी संगठनों, संरक्षणवादियों, जीव वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों को सम्मिलित किया जाता है; इनका कार्यकाल दो वर्ष निर्धारित है |
| पुनर्गठन की पृष्ठभूमि | पिछला बोर्ड अप्रैल 2022 में गठित हुआ था; गैर-सरकारी सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने और मुख्य वन्यजीव वार्डन के अनुरोध पर यह पुनर्गठन हुआ |
| परामर्शी स्वरूप | बोर्ड राज्य सरकार को सलाह देता है; नीतिगत एवं प्रशासनिक निर्णय का अंतिम अधिकार राज्य सरकार के पास रहता है |
महत्व
प्रशासनिक और संस्थागत
- राज्य वन्यजीव बोर्ड (State Board for Wildlife) वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत राज्य स्तर पर वन्यजीव नीति की सर्वोच्च सलाहकार संस्था है
- मुख्यमंत्री की अध्यक्षता से वन्यजीव संरक्षण के मामलों को मंत्रिमंडलीय स्तर पर समन्वित करने का मार्ग खुलता है
- मुख्य सचिव को विशेष आमंत्रित सदस्य बनाए जाने से अन्य विभागों के साथ तालमेल सुनिश्चित होता है
पारिस्थितिक और संरक्षण
- बोर्ड का परामर्श संरक्षित क्षेत्रों (Protected Areas) के चयन और प्रबंधन पर होता है, जो जैव विविधता संरक्षण का केंद्रीय साधन है
- वन्यजीव अनुसूचियों (Wildlife Schedules) में संशोधन पर सलाह से प्रजातियों के कानूनी संरक्षण स्तर का निर्धारण प्रभावित होता है
- समुद्री कछुओं जैसे तटीय जीवों पर कार्य करने वाले संगठनों की भागीदारी से तटीय और समुद्री जैव विविधता पर भी ध्यान जाता है
वैज्ञानिक और विशेषज्ञ
- भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India), भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (Botanical Survey of India) और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (Zoological Survey of India) के प्रतिनिधियों की उपस्थिति से नीति वैज्ञानिक आधार पर बनती है
- जीव वैज्ञानिकों और संरक्षण संस्थाओं की भागीदारी से साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया मजबूत होती है
सामाजिक और जनजातीय
- बोर्ड का दायित्व वन्यजीव संरक्षण और जनजातीय तथा अन्य वन-निवासी समुदायों की आवश्यकताओं में संतुलन बनाना है
- इससे संरक्षण नीति में स्थानीय समुदायों के अधिकार और आजीविका के प्रश्न सम्मिलित होते हैं
संघीय और संवैधानिक संदर्भ
- वन और वन्यजीव दोनों विषय समवर्ती सूची (Concurrent List) में आते हैं, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों की विधायी भूमिका होती है
- केंद्रीय अधिनियम को राज्य स्तर पर लागू करने के लिए राज्य वन्यजीव बोर्ड जैसी संस्थाएँ व्यावहारिक माध्यम बनती हैं
चुनौतियाँ
1. गैर-सरकारी सदस्यों का अल्पकालिक कार्यकाल
- दो वर्ष के कार्यकाल के बाद नियमित पुनर्गठन की आवश्यकता होती है, जिससे नीति-निरंतरता पर असर पड़ सकता है
- बार-बार पुनर्गठन से बोर्ड के विशेषज्ञ सदस्यों के बीच दीर्घकालिक संवाद और संस्थागत स्मृति कमजोर हो सकती है
यूपीएससी लिंक: शासन में संस्थागत क्षमता और नीति-निरंतरता (GS-2)
2. मानव-वन्यजीव संघर्ष
- संरक्षित क्षेत्रों के आसपास बसे गाँवों और वन्यजीवों के बीच टकराव बढ़ने से संरक्षण नीति पर सामाजिक दबाव पड़ता है
- फसल हानि, पशु हानि और जान-माल के नुकसान से स्थानीय असंतोष उभर सकता है
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता; आपदा और सामाजिक संघर्ष (GS-3 और GS-1)
3. जनजातीय अधिकार और संरक्षण का संतुलन
- वन्यजीव संरक्षण और वन-अधिकारों के बीच संतुलन सबसे संवेदनशील प्रश्न है
- संरक्षित क्षेत्र घोषित होने पर पारंपरिक वन-उपयोग पर प्रतिबंध का प्रश्न उठता है, जिसके लिए परामर्श आवश्यक है
यूपीएससी लिंक: अनुसूचित जनजातियों के हित और वन-अधिकार (GS-2)
4. संरक्षित क्षेत्र चयन पर विकास का दबाव
- खनन, अवसंरचना और पर्यटन परियोजनाएँ संरक्षित क्षेत्रों की सीमाओं और उपयोग को प्रभावित कर सकती हैं
- आर्थिक विकास और पारिस्थितिक संरक्षण के बीच नीति-निर्णय में पारदर्शी मूल्यांकन की आवश्यकता होती है
यूपीएससी लिंक: आर्थिक विकास और पर्यावरण; पर्यावरण प्रभाव आकलन (GS-3)
5. तटीय और समुद्री जैव विविधता की चुनौती
- समुद्री कछुओं, तटीय पक्षियों और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर मछली पकड़ने, प्रदूषण और तट-कटाव का दबाव है
- स्थलीय वन्यजीव अधिनियम के ढाँचे में समुद्री प्रजातियों की निगरानी और प्रबंधन जटिल हो जाता है
यूपीएससी लिंक: जैव विविधता, तटीय पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन (GS-3)
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| समस्या | चिंता |
|---|---|
| पुनर्गठन की आवृत्ति | दो वर्ष के कार्यकाल के कारण विशेषज्ञ सदस्यों की निरंतरता और नीति-स्मृति प्रभावित हो सकती है |
| मानव-वन्यजीव संघर्ष | संरक्षित क्षेत्रों के निकटवर्ती गाँवों में जान-माल और फसल की हानि से स्थानीय असंतोष बढ़ सकता है |
| जनजातीय और वन-निवासी हित | संरक्षण उपायों से पारंपरिक वन-उपयोग और आजीविका पर प्रतिबंध का प्रश्न जुड़ा रहता है |
| विकास परियोजनाओं का दबाव | खनन, अवसंरचना और पर्यटन से संरक्षित क्षेत्रों की सीमाओं पर दबाव बन सकता है |
| परामर्श बनाम बाध्यता | बोर्ड की भूमिका परामर्शी है; सिफारिशों के क्रियान्वयन की सुनिश्चितता सरकारी इच्छाशक्ति पर निर्भर है |
| तटीय और समुद्री प्रजातियाँ | समुद्री कछुओं और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की निगरानी स्थलीय ढाँचे में कठिन हो सकती है |
आगे की राह
- गैर-सरकारी सदस्यों के कार्यकाल और पुनर्गठन की प्रक्रिया को समय-पूर्व योजना के साथ संस्थागत बनाया जाए, ताकि नीति-निरंतरता बनी रहे
- बोर्ड की बैठकों में संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन पर नियमित समीक्षा और सार्वजनिक रिपोर्टिंग की व्यवस्था की जाए
- मानव-वन्यजीव संघर्ष के लिए क्षतिपूर्ति, चेतावनी प्रणाली और सह-अस्तित्व मॉडल पर स्थानीय स्तर पर कार्य योजना बने
- वन-निवासी और जनजातीय समुदायों को संरक्षित क्षेत्र संबंधी निर्णयों में प्रारंभिक चरण से परामर्श का अधिकार मिले
- संरक्षित क्षेत्रों के चयन और विकास परियोजनाओं के बीच पर्यावरण प्रभाव आकलन को वैज्ञानिक और पारदर्शी बनाया जाए
- भारतीय वन्यजीव संस्थान और राज्य के वैज्ञानिक संस्थानों के साथ अनुसंधान और निगरानी का साझा ढाँचा विकसित हो
- तटीय और समुद्री जैव विविधता के लिए तट-प्रबंधन और मछली पकड़ने के नियमन को राज्य वन्यजीव नीति के साथ समन्वित किया जाए
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राज्य वन्यजीव बोर्ड (State Board for Wildlife) · वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife (Protection) Act, 1972) · संरक्षित क्षेत्र · सहवर्ती सूची (Concurrent List) · राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (National Board for Wildlife) · अनुच्छेद 48A (राज्य नीति का निदेशक तत्त्व) · मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51A(छ)) · वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006) · मानव-वन्यजीव संघर्ष · वन-आश्रित समुदाय · दुर्ग-संरक्षण मॉडल (Fortress Conservation) · सहभागी संरक्षण (Participatory Conservation)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का राज्य का दायित्व
- अनुच्छेद 51A(छ): प्राकृतिक पर्यावरण और वन्यजीव की रक्षा का कर्तव्य
- अनुच्छेद 46: अनुसूचित जनजातियों के हितों का संवर्धन
- सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची: वन और वन्यजीव संरक्षण का विषय
अवधारणा प्रवाह
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 6(1) के तहत राज्य सरकार बोर्ड के गठन का अधिकार प्रयोग करती है → गैर-सरकारी सदस्यों का दो वर्ष का कार्यकाल समाप्त होने पर मुख्य वन्यजीव वार्डन पुनर्गठन का अनुरोध करते हैं → राज्य सरकार शासकीय आदेश (G.O.) जारी कर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में नए बोर्ड का गठन करती है → बोर्ड संरक्षित क्षेत्रों, वन्यजीव नीतियों और वन्यजीव अनुसूचियों पर राज्य सरकार को परामर्श देता है → परामर्श के आधार पर राज्य सरकार संरक्षण नीति और प्रबंधन निर्णय लेती है, जिनमें जनजातीय और वन-निवासी हितों का संतुलन शामिल होता है → निर्णयों का क्रियान्वयन स्थानीय समुदायों, संरक्षण संस्थाओं और वन विभाग के समन्वय पर निर्भर करता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए, जो वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत राज्य वन्यजीव बोर्ड और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की संरचना से संबंधित हैं:
1. राज्य वन्यजीव बोर्ड का अध्यक्ष पदेन रूप से राज्य का मुख्यमंत्री होता है।
2. राज्य वन्यजीव बोर्ड का उपाध्यक्ष वन विभाग का प्रभारी मंत्री होता है।
3. राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड का अध्यक्ष केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल 1
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 और 2 सही हैं: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 6(1) के अंतर्गत राज्य वन्यजीव बोर्ड का अध्यक्ष मुख्यमंत्री तथा उपाध्यक्ष वन विभाग का प्रभारी मंत्री होता है। कथन 3 गलत है: राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं, जबकि पर्यावरण मंत्री उसके उपाध्यक्ष होते हैं। इसलिए केवल 1 और 2 सही हैं।
Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक कथन के साथ दिए गए दो कथनों (A) और (R) पर विचार कीजिए:
कथन (A): वन और वन्यजीव संरक्षण विषय संविधान की सहवर्ती सूची में शामिल हैं।
कारण (R): संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा सहवर्ती सूची में प्रविष्टि 17A (वन) और प्रविष्टि 17B (वन्य पशु-पक्षियों की रक्षा) जोड़ी गई थीं।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — वन और वन्यजीव संरक्षण मूलतः राज्य सूची में थे। बयालीसवें संशोधन (1976) द्वारा इन्हें सहवर्ती सूची में लाया गया और प्रविष्टि 17A (वन) तथा 17B (वन्य पशु-पक्षियों की रक्षा) जोड़ी गईं। इसी कारण केंद्र और राज्य दोनों इन विषयों पर विधि बना सकते हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या है।
Q3. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए:
सूची-I (संस्था)
a. राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड
b. भारतीय वन्यजीव संस्थान
c. भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण
d. भारतीय प्राणी सर्वेक्षण
सूची-II (कार्य/भूमिका)
1. वन्यजीव संरक्षण पर केंद्र सरकार को परामर्श देने वाली वैधानिक शीर्ष संस्था
2. देहरादून स्थित वन्यजीव शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान
3. देश के पादप संसाधनों का सर्वेक्षण और वर्गीकरण
4. देश के जीव-जंतु संसाधनों का सर्वेक्षण और वर्गीकरण
नीचे दिए गए कूटों में से सही सुमेलन चुनिए।
- a-1, b-2, c-3, d-4
- a-2, b-1, c-4, d-3
- a-1, b-3, c-2, d-4
- a-3, b-1, c-2, d-4
उत्तर: a-1, b-2, c-3, d-4 — राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड वन्यजीव अधिनियम के अंतर्गत गठित वैधानिक शीर्ष निकाय है (a-1)। भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून में शोध और प्रशिक्षण करता है (b-2)। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण पादप संसाधनों और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण जीव-जंतु संसाधनों का सर्वेक्षण करते हैं (c-3, d-4)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राज्य वन्यजीव बोर्ड वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत संरक्षण नीतियों पर राज्य सरकार को परामर्श देने वाली संस्था है, जिसकी संरचना में मंत्री, वैज्ञानिक संस्थानों के प्रतिनिधि तथा गैर-सरकारी संगठनों के सदस्य शामिल होते हैं। संरक्षित क्षेत्रों के चयन और प्रबंधन में इस संस्थागत व्यवस्था की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही यह भी स्पष्ट कीजिए कि वन्यजीव संरक्षण और जनजातीय एवं वनाश्रित समुदायों के अधिकारों के बीच सामंजस्य स्थापित करने में यह व्यवस्था कितनी प्रभावी सिद्ध हो सकती है। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल उत्तर के आवश्यक बिंदु:
(1) संवैधानिक और विधिक आधार: अनुच्छेद 48A (पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का राज्य का दायित्व) और अनुच्छेद 51A(छ) (मौलिक कर्तव्य); बयालीसवें संशोधन (1976) से वन और वन्यजीव सहवर्ती सूची में (प्रविष्टि 17A, 17B); वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (धारा 5) और राज्य वन्यजीव बोर्ड (धारा 6)।
(2) राज्य वन्यजीव बोर्ड की संरचना: मुख्यमंत्री पदेन अध्यक्ष, वन विभाग का प्रभारी मंत्री उपाध्यक्ष, नामित गैर-सरकारी सदस्य (संरक्षणवादी, जीव-वैज्ञानिक, पर्यावरणविद), विधानमंडल के नामित सदस्य, तथा वन्यजीव संस्थान (WII), भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI), भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) और उन्नत वन्यजीव संरक्षण संस्थान के प्रतिनिधि; मुख्य वन्यजीव वार्डन सदस्य-सचिव।
(3) कार्य: संरक्षित क्षेत्रों का चयन और प्रबंधन, वन्यजीव संरक्षण नीतियाँ, अनुसूचियों में संशोधन पर परामर्श और जनजातीय तथा वनाश्रित समुदायों के हितों के साथ सामंजस्य। यह सलाहकारी निकाय है, अंतिम निर्णय शक्ति राज्य सरकार के पास रहती है।
(4) आलोचनात्मक विश्लेषण के बिंदु: गैर-सरकारी सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने पर बोर्ड में अंतराल की समस्या; पदेन सदस्यों की प्रधानता से परामर्श की स्वतंत्रता पर प्रश्न; सलाहकार स्वरूप होने से बाध्यकारी प्रभाव का अभाव। सहायक तथ्य: वन अधिकार अधिनियम, 2006 (ग्राम सभा की सहमति, धारा 4 के अंतर्गत वन-अधिकार मान्यता); संरक्षित क्षेत्रों से पुनर्वास के लिए सहमति की आवश्यकता पर बहस; राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) से समन्वय।
(5) विचारों का संतुलन: दुर्ग-संरक्षण मॉडल (Fortress Conservation) की आलोचना, जो स्थानीय समुदायों को बाहर रखता है (रामचंद्र गुहा और माधव गाडगिल के विचार); सहभागी संरक्षण का समर्थन; सर्वोच्च न्यायालय के टी.एन. गोदावर्मन मामले (1996) में वन की व्यापक परिभाषा का संदर्भ, जो संरक्षण को व्यापक दायरा देता है।
(6) निष्कर्ष: सहभागी शासन, पारदर्शी नामांकन, समुदाय-आधारित संरक्षण और वैज्ञानिक परामर्श के समन्वय से संरक्षण और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन संभव है।
स्रोत: The Hindu
Tamil Nadu PCS (TNPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में राज्य वन्यजीव बोर्ड का पुनर्गठन किया है। इस बोर्ड के अध्यक्ष कौन होते हैं?
- राज्य के वन मंत्री
- राज्य के मुख्यमंत्री
- राज्य के मुख्य सचिव
- राज्य के पर्यावरण सचिव
उत्तर: राज्य के मुख्यमंत्री — तमिलनाडु राज्य वन्यजीव बोर्ड के अध्यक्ष राज्य के मुख्यमंत्री होते हैं, जो वन्यजीव संरक्षण से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं।
Mains: तमिलनाडु राज्य वन्यजीव बोर्ड के पुनर्गठन के महत्व पर चर्चा करें और राज्य में वन्यजीव संरक्षण में इसकी भूमिका का विश्लेषण करें।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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