03 Nov ई-फाइलिंग 3.0 कार्यशाला: ई-न्यायालय मिशन मोड परियोजना का एक महत्वपूर्ण कदम
✎ ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना (2005 में NeGP के अंतर्गत आरंभ) न्याय वितरण के डिजिटलीकरण का प्रमुख राष्ट्रीय कार्यक्रम है, जिसकी नीतिगत दिशा ई-समिति (सर्वोच्च न्यायालय) और प्रशासनिक समन्वय विधि एवं न्याय मंत्रालय करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजव्यवस्था (Polity): न्यायपालिका, न्याय वितरण और न्यायिक सुधार | GS Paper II — शासन (Governance): ई-शासन (e-Governance) की पहलें और सेवा वितरण में सुधार | GS Paper III — प्रौद्योगिकी (Technology): सूचना प्रौद्योगिकी का सार्वजनिक सेवाओं में उपयोग
- Prelims: ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना (eCourts Mission Mode Project), राष्ट्रीय ई-शासन योजना (National e-Governance Plan, NeGP), ई-समिति (eCommittee), सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid, NJDG), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 4 और धारा 5, ई-फाइलिंग और डिजिटल हस्ताक्षर (Digital Signature), भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) में इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख, अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 39क
- Essay: डिजिटल न्याय: तकनीक से न्याय तक पहुँच और लंबित मामलों में कमी, प्रक्रिया सुधार से व्यवहारिक क्रियान्वयन तक: सार्वजनिक नीति में सफलता की शर्तें
त्वरित पुनरावृत्ति: ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना (2005 में NeGP के अंतर्गत आरंभ) न्याय वितरण के डिजिटलीकरण का प्रमुख राष्ट्रीय कार्यक्रम है, जिसकी नीतिगत दिशा ई-समिति (सर्वोच्च न्यायालय) और प्रशासनिक समन्वय विधि एवं न्याय मंत्रालय करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
विधि एवं न्याय मंत्रालय ने ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना के अंतर्गत ‘ई-फाइलिंग 3.0: प्रक्रिया से व्यवहार तक’ विषय पर एक कार्यशाला आयोजित की। इसका केंद्रीय उद्देश्य ई-फाइलिंग की नई अवस्था को प्रक्रिया-स्तर की रूपरेखा से आगे बढ़ाकर अदालतों और अधिवक्ताओं द्वारा व्यवहार में उपयोग तक ले जाना है। प्रेस विज्ञप्ति में ई-फाइलिंग 3.0 की तकनीकी विशेषताओं का विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है, इसलिए परीक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु यह है कि सरकार अब डिजिटल न्याय की पहलों में नीति-निर्माण के बाद क्रियान्वयन और अपनाने (adoption) की चुनौती पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
पृष्ठभूमि
- ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना की शुरुआत 2005 में राष्ट्रीय ई-शासन योजना (NeGP) के अंतर्गत हुई। इसके लिए न्यायपालिका में सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग की राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना तैयार की गई।
- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित ई-समिति (eCommittee) इस परियोजना के नीतिगत और तकनीकी मार्गदर्शन की शीर्ष संस्था है, जबकि विधि एवं न्याय मंत्रालय वित्तीय और प्रशासनिक समन्वय देखता है।
- परियोजना के पहले चरण (2007–2015) में अदालतों के कंप्यूटरीकरण, वेब-आधारित सूचना और न्यायालय परिसरों में बुनियादी ढाँचे पर बल दिया गया; दूसरे चरण (2015–2023) में सेवाओं के डिजिटल वितरण और राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड जैसे डेटा आधारित उपकरणों का विस्तार हुआ।
- वर्ष 2023 में मंत्रिमंडल ने परियोजना के तीसरे चरण को मंजूरी दी, जिसमें क्लाउड-आधारित ढाँचे, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग और सेवाओं की पहुँच बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया है।
- लंबित मामलों की समस्या भारतीय न्यायपालिका की प्रमुख चुनौती है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत शीघ्र न्याय (speedy trial) का अधिकार और अनुच्छेद 39क के अंतर्गत राज्य का निःशुल्क विधिक सहायता सुनिश्चित करने का दायित्व, डिजिटल पहलों के संवैधानिक आधार माने जाते हैं।
ई-फाइलिंग क्या है?
- ई-फाइलिंग (e-Filing) वह व्यवस्था है जिसमें याचिका, वाद, आवेदन और अन्य न्यायिक दस्तावेज़ कागज़ के बजाय इलेक्ट्रॉनिक रूप में अदालत में ऑनलाइन दाखिल किए जाते हैं।
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 4 इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को विधिक मान्यता देती है, और धारा 5 डिजिटल हस्ताक्षर के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को प्रामाणिक बनाने की व्यवस्था करती है।
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को साक्ष्य के रूप में मान्यता दी गई है, जिससे डिजिटल दस्तावेज़ों की वैधता और उनके न्यायालयीन उपयोग का कानूनी ढाँचा मजबूत होता है।
- ई-फाइलिंग से कागज़ी प्रक्रिया घटती है, दाखिल करने का समय और भौतिक यात्रा कम होती है, तथा मामले की स्थिति की जानकारी पारदर्शी रूप से उपलब्ध होती है।
- राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) देशभर की अदालतों में लंबित और निपटाए गए मामलों का डेटा एकीकृत रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे नीति-निर्माण और प्रशासनिक निगरानी में सहायता मिलती है।
- ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना का मुख्य लक्ष्य अदालतों के डिजिटलीकरण से न्याय तक पहुँच बढ़ाना और लंबित मामलों के निपटारे में तेज़ी लाना है।
- किसी भी डिजिटल पहल की सफलता केवल तकनीक पर नहीं, बल्कि अधिवक्ताओं, वादकारियों और न्यायालय कर्मचारियों के प्रशिक्षण, डिजिटल साक्षरता और उपयोगकर्ता-अनुकूल प्रक्रियाओं पर निर्भर करती है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| विषय: ‘ई-फाइलिंग 3.0: प्रक्रिया से व्यवहार तक’ | ई-फाइलिंग की नीतिगत रूपरेखा से आगे बढ़कर उसके प्रचालन और वास्तविक उपयोग पर बल। कार्यशाला का केंद्र अपनाने (adoption) की चुनौती है, नई तकनीक के प्रावधान केवल कागज़ पर न रहें। |
| आयोजक: विधि एवं न्याय मंत्रालय | ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना (eCourts Mission Mode Project) का नोडल मंत्रालय होने के नाते न्याय वितरण में डिजिटल सुधारों की नीति-स्तरीय भूमिका। |
| संदर्भ: ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना | न्यायालयों के कंप्यूटरीकरण और सेवाओं के डिजिटलीकरण का राष्ट्रीय कार्यक्रम। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, गति और नागरिक-सुलभता बढ़ाना है। |
| ई-फाइलिंग का प्रयोजन | वादी और अधिवक्ता न्यायालय में याचिका या दस्तावेज़ ऑनलाइन दाखिल कर सकते हैं। इससे भौतिक उपस्थिति और कागज़ी प्रक्रिया की निर्भरता कम होती है। |
| प्रक्रिया से व्यवहार की ओर संक्रमण | सुधार का मूल्यांकन इस बात से होता है कि अधिवक्ता, वादी, न्यायालय के कर्मचारी और न्यायाधीश प्रणाली को कितनी सहजता से अपनाते हैं। |
महत्व
प्रशासनिक/संस्थागत
- न्यायालयों की कार्यप्रणाली में मानकीकरण और दस्तावेज़ों के डिजिटल प्रवाह से फाइलिंग की प्रक्रिया एकसमान होने की दिशा में कदम।
- प्रक्रिया-आधारित सुधार से संस्थागत क्षमता का विकास, जिससे न्यायालय और अधिवक्ता दोनों नई व्यवस्था के अनुरूप ढलते हैं।
सामाजिक एवं नागरिक
- न्याय तक पहुँच (access to justice) का विस्तार, विशेषकर उन नागरिकों के लिए जो दूर स्थित न्यायालयों तक बार-बार नहीं जा सकते।
- न्यायिक सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ने से वादियों का प्रक्रिया की स्थिति जानने का भरोसा मजबूत होता है।
संवैधानिक एवं विधिक
- अनुच्छेद 21 के अंतर्गत त्वरित न्याय (speedy trial) के अधिकार की व्यावहारिक पूर्ति में डिजिटल प्रक्रियाओं की सहायक भूमिका।
- न्याय वितरण में प्रक्रियागत विलंब कम करना विधि के शासन और न्यायिक दक्षता के लक्ष्य से जुड़ा है।
ई-गवर्नेंस एवं तकनीकी
- राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (National e-Governance Plan) के अंतर्गत न्यायपालिका का डिजिटलीकरण, जो सार्वजनिक सेवाओं में सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग का एक उदाहरण है।
- न्यायिक डेटा के एकीकरण से नीति-निर्माण हेतु साक्ष्य उपलब्ध होते हैं।
चुनौतियाँ
1. डिजिटल विभाजन (Digital Divide)
- सभी वादियों के पास इंटरनेट, उपकरण और डिजिटल साक्षरता नहीं होती, जिससे ई-फाइलिंग का लाभ असमान रूप से वितरित होता है।
- ग्रामीण और कम साक्षर वर्ग के लिए सहायता केंद्रों की आवश्यकता बनी रहती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक क्षेत्र में डिजिटल विभाजन; ई-गवर्नेंस की सीमाएँ (GS-2, GS-2 शासन)
2. प्रक्रिया और व्यवहार के बीच अंतर
- नियम और दिशा-निर्देश बन जाने के बावजूद ज़मीनी स्तर पर अपनाने की गति धीमी हो सकती है।
- पुरानी कार्यशैली, कागज़ आधारित आदतें और प्रशिक्षण की कमी सुधार के प्रभाव को सीमित करती है।
यूपीएससी लिंक: प्रशासनिक सुधार और लोक सेवा में क्षमता-निर्माण (GS-2)
3. साइबर सुरक्षा और डेटा गोपनीयता
- न्यायिक दस्तावेज़ और वादियों की संवेदनशील सूचना ऑनलाइन प्रणाली में रहने से सुरक्षा और गोपनीयता का प्रश्न उठता है।
- प्रणाली की विश्वसनीयता के लिए सुरक्षित मंच, प्रमाणीकरण और डेटा संरक्षण मानक आवश्यक हैं।
यूपीएससी लिंक: साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण से जुड़े विषय (GS-3, आंतरिक सुरक्षा एवं प्रौद्योगिकी)
4. अंतर-संचालनीयता (Interoperability) की समस्या
- विभिन्न न्यायालयों, राज्यों और मंचों की प्रणालियों के बीच तालमेल न हो तो सूचना का प्रवाह बाधित होता है।
- केंद्र और राज्य सरकारों की भागीदारी से परियोजना का संघीय स्वरूप भी जटिल होता है।
यूपीएससी लिंक: केंद्र-राज्य समन्वय और सहकारी संघवाद (GS-2, संघवाद)
5. मानव संसाधन और प्रशिक्षण
- अधिवक्ताओं, न्यायालयीय कर्मचारियों और वादियों के लिए निरंतर प्रशिक्षण और जागरूकता आवश्यक है।
- तकनीकी सहायता की उपलब्धता के अभाव में सुधार का लाभ सीमित रहता है।
यूपीएससी लिंक: लोक सेवा में मानव संसाधन विकास और क्षमता-निर्माण (GS-2)
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| डिजिटल पहुँच | उपकरण और इंटरनेट की अनुपलब्धता से ग्रामीण और कमजोर वर्ग के वादी पीछे छूट सकते हैं। |
| प्रशिक्षण और जागरूकता | अधिवक्ताओं और न्यायालय कर्मचारियों में नई प्रणाली की समझ अधूरी रहने से प्रक्रिया में विलंब हो सकता है। |
| डेटा सुरक्षा | संवेदनशील न्यायिक सूचना के दुरुपयोग या साइबर हमले का जोखिम बना रहता है। |
| प्रणालियों का एकीकरण | विभिन्न मंचों के बीच अंतर-संचालनीयता न होने से सूचना का सुचारु प्रवाह बाधित होता है। |
| प्रक्रियागत सुधार की गति | नियमों में परिवर्तन होने पर भी पुरानी कार्यशैली बनी रहे तो सुधार का प्रभाव सीमित रहता है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना (eCourts Mission Mode Project)
- राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (National e-Governance Plan)
आगे की राह
- ई-फाइलिंग के उपयोग का नियमित मूल्यांकन कर प्रक्रियागत बाधाओं की पहचान और समाधान किया जाए।
- अधिवक्ताओं, न्यायालय कर्मचारियों और वादियों के लिए व्यवस्थित प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएँ।
- ग्रामीण और कमजोर वर्गों के लिए सहायता केंद्र और सुविधा केंद्र स्थापित किए जाएँ।
- न्यायालयों और राज्यों की प्रणालियों के बीच अंतर-संचालनीयता के लिए मानक प्रोटोकॉल अपनाए जाएँ।
- साइबर सुरक्षा ढाँचे को सुदृढ़ कर संवेदनशील न्यायिक डेटा की गोपनीयता सुनिश्चित की जाए।
- केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय तंत्र को सशक्त कर सहकारी संघवाद की भावना से क्रियान्वयन किया जाए।
- प्रक्रिया-संबंधी दिशा-निर्देशों को सरल भाषा में प्रकाशित कर वादियों तक पहुँचाया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना (eCourts Mission Mode Project) · ई-फाइलिंग (e-Filing) · न्यायिक डिजिटलीकरण · राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid) · लंबित मामले और न्यायिक विलंब · अनुच्छेद 21 और शीघ्र विचारण का अधिकार · अनुच्छेद 39A और निःशुल्क विधिक सहायता · इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता · डिजिटल विभाजन (Digital Divide) · डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: त्वरित और निष्पक्ष न्याय का अधिकार
- अनुच्छेद 39A: समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता
अवधारणा प्रवाह
ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना के अंतर्गत न्यायालयों के डिजिटलीकरण की नीतिगत पृष्ठभूमि तैयार होती है। → ई-फाइलिंग की प्रक्रिया को मानकीकृत कर विभिन्न मंचों पर लागू किया जाता है। → प्रशिक्षण, कार्यशाला और जागरूकता के माध्यम से अधिवक्ताओं और वादियों द्वारा प्रक्रिया को अपनाया जाता है। → दस्तावेज़ों के ऑनलाइन दाखिल होने से भौतिक उपस्थिति और कागज़ी कार्य में कमी आती है। → प्रक्रियागत विलंब घटने से त्वरित न्याय (अनुच्छेद 21) और न्याय तक पहुँच का लक्ष्य आगे बढ़ता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना राष्ट्रीय ई-शासन योजना (National e-Governance Plan) के अंतर्गत कार्यान्वित की जाती है।
2. राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid) में जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों के मामलों से संबंधित आँकड़े उपलब्ध रहते हैं।
3. संविधान के अनुच्छेद 39A के अंतर्गत निःशुल्क विधिक सहायता मौलिक अधिकार के रूप में प्रदान की गई है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- इनमें से कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: ई-कोर्ट परियोजना राष्ट्रीय ई-शासन योजना के अंतर्गत आती है। कथन 2 सही है: राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड में न्यायालयों के मामलों के आँकड़े संकलित होते हैं। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 39A राज्य के लिए निर्देशक तत्व (राज्य नीति का निदेशक तत्व) है, मौलिक अधिकार नहीं; निःशुल्क विधिक सहायता का मौलिक अधिकार अनुच्छेद 21 की व्याख्या से विकसित हुआ है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): न्यायिक प्रक्रिया के डिजिटलीकरण से लंबित मामलों के निपटारे में सहायता मिल सकती है।
कथन (R): भारत के उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अंतर्गत शीघ्र विचारण (Speedy Trial) को जीवन और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का अंग माना है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — (A) सही है, क्योंकि ई-फाइलिंग, इलेक्ट्रॉनिक सुनवाई और केस प्रबंधन प्रणाली से प्रक्रियागत देरी घटती है। (R) भी सही है: हुसैनारा खातून बनाम गृह सचिव, बिहार राज्य (1979) जैसे निर्णयों में शीघ्र विचारण को अनुच्छेद 21 का अंग माना गया। (R) सीधे तौर पर (A) की व्याख्या करता है, क्योंकि यही संवैधानिक आधार डिजिटल सुधारों को न्यायिक दायित्व से जोड़ता है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:
सूची I (प्रावधान)
A. संविधान का अनुच्छेद 39A
B. संविधान का अनुच्छेद 21
C. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 3
सूची II (विषय)
i. निःशुल्क विधिक सहायता सुनिश्चित करना
ii. शीघ्र विचारण का अधिकार
iii. इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर द्वारा अभिलेखों का प्रमाणीकरण
सही सुमेलन चुनिए:
- A-i, B-ii, C-iii
- A-ii, B-i, C-iii
- A-i, B-iii, C-ii
- A-iii, B-ii, C-i
उत्तर: A-i, B-ii, C-iii — अनुच्छेद 39A निःशुल्क विधिक सहायता से संबंधित राज्य नीति का निदेशक तत्व है, इसलिए A-i सही है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत शीघ्र विचारण का अधिकार विकसित हुआ है, अतः B-ii सही है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 3 इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर द्वारा प्रमाणीकरण से संबंधित है, अतः C-iii सही है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना के अंतर्गत ई-फाइलिंग जैसी पहलों को न्याय तक पहुँच और न्यायिक विलंब में कमी के साधन के रूप में देखा जाता है। इन पहलों से न्यायिक विलंब में कमी लाने की संभावना की समीक्षा कीजिए। साथ ही बताइए कि डिजिटल साक्ष्य और इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की वैधता से कौन-से विधिक प्रश्न उत्पन्न होते हैं और उनका समाधान किस प्रकार हो सकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा:
1. भूमिका: भारत में लंबित मामलों की समस्या और न्यायिक विलंब को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत शीघ्र न्याय के अधिकार से जोड़ना। हुसैनारा खातून बनाम गृह सचिव, बिहार राज्य (1979) का उल्लेख।
2. संवैधानिक एवं नीतिगत आधार: अनुच्छेद 21 (शीघ्र विचारण), अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता), विधि आयोग की 245वीं रिपोर्ट (2014) जिसमें न्यायिक विलंब और लंबित मामलों पर विचार किया गया।
3. ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना का विकास: प्रथम चरण से चरण-III तक का विस्तार, राष्ट्रीय ई-शासन योजना के अंतर्गत कार्यान्वयन, विधि एवं न्याय मंत्रालय की भूमिका। ई-फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई और केस प्रबंधन प्रणाली के लाभ।
4. राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid) का उपयोग: आँकड़ों के आधार पर लंबित मामलों की निगरानी और नीति-निर्माण में उसकी भूमिका।
5. विश्लेषण: (क) समर्थन में तर्क: प्रक्रियागत विलंब में कमी, पारदर्शिता, दस्तावेज़ों तक तेज़ पहुँच। (ख) सीमाएँ: डिजिटल विभाजन, अधीनस्थ न्यायालयों में अवसंरचना और प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी, न्यायाधीशों की संख्या की समस्या जिसे केवल तकनीक से हल नहीं किया जा सकता। आपराधिक मामलों की जटिलता और मूल समस्या का संतुलन।
6. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की वैधता: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000; भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 (पूर्ववर्ती भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65B का स्थान); अनवर पी.वी. बनाम पी.के. बशीर (2014) में प्रमाण-पत्र की अनिवार्यता; अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंत्याल (2020) में उस अनिवार्यता की पुनर्व्याख्या।
7. डेटा सुरक्षा और गोपनीयता: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता के अधिकार (पुट्टस्वामी निर्णय, 2017) से संतुलन।
8. निष्कर्ष: तकनीक को प्रक्रिया-सुधार के साथ जोड़ने, न्यायिक क्षमता बढ़ाने और डिजिटल समावेशन सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर संतुलित राय।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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