01 Sep छत्तीसगढ़ में मुस्लिम समाज की बैठक: यूसीसी पर होगी चर्चा और रणनीति निर्माण
✎ समान नागरिक संहिता (UCC) भारत के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत आदि व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानून का प्रावधान करती है, जिसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 44 में एक नीति निदेशक तत्व के रूप में किया गया है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
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- Essay: भारत में धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत कानूनों का भविष्य, समान नागरिक संहिता: एक राष्ट्र, एक कानून की ओर?
त्वरित पुनरावृत्ति: समान नागरिक संहिता (UCC) भारत के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत आदि व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानून का प्रावधान करती है, जिसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 44 में एक नीति निदेशक तत्व के रूप में किया गया है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राज्य में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) लागू करने की प्रक्रिया शुरू करने के बाद, मुस्लिम समाज ने रायपुर में एक बैठक बुलाई है। इस बैठक में यूसीसी पर गहन विचार-विमर्श किया जाएगा और समिति को प्रस्तुत किए जाने वाले सुझावों पर रणनीति बनाई जाएगी। राज्य सरकार ने यूसीसी पर सुझाव देने के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया है।
पृष्ठभूमि
- भारत में व्यक्तिगत कानून धर्म पर आधारित हैं, जैसे हिंदू विवाह अधिनियम, 1955; मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937; भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872; और पारसी विवाह तथा तलाक अधिनियम, 1936।
- समान नागरिक संहिता का अर्थ है विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने और उत्तराधिकार जैसे मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून का होना, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो।
- संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि ‘राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।’ यह राज्य के नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles of State Policy – DPSP) का हिस्सा है, जो गैर-प्रवर्तनीय हैं लेकिन शासन के लिए मूलभूत हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार यूसीसी को लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया है, जैसे कि शाह बानो मामले (1985) और सरला मुद्गल मामले (1995) में।
- गोवा एकमात्र ऐसा भारतीय राज्य है जहाँ पुर्तगाली नागरिक संहिता, 1867 के रूप में एक प्रकार की समान नागरिक संहिता लागू है।
- यूसीसी के समर्थकों का तर्क है कि यह लैंगिक समानता को बढ़ावा देगा, राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगा और विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच भेदभाव को समाप्त करेगा। इसके विरोधियों का मानना है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करेगा और भारत की विविधता को कमजोर करेगा।
समान नागरिक संहिता (UCC) क्या है?
- समान नागरिक संहिता (UCC) एक प्रस्तावित कानून है जो भारत के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, गोद लेने, विरासत और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करने वाले कानूनों का एक समान सेट प्रदान करेगा, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो।
- वर्तमान में, भारत में विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून हैं, जो उनके धार्मिक ग्रंथों और रीति-रिवाजों पर आधारित हैं।
- संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को यूसीसी लागू करने का निर्देश देता है, लेकिन यह एक नीति निदेशक सिद्धांत होने के कारण अदालतों द्वारा सीधे लागू नहीं किया जा सकता है।
- यूसीसी का उद्देश्य लैंगिक न्याय और समानता को बढ़ावा देना है, क्योंकि कई व्यक्तिगत कानून महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण माने जाते हैं।
- यह राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने के साधन के रूप में भी देखा जाता है, जहाँ सभी नागरिक एक ही कानून के अधीन हों।
- यूसीसी के कार्यान्वयन में धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करते हुए एक संतुलन बनाना एक महत्वपूर्ण चुनौती है।
- विधि आयोग (Law Commission) ने यूसीसी पर विभिन्न हितधारकों से सुझाव आमंत्रित किए हैं, जो इस मुद्दे पर व्यापक सार्वजनिक बहस और परामर्श का संकेत है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| समान नागरिक संहिता (UCC) पर चर्चा | यह देश में एकरूपता और लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। |
| विभिन्न समुदायों से सुझाव | यह प्रक्रिया समावेशी है और विभिन्न दृष्टिकोणों को ध्यान में रखती है, जिससे एक संतुलित कानून बन सके। |
| विशेषज्ञ समिति का गठन | पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति का गठन कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श सुनिश्चित करता है। |
| सामुदायिक बैठकों का आयोजन | यह जमीनी स्तर पर राय जानने और नागरिकों की भागीदारी को बढ़ावा देने का अवसर प्रदान करता है। |
| लिखित सुझावों का संग्रह | यह सुझावों को व्यवस्थित तरीके से संकलित करने और समिति के समक्ष प्रस्तुत करने में मदद करता है। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों में व्याप्त असमानताओं को दूर कर सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में एक समान कानून स्थापित करना है।
- यह लैंगिक न्याय (Gender Justice) को बढ़ावा देने में सहायक होगा, क्योंकि कई व्यक्तिगत कानून महिलाओं के अधिकारों को सीमित करते हैं।
संवैधानिक महत्व
- संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों (Directive Principles of State Policy) के तहत समान नागरिक संहिता को लागू करने का प्रावधान है, जो राज्य को इसे प्राप्त करने का प्रयास करने का निर्देश देता है।
- यह धर्मनिरपेक्षता (Secularism) के सिद्धांत को मजबूत करेगा, क्योंकि कानून धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।
शासन और विधि निर्माण
- यह कानून के शासन (Rule of Law) को सुदृढ़ करेगा, क्योंकि सभी नागरिकों पर एक ही कानून लागू होगा, जिससे कानूनी जटिलताएं कम होंगी।
- विभिन्न समुदायों से सुझाव आमंत्रित करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी को बढ़ावा देता है और कानून को अधिक स्वीकार्य बनाने में मदद करता है।
चुनौतियाँ
1. धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता
- भारत एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश है, जहाँ प्रत्येक समुदाय के अपने व्यक्तिगत कानून और परंपराएँ हैं। इन परंपराओं में हस्तक्षेप को लेकर धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- विभिन्न समुदायों के बीच आम सहमति बनाना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि प्रत्येक समुदाय अपने व्यक्तिगत कानूनों को अपनी पहचान का अभिन्न अंग मानता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय समाज / सामाजिक न्याय
2. कानूनी और संवैधानिक जटिलताएँ
- विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों को एक समान संहिता में एकीकृत करना एक जटिल कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें कई मौजूदा कानूनों को निरस्त या संशोधित करना होगा।
- समान नागरिक संहिता के लागू होने पर मौलिक अधिकारों, विशेषकर धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) के साथ इसके संभावित टकराव पर कानूनी बहस हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान / न्यायपालिका
3. कार्यान्वयन और प्रवर्तन
- एक बार कानून बन जाने के बाद, इसके प्रभावी कार्यान्वयन और प्रवर्तन के लिए एक मजबूत न्यायिक और प्रशासनिक ढाँचे की आवश्यकता होगी।
- नागरिकों को नए कानून के बारे में शिक्षित करना और उन्हें इसके लाभों के बारे में समझाना एक महत्वपूर्ण चुनौती होगी।
यूपीएससी लिंक: शासन / लोक प्रशासन
4. राजनीतिक ध्रुवीकरण
- समान नागरिक संहिता का मुद्दा अक्सर राजनीतिक बहस और ध्रुवीकरण का कारण बनता है, जिससे इसके निष्पक्ष और तर्कसंगत विचार-विमर्श में बाधा आ सकती है।
- विभिन्न राजनीतिक दल इस मुद्दे का उपयोग अपने-अपने वोट बैंक को साधने के लिए कर सकते हैं, जिससे आम सहमति बनाना और भी मुश्किल हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजनीति / शासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| धार्मिक स्वतंत्रता | संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के साथ संभावित टकराव। |
| सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण | विभिन्न समुदायों की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं के ह्रास की आशंका। |
| सामाजिक स्वीकृति | सभी समुदायों, विशेषकर अल्पसंख्यकों द्वारा नए कानून को स्वीकार करने में प्रतिरोध। |
| कानूनी एकरूपता बनाम व्यक्तिगत कानून | व्यक्तिगत कानूनों की सदियों पुरानी परंपराओं को एक समान संहिता से बदलने की व्यवहार्यता। |
| राजनीतिक इच्छाशक्ति और आम सहमति | एक संवेदनशील मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने में कठिनाई। |
आगे की राह
- सभी हितधारकों, विशेषकर धार्मिक और सामुदायिक नेताओं के साथ व्यापक परामर्श और संवाद स्थापित किया जाए।
- एक विशेषज्ञ समिति द्वारा सभी व्यक्तिगत कानूनों का गहन अध्ययन किया जाए ताकि उनकी समानताएँ और असमानताएँ समझी जा सकें।
- समान नागरिक संहिता के मसौदे को सार्वजनिक डोमेन में रखा जाए ताकि व्यापक जन-चर्चा और सुझाव प्राप्त किए जा सकें।
- कानून के माध्यम से लैंगिक न्याय और समानता के सिद्धांतों पर जोर दिया जाए, न कि किसी विशेष समुदाय को लक्षित करने पर।
- चरणबद्ध तरीके से समान नागरिक संहिता को लागू करने पर विचार किया जा सकता है, जिससे समाज को अनुकूलन का समय मिल सके।
- नागरिकों को समान नागरिक संहिता के उद्देश्यों और लाभों के बारे में शिक्षित करने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएँ।
- विधि आयोग (Law Commission) और अन्य संवैधानिक निकायों की सिफारिशों को ध्यान में रखा जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
समान नागरिक संहिता · अनुच्छेद 44 · मूलभूत अधिकार · राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत · व्यक्तिगत कानून · धार्मिक स्वतंत्रता · संघवाद · विधि आयोग · न्यायिक समीक्षा · सामाजिक सुधार
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 44’: ‘राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत, UCC का प्रावधान।’}
- {‘अनुच्छेद 25’: ‘धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार, UCC से संभावित संबंध।’}
- {‘अनुच्छेद 14’: ‘कानून के समक्ष समानता, UCC का आधार।’}
- {‘अनुच्छेद 15’: ‘धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव का निषेध।’}
अवधारणा प्रवाह
राज्य सरकार द्वारा UCC समिति का गठन → समिति द्वारा विभिन्न समुदायों से सुझाव आमंत्रित करना → मुस्लिम समाज द्वारा बैठक का आयोजन → बैठक में UCC पर गहन विचार-विमर्श → समिति को लिखित सुझाव प्रस्तुत करना → समिति द्वारा सुझावों का विश्लेषण और मसौदा तैयार करना → सरकार द्वारा UCC पर अंतिम निर्णय और विधि निर्माण
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता को परिभाषित करता है।
2. समान नागरिक संहिता राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों का हिस्सा है।
3. भारत में गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ समान नागरिक संहिता लागू है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता को परिभाषित नहीं करता, बल्कि राज्य को इसे सुरक्षित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है। कथन 2 सही है क्योंकि समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 44 के तहत राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों (Directive Principles of State Policy – DPSP) में शामिल है। कथन 3 सही है क्योंकि गोवा में पुर्तगाली नागरिक संहिता 1867 के तहत समान नागरिक संहिता लागू है।
Q2. समान नागरिक संहिता (UCC) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सबसे उपयुक्त है?
- यह सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में एक समान कानून प्रदान करता है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो।
- यह केवल आपराधिक मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू करता है।
- यह केवल अल्पसंख्यक समुदायों के लिए व्यक्तिगत कानूनों को विनियमित करता है।
- यह राज्य सरकारों को अपने विवेक पर व्यक्तिगत कानून बनाने की अनुमति देता है।
उत्तर: यह सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में एक समान कानून प्रदान करता है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। — समान नागरिक संहिता का अर्थ है कि देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानून हो, भले ही वे किसी भी धर्म के हों। यह विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय एक एकीकृत कानूनी ढांचा प्रदान करने का प्रयास करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करने के संवैधानिक निहितार्थों और सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर में समान नागरिक संहिता (UCC) के संवैधानिक आधार (अनुच्छेद 44, राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत) और इसके उद्देश्यों को स्पष्ट करना चाहिए। संवैधानिक निहितार्थों में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 25-28) और समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) के साथ इसके संभावित टकराव या सामंजस्य पर चर्चा शामिल होनी चाहिए। सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों में विभिन्न धार्मिक समुदायों की आशंकाएं, व्यक्तिगत कानूनों की विविधता, पहचान की राजनीति और एकरूपता बनाम विविधता का संतुलन शामिल होना चाहिए। विधि आयोग की रिपोर्टों, विभिन्न न्यायिक निर्णयों (जैसे शाह बानो मामला, सरला मुद्गल मामला) और संबंधित समितियों के विचारों का उल्लेख करते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहिए। निष्कर्ष में राष्ट्रीय एकता और सामाजिक न्याय के संदर्भ में इसके महत्व और चुनौतियों को रेखांकित करना चाहिए।
स्रोत: amarujala.com
Chhattisgarh PCS (CGPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: छत्तीसगढ़ राज्य में ‘समान नागरिक संहिता (UCC)’ पर विचार-विमर्श हेतु आयोजित बैठक का मुख्य आयोजक कौन है?
- छत्तीसगढ़ मुस्लिम समाज संघ
- छत्तीसगढ़ राज्य अल्पसंख्यक आयोग
- रायपुर नगर निगम
- छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय
उत्तर: छत्तीसगढ़ राज्य अल्पसंख्यक आयोग — छत्तीसगढ़ राज्य अल्पसंख्यक आयोग द्वारा मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों की बैठक आयोजित की जा रही है, जिसमें UCC पर मंथन किया जाएगा।
Mains: छत्तीसगढ़ राज्य में ‘समान नागरिक संहिता (UCC)’ के लागू होने से राज्य की जनजातीय एवं अल्पसंख्यक समुदायों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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