तमिलनाडु निश्चित पेंशन योजना: केंद्र से ₹11,000 करोड़ स्वीकृति की प्रतीक्षा

Tamil Nadu Assured Pension Scheme will be implemented as soon as Centre sanctions borrowing of ₹11,000 crore, says Marie — concept mind map

तमिलनाडु निश्चित पेंशन योजना: केंद्र से ₹11,000 करोड़ स्वीकृति की प्रतीक्षा

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✎ राज्यों की उधार लेने की शक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 293(3) द्वारा नियंत्रित होती है, जिसके तहत केंद्र सरकार से बकाया ऋण होने पर राज्यों को केंद्र की अनुमति के बिना नया ऋण लेने की अनुमति नहीं होती है, जो राजकोषीय संघवाद में…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान – संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघवाद से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ।  |  GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाना, संवृद्धि, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय। सरकारी बजट।
  • Prelims: राजकोषीय संघवाद, केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध, राज्य ऋण, राजकोषीय घाटा, उधार सीमा, अनुच्छेद 293(3)
  • Essay: भारत में राजकोषीय संघवाद की चुनौतियाँ और संभावनाएँ।, कल्याणकारी राज्य की अवधारणा और राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता।

त्वरित पुनरावृत्ति: राज्यों की उधार लेने की शक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 293(3) द्वारा नियंत्रित होती है, जिसके तहत केंद्र सरकार से बकाया ऋण होने पर राज्यों को केंद्र की अनुमति के बिना नया ऋण लेने की अनुमति नहीं होती है, जो राजकोषीय संघवाद में एक महत्वपूर्ण पहलू है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

तमिलनाडु सरकार ने घोषणा की है कि तमिलनाडु सुनिश्चित पेंशन योजना (Tamil Nadu Assured Pension Scheme – TAPS) को तभी लागू किया जाएगा जब केंद्र सरकार राज्य के लिए ₹11,000 करोड़ के उधार को स्वीकृति देगी। राज्य के वित्त मंत्री ने बताया कि केंद्र की स्वीकृति मिलने तक सेवानिवृत्त होने वाले या 1 जनवरी, 2026 को या उसके बाद सेवानिवृत्त होने वाले व्यक्तियों को अंतरिम भुगतान दिया जाएगा। यह मुद्दा केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों और राज्यों की उधार लेने की शक्ति पर केंद्र के नियंत्रण को उजागर करता है।

पृष्ठभूमि

  • राज्यों को अपनी वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाजार से उधार लेने की अनुमति है।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 293(3) (Article 293(3)) कहता है कि यदि किसी राज्य ने भारत सरकार से कोई ऋण लिया है या उसके संबंध में भारत सरकार द्वारा दी गई गारंटी है, तो वह राज्य केंद्र की सहमति के बिना कोई और ऋण नहीं ले सकता।
  • केंद्र सरकार राज्यों के ऋण पर एक वार्षिक सीमा निर्धारित करती है, जो राज्य सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) के प्रतिशत के रूप में होती है। यह सीमा राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम के सिद्धांतों पर आधारित होती है।
  • राज्यों की उधार लेने की क्षमता उनकी राजस्व स्थिति, व्यय प्रतिबद्धताओं और केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित राजकोषीय सीमाओं से प्रभावित होती है।
  • पेंशन योजनाओं का वित्तपोषण राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण और बढ़ता हुआ वित्तीय बोझ है, खासकर जब पुरानी पेंशन योजना (OPS) की ओर लौटने की मांग बढ़ रही है।
  • तमिलनाडु सरकार ने अपनी वित्तीय स्थिति पर एक श्वेत पत्र जारी किया था, जिसमें राजस्व घाटे में वृद्धि और राज्य के अपने कर राजस्व (State’s Own Tax Revenue) में गिरावट का उल्लेख किया गया था।

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध और उधार सीमाएँ

  • भारतीय संविधान केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों और जिम्मेदारियों के वितरण के लिए एक विस्तृत ढाँचा प्रदान करता है, जिसे राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) कहा जाता है।
  • राजस्व के प्रमुख स्रोतों में करों का विभाजन (जैसे आयकर, निगम कर, GST), केंद्र से राज्यों को अनुदान (अनुच्छेद 275 और 282 के तहत), और राज्यों की अपनी कर एवं गैर-कर राजस्व शामिल हैं।
  • वित्त आयोग (Finance Commission) प्रत्येक पाँच वर्ष में केंद्र और राज्यों के बीच कर राजस्व के वितरण की सिफारिश करता है, जिसे ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज वितरण कहा जाता है।
  • राज्यों को अपनी विकासात्मक और कल्याणकारी योजनाओं को वित्तपोषित करने के लिए बाजार से उधार लेने की अनुमति है, लेकिन यह शक्ति संविधान के अनुच्छेद 293 द्वारा नियंत्रित होती है।
  • अनुच्छेद 293(3) के तहत, यदि किसी राज्य पर केंद्र सरकार का कोई बकाया ऋण है, तो उसे केंद्र की अनुमति के बिना कोई नया ऋण लेने की अनुमति नहीं है। यह प्रावधान केंद्र को राज्यों की उधार लेने की क्षमता पर नियंत्रण रखने में सक्षम बनाता है।
  • केंद्र सरकार राज्यों के लिए सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के प्रतिशत के रूप में वार्षिक उधार सीमाएँ निर्धारित करती है, जिसका उद्देश्य राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करना है।
  • राज्यों द्वारा उधार लेने की सीमाएँ उनकी राजकोषीय स्थिति, ऋण-से-GSDP अनुपात और केंद्र सरकार की व्यापक आर्थिक नीतियों पर निर्भर करती हैं।
  • पेंशन योजनाओं जैसी कल्याणकारी योजनाओं का वित्तपोषण राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय चुनौती प्रस्तुत करता है, खासकर जब वे अपनी उधार लेने की क्षमता पर प्रतिबंधों का सामना करते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
तमिलनाडु सुनिश्चित पेंशन योजना (TAPS) राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित एक नई पेंशन योजना, जिसका उद्देश्य सेवानिवृत्त या 1 जनवरी, 2026 को या उसके बाद सेवानिवृत्त होने वाले व्यक्तियों को अंतरिम भुगतान प्रदान करना है।
केंद्र सरकार की स्वीकृति इस योजना के पूर्ण कार्यान्वयन के लिए केंद्र सरकार द्वारा 11,000 करोड़ रुपये के ऋण को मंजूरी देना आवश्यक है।
अंतरिम भुगतान केंद्र की मंजूरी लंबित रहने तक, राज्य सरकार ने पात्र व्यक्तियों को अंतरिम भुगतान देने का निर्णय लिया है।
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महत्व

राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism)

  • यह मामला केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय संबंधों, विशेषकर ऋण लेने की शक्तियों और केंद्र की मंजूरी की आवश्यकता को दर्शाता है।
  • यह राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और केंद्र के नियामक नियंत्रण के बीच संतुलन को रेखांकित करता है।

राज्य वित्त प्रबंधन

  • यह राज्य सरकारों के सामने आने वाली राजकोषीय चुनौतियों, जैसे राजस्व घाटा और ऋण संचय को उजागर करता है।
  • यह दर्शाता है कि कैसे राज्य सरकारें अपनी वित्तीय स्थिति को स्थिर करने और कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने के लिए संघर्ष करती हैं।

सामाजिक कल्याण और पेंशन सुधार

  • यह पेंशन योजनाओं के माध्यम से नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की राज्य की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
  • यह पेंशन प्रणाली में सुधार और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के बीच की चुनौती को प्रस्तुत करता है।

चुनौतियाँ

1. राजकोषीय घाटा और ऋण संचय

  • तमिलनाडु का राजस्व घाटा 2021-22 में 46,538 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 78,324 करोड़ रुपये हो गया है, जो राज्य के वित्त पर भारी दबाव डालता है।
  • राज्य का अपना कर राजस्व (State’s Own Tax Revenue) और GSDP संवृद्धि दर में गिरावट राज्य की वित्तीय स्थिति को और कमजोर करती है।

2. केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध

  • राज्य सरकारों द्वारा ऋण लेने के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी की आवश्यकता राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को प्रभावित करती है।
  • केंद्र की मंजूरी में देरी राज्य की कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में बाधा डाल सकती है।

3. पेंशन योजनाओं की स्थिरता

  • पुरानी पेंशन योजनाओं से उत्पन्न होने वाली वित्तीय देनदारियां राज्यों के बजट पर दीर्घकालिक दबाव डालती हैं।
  • नई पेंशन योजनाओं को लागू करते समय वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है।

4. चुनावी वादों का कार्यान्वयन

  • राज्य सरकारों के लिए चुनावी वादों को वित्तीय बाधाओं के बावजूद पूरा करना एक चुनौती है।
  • योजनाओं के कार्यान्वयन में देरी से जनता का असंतोष बढ़ सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
उच्च राजस्व घाटा राज्य के वित्तीय स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव, विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन की कमी।
केंद्र की ऋण स्वीकृति राज्य की वित्तीय स्वायत्तता पर प्रभाव और महत्वपूर्ण योजनाओं के कार्यान्वयन में देरी।
पेंशन देनदारियां बढ़ती पेंशन लागत राज्य के बजट पर दीर्घकालिक दबाव डालती है।
GSDP संवृद्धि दर में गिरावट राजस्व सृजन क्षमता में कमी और आर्थिक विकास की धीमी गति।
चुनावी वादों का दबाव वित्तीय बाधाओं के बावजूद लोकलुभावन योजनाओं को लागू करने की आवश्यकता।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • तमिलनाडु सुनिश्चित पेंशन योजना (Tamil Nadu Assured Pension Scheme – TAPS)

आगे की राह

  • राज्य सरकारों को अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने के लिए राजस्व सृजन के नए रास्ते तलाशने चाहिए।
  • केंद्र और राज्यों के बीच ऋण लेने की शक्तियों के संबंध में स्पष्ट और पारदर्शी दिशानिर्देश स्थापित किए जाने चाहिए।
  • पेंशन योजनाओं की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए दीर्घकालिक सुधारों पर विचार किया जाना चाहिए।
  • राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम के सिद्धांतों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए।
  • केंद्र सरकार को राज्यों की विशिष्ट वित्तीय चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए ऋण स्वीकृति प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना चाहिए।
  • राज्य सरकारों को चुनावी वादों और वित्तीय व्यवहार्यता के बीच संतुलन स्थापित करना चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

राज्य ऋण · राजकोषीय संघवाद · राजकोषीय घाटा · राज्यों की उधार लेने की शक्ति · संविधान का अनुच्छेद 293 · केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध · सार्वजनिक ऋण प्रबंधन · राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (FRBM) · राज्य वित्त · पेंशन योजनाएं

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 293: राज्यों द्वारा ऋण लेना
  • अनुच्छेद 280: वित्त आयोग का गठन
  • सातवीं अनुसूची: केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण

अवधारणा प्रवाह

राज्य सरकार द्वारा नई पेंशन योजना का प्रस्ताव  →  योजना के लिए केंद्र से ऋण स्वीकृति की आवश्यकता  →  केंद्र की मंजूरी में देरी के कारण अंतरिम भुगतान का निर्णय  →  राज्य की बिगड़ती राजकोषीय स्थिति (उच्च राजस्व घाटा, GSDP गिरावट)  →  केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों और राजकोषीय संघवाद पर बहस

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 293 राज्यों को केंद्र सरकार की सहमति के बिना घरेलू और विदेशी स्रोतों से उधार लेने की शक्ति देता है।
2. केंद्र सरकार राज्यों के उधार लेने पर सीमाएं लगा सकती है, खासकर यदि राज्य पर केंद्र का कोई बकाया ऋण हो।
3. राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003, केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के लिए राजकोषीय घाटे को कम करने के लक्ष्य निर्धारित करता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है। अनुच्छेद 293(3) के अनुसार, यदि किसी राज्य पर भारत सरकार का कोई बकाया ऋण है, तो वह राज्य केंद्र सरकार की सहमति के बिना कोई भी ऋण नहीं ले सकता है। कथन 2 सही है। अनुच्छेद 293(4) केंद्र सरकार को ऐसी सहमति देते समय शर्तें लगाने का अधिकार देता है। कथन 3 गलत है। FRBM अधिनियम मुख्य रूप से केंद्र सरकार के लिए था, हालांकि राज्यों ने अपने स्वयं के FRBM अधिनियम बनाए हैं, लेकिन केंद्रीय FRBM अधिनियम सीधे राज्यों के लक्ष्य निर्धारित नहीं करता।

Q2. अभिकथन (A): केंद्र सरकार की सहमति के बिना राज्य सरकारें खुले बाजार से उधार नहीं ले सकती हैं।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 293 केंद्र सरकार को राज्यों के उधार लेने पर नियंत्रण रखने का अधिकार देता है, खासकर यदि राज्य पर केंद्र का कोई बकाया ऋण हो।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं। अनुच्छेद 293(3) स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि किसी राज्य पर भारत सरकार का कोई बकाया ऋण है, तो वह केंद्र की सहमति के बिना कोई भी ऋण नहीं ले सकता है। यह प्रावधान केंद्र सरकार को राज्यों के उधार लेने पर नियंत्रण रखने का अधिकार देता है, जो राजकोषीय स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ राज्यों द्वारा उधार लेने की शक्ति पर संवैधानिक प्रावधानों और केंद्र सरकार की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या केंद्र का यह नियंत्रण राजकोषीय संघवाद की भावना के अनुरूप है? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: राज्यों की उधार लेने की शक्ति का संक्षिप्त उल्लेख और केंद्र की भूमिका का संदर्भ।
2. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 293 का विस्तृत विश्लेषण, विशेष रूप से 293(3) और 293(4) का उल्लेख।
3. केंद्र सरकार की भूमिका: केंद्र की सहमति की आवश्यकता, शर्तों का अधिरोपण, और राजकोषीय उत्तरदायित्व बनाए रखने में इसकी भूमिका।
4. राजकोषीय संघवाद पर प्रभाव: उन तर्कों पर चर्चा करें जो इसे संघवाद के अनुरूप मानते हैं (राजकोषीय अनुशासन, समष्टि-आर्थिक स्थिरता) और उन तर्कों पर भी जो इसे राज्यों की स्वायत्तता पर अतिक्रमण मानते हैं (राज्य की विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने में बाधा)।
5. संबंधित समितियाँ/सिफारिशें: वित्त आयोगों की सिफारिशों या अन्य विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्टों का उल्लेख, यदि प्रासंगिक हो।
6. निष्कर्ष: केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल देते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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