12 Sep बद्री मवेशी संरक्षण में बड़ी सफलता: ओपीयू-आईवीएफ तकनीक से जन्मा बछड़ा
✎ ओपीयू-आईवीएफ तकनीक उत्तराखंड के बद्री मवेशियों के आनुवंशिक सुधार और संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है, जो मूल्यवान जर्मप्लाज्म के तीव्र गुणन को सक्षम बनाती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (Science & Technology) | GS Paper III — पर्यावरण एवं जैव-विविधता (Environment & Biodiversity) | GS Paper III — कृषि (Agriculture)
- Prelims: बद्री मवेशी, ओवम पिक-अप (ओपीयू), इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ), भ्रूण प्रत्यारोपण, जर्मप्लाज्म संरक्षण, आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई), जी. बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय
- Essay: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का ग्रामीण विकास में योगदान, जैव-विविधता संरक्षण और सतत विकास
त्वरित पुनरावृत्ति: ओपीयू-आईवीएफ तकनीक उत्तराखंड के बद्री मवेशियों के आनुवंशिक सुधार और संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है, जो मूल्यवान जर्मप्लाज्म के तीव्र गुणन को सक्षम बनाती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, उत्तराखंड के बद्री मवेशियों में ‘ओवम पिक-अप’ और ‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन’ (ओपीयू-आईवीएफ) तकनीक का उपयोग करके एक स्वस्थ बछिया का जन्म हुआ है। यह उपलब्धि उत्तराखंड की इस महत्वपूर्ण देसी नस्ल के संरक्षण, आनुवंशिक सुधार और तीव्र गुणन की दिशा में एक बड़ी सफलता मानी जा रही है। इस तकनीक के तहत बद्री नस्ल के भ्रूण को साहीवाल नस्ल की गाय में प्रत्यारोपित किया गया था।
पृष्ठभूमि
- बद्री मवेशी उत्तराखंड का एक महत्वपूर्ण देसी आनुवंशिक संसाधन है और इसे उत्तराखंड का राज्य पशु माना जाता है।
- यह उपलब्धि करनाल स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-एनडीआरआई) और उत्तराखंड के पंतनगर स्थित जी. बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के आपसी सहयोग से हासिल की गई है।
- यह अनुसंधान कार्यक्रम 2023 में जी. बी. पंत विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. एम. एस. चौहान के नेतृत्व में शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य बद्री मवेशियों के जर्मप्लाज्म के संरक्षण एवं गुणन के लिए उन्नत प्रजनन तकनीक स्थापित करना था।
- उन्नत भ्रूण प्रौद्योगिकी (एडवांस्ड एम्ब्रियो टेक्नोलॉजी) देसी मवेशियों की नस्लों के संरक्षण, उनकी संख्या बढ़ाने और आनुवंशिक सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- ओपीयू-आईवीएफ जैसी उन्नत प्रजनन तकनीकें बेहतरीन मादा जर्मप्लाज्म को तेजी से गुणन में मदद कर सकती हैं और नस्ल सुधार एवं जर्मप्लाज्म संरक्षण हेतु व्यवस्थित कार्यक्रम बनाने में सहायक होती हैं।
ओवम पिक-अप (ओपीयू) और इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) तकनीक क्या है?
- ओपीयू-आईवीएफ एक उन्नत प्रजनन जैव-प्रौद्योगिकी है जिसका उपयोग पशुओं में आनुवंशिक सुधार और नस्ल संरक्षण के लिए किया जाता है।
- ओवम पिक-अप (ओपीयू) प्रक्रिया में, अल्ट्रासाउंड-निर्देशित विधि का उपयोग करके आनुवंशिक रूप से मूल्यवान चुनिंदा दाता (डोनर) गायों से अंडे (ओसाइट्स) एकत्रित किए जाते हैं।
- एकत्रित किए गए अंडों को प्रयोगशाला में परिपक्व किया जाता है और फिर ‘इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन’ (आईवीएफ) के तहत आनुवंशिक रूप से बेहतर सांड के वीर्य का उपयोग करके निषेचित किया जाता है।
- निषेचन के परिणामस्वरूप बने भ्रूणों को नियंत्रित प्रयोगशाला स्थितियों में विकसित किया जाता है।
- विकसित भ्रूणों को बाद में उपयुक्त प्राप्तकर्ता (रिसीपिएंट) गायों में प्रत्यारोपित किया जाता है, जो गर्भावस्था को आगे बढ़ाती हैं और स्वस्थ बछड़े को जन्म देती हैं।
- यह तकनीक प्रजनन के पारंपरिक तरीकों की तुलना में बेहतरीन जर्मप्लाज्म के गुणन की दर को काफी बढ़ा देती है, जिससे कम समय में अधिक संख्या में आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठ पशु प्राप्त किए जा सकते हैं।
- यह आनुवंशिक रूप से बेहतर मादा जानवरों से कई भ्रूण बनाने में मदद करती है, जो नस्ल के संरक्षण और आनुवंशिक सुधार के लिए महत्वपूर्ण है।
- इस तकनीक का उपयोग विलुप्तप्राय या संकटग्रस्त नस्लों के संरक्षण में भी किया जा सकता है, जिससे उनकी आबादी को बढ़ाया जा सके।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| ओवम पिक-अप (Oocyte Pick-Up – OPU) | यह आनुवंशिक रूप से मूल्यवान दाता गायों से अंडे (ओसाइट्स) एकत्र करने की एक विधि है, जो पारंपरिक प्रजनन की तुलना में अधिक भ्रूण उत्पादन में सहायक है। |
| इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) | यह प्रयोगशाला परिस्थितियों में अंडे और शुक्राणु के निषेचन की प्रक्रिया है, जिससे नियंत्रित वातावरण में भ्रूण विकसित किए जा सकते हैं। |
| भ्रूण प्रत्यारोपण (Embryo Transfer) | उत्पादित भ्रूणों को प्राप्तकर्ता (रेसिपिएंट) गायों में प्रत्यारोपित किया जाता है, जिससे आनुवंशिक रूप से बेहतर बछड़ों का जन्म होता है। |
| बद्री नस्ल | उत्तराखंड की एक महत्वपूर्ण स्वदेशी मवेशी नस्ल, जिसे राज्य पशु का दर्जा प्राप्त है। यह हिमालयी परिस्थितियों के अनुकूल है। |
| जर्मप्लाज्म संरक्षण | किसी प्रजाति के आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण, जो भविष्य में प्रजनन और आनुवंशिक सुधार के लिए महत्वपूर्ण है। |
महत्व
आनुवंशिक सुधार एवं संरक्षण
- यह तकनीक बद्री मवेशियों जैसी स्वदेशी नस्लों के आनुवंशिक सुधार और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिससे उनकी उत्पादकता और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
- यह मूल्यवान ‘बद्री जर्मप्लाज्म’ के तीव्र गुणन में मदद करता है, जिससे इस नस्ल की संख्या में वृद्धि होगी और इसके विलुप्त होने का खतरा कम होगा।
आर्थिक महत्व
- बेहतर आनुवंशिकी वाले मवेशी अधिक दूध उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पादों में योगदान कर सकते हैं, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होगी।
- स्वदेशी नस्लों का संरक्षण स्थानीय जैव विविधता और कृषि-पारिस्थितिकी प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा में योगदान देता है।
वैज्ञानिक एवं तकनीकी उन्नति
- यह उपलब्धि उन्नत प्रजनन जैव-प्रौद्योगिकी (Advanced Reproductive Biotechnology) की क्षमता को दर्शाती है और भारत में पशुधन प्रजनन अनुसंधान में मील का पत्थर है।
- यह अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देता है, जिससे भविष्य में अन्य स्वदेशी नस्लों के संरक्षण और सुधार के लिए इसी तरह की तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है।
चुनौतियाँ
1. उच्च लागत और विशेषज्ञता
- ओपीयू-आईवीएफ जैसी उन्नत प्रजनन तकनीकों को लागू करने के लिए उच्च प्रारंभिक निवेश और विशेष रूप से प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता होती है।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पशुधन विकास
2. तकनीकी बुनियादी ढाँचा
- दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों में इन तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए आवश्यक प्रयोगशाला सुविधाओं और उपकरणों की कमी एक चुनौती हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: बुनियादी ढाँचा विकास, कृषि नीतियाँ
3. नैतिक और सामाजिक स्वीकृति
- कुछ समुदायों में कृत्रिम प्रजनन तकनीकों को लेकर नैतिक या सामाजिक आपत्तियाँ हो सकती हैं, जिन्हें संबोधित करने की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक मुद्दे, ग्रामीण विकास
4. रोग नियंत्रण और जैव सुरक्षा
- भ्रूण प्रत्यारोपण और क्लोनिंग जैसी प्रक्रियाओं में उचित जैव सुरक्षा उपायों का पालन करना महत्वपूर्ण है ताकि बीमारियों के प्रसार को रोका जा सके।
यूपीएससी लिंक: पशुधन स्वास्थ्य, सार्वजनिक स्वास्थ्य
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| तकनीकी पहुंच | उन्नत प्रजनन तकनीकों की पहुंच छोटे और सीमांत किसानों तक सुनिश्चित करना। |
| वित्तीय सहायता | किसानों को इन महंगी तकनीकों को अपनाने के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता और सब्सिडी प्रदान करना। |
| प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण | पशु चिकित्सकों और तकनीशियनों के लिए इन तकनीकों में विशेषज्ञता विकसित करने हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अभाव। |
| आनुवंशिक विविधता का संरक्षण | जर्मप्लाज्म के तीव्र गुणन के साथ-साथ नस्ल के भीतर आनुवंशिक विविधता को बनाए रखना ताकि ‘इनब्रीडिंग डिप्रेशन’ से बचा जा सके। |
आगे की राह
- उन्नत प्रजनन तकनीकों (ART) के अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना, विशेषकर स्वदेशी नस्लों के लिए।
- किसानों को ओपीयू-आईवीएफ जैसी तकनीकों को अपनाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन और सब्सिडी प्रदान करना।
- पशु चिकित्सकों और तकनीशियनों के लिए इन तकनीकों में प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित करना।
- ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यक बुनियादी ढाँचे और प्रयोगशाला सुविधाओं का विकास करना ताकि इन तकनीकों की पहुंच बढ़ाई जा सके।
- स्वदेशी नस्लों के जर्मप्लाज्म बैंकों की स्थापना और सुदृढ़ीकरण करना ताकि आनुवंशिक विविधता का संरक्षण सुनिश्चित हो सके।
- पशुधन प्रजनन नीतियों को अद्यतन करना ताकि उन्नत प्रजनन तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा दिया जा सके और नैतिक दिशानिर्देश स्थापित किए जा सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
बद्री मवेशी · ओवम पिक-अप और इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (ओपीयू-आईवीएफ) तकनीक · उन्नत भ्रूण प्रौद्योगिकी · जर्मप्लाज्म संरक्षण · आनुवंशिक सुधार · पशुधन विकास · राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) · उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद · कृषि जैव-प्रौद्योगिकी · ग्रामीण अर्थव्यवस्था
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48’, ‘note’: ‘कृषि और पशुपालन का संगठन’}
अवधारणा प्रवाह
उत्तराखंड की बद्री गायों से अल्ट्रासाउंड-निर्देशित ओवम पिक-अप (OPU) द्वारा अंडे एकत्र करना। → एकत्रित अंडों को प्रयोगशाला में परिपक्व करना और आनुवंशिक रूप से बेहतर बद्री सांड के वीर्य से इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) करना। → निषेचित अंडों से विकसित भ्रूणों को नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में पोषित करना। → विकसित बद्री भ्रूणों को साहीवाल जैसी प्राप्तकर्ता (रेसिपिएंट) गायों में प्रत्यारोपित करना। → प्राप्तकर्ता गाय द्वारा स्वस्थ बद्री बछिया को जन्म देना, जिससे बद्री नस्ल का आनुवंशिक सुधार और संरक्षण होता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बद्री मवेशी उत्तराखंड का एक महत्वपूर्ण देशी आनुवंशिक संसाधन है और इसे उत्तराखंड का राज्य पशु माना जाता है।
2. ओपीयू-आईवीएफ तकनीक में, आनुवंशिक रूप से मूल्यवान चुनिंदा दाता गायों से अंडे (ओसाइट्स) एकत्रित किए जाते हैं और फिर इन-विट्रो फर्टिलाइज किए जाते हैं।
3. राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) करनाल में स्थित है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि बद्री मवेशी उत्तराखंड का एक महत्वपूर्ण देशी आनुवंशिक संसाधन है और इसे राज्य पशु माना जाता है। कथन 2 सही है क्योंकि ओपीयू-आईवीएफ तकनीक में अल्ट्रासाउंड-निर्देशित ओवम पिक-अप के जरिए दाता गायों से अंडे एकत्रित कर इन-विट्रो फर्टिलाइज किया जाता है। कथन 3 सही है क्योंकि आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) करनाल, हरियाणा में स्थित है।
Q2. ओपीयू-आईवीएफ (Oocyte Pick-Up and In Vitro Fertilization) तकनीक का उपयोग मुख्य रूप से किस उद्देश्य के लिए किया जाता है?
- फसलों में कीट नियंत्रण
- मवेशियों में दूध उत्पादन बढ़ाना
- पशुधन की आनुवंशिक विविधता और नस्ल सुधार
- मछली पालन में वृद्धि
उत्तर: पशुधन की आनुवंशिक विविधता और नस्ल सुधार — ओपीयू-आईवीएफ तकनीक का उपयोग मुख्य रूप से पशुधन की आनुवंशिक विविधता को बढ़ाने, नस्ल सुधार करने और मूल्यवान जर्मप्लाज्म के तेजी से गुणन के लिए किया जाता है, जैसा कि बद्री मवेशी के संदर्भ में देखा गया है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पशुधन क्षेत्र में उन्नत प्रजनन तकनीकों, जैसे ओपीयू-आईवीएफ, के महत्व का परीक्षण कीजिए। ये तकनीकें भारत में देशी पशुधन नस्लों के संरक्षण और आनुवंशिक सुधार में किस प्रकार योगदान दे सकती हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर में उन्नत प्रजनन तकनीकों (Advanced Reproductive Technologies) जैसे ओवम पिक-अप और इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (Oocyte Pick-Up and In Vitro Fertilization – OPU-IVF) का परिचय दें। इनके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं में स्पष्ट करें:
1. **जर्मप्लाज्म संरक्षण:** दुर्लभ या लुप्तप्राय देशी नस्लों के आनुवंशिक संसाधनों (Germplasm) के संरक्षण में भूमिका। बद्री मवेशी का उदाहरण दें।
2. **आनुवंशिक सुधार:** उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले जानवरों से भ्रूण का तेजी से उत्पादन कर नस्ल सुधार में सहायता।
3. **उत्पादकता वृद्धि:** उन्नत नस्लों के माध्यम से दूध, मांस और अन्य उत्पादों की उत्पादकता में वृद्धि।
4. **रोग प्रतिरोधक क्षमता:** रोग प्रतिरोधी गुणों वाली नस्लों के विकास में मदद।
5. **किसानों की आय:** बेहतर पशुधन से किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार।
6. **तकनीकी सहयोग:** राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) जैसे संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों की भूमिका का उल्लेख करें।
7. **चुनौतियाँ और समाधान:** इन तकनीकों को अपनाने में आने वाली चुनौतियों (लागत, तकनीकी ज्ञान की कमी) और उनके संभावित समाधानों पर भी संक्षिप्त चर्चा करें।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Uttarakhand PCS (UKPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: उत्तराखंड में बद्री मवेशियों के संरक्षण एवं आनुवंशिक सुधार के लिए हाल ही में किस तकनीक के माध्यम से बछड़े का जन्म हुआ है?
- ओपीयू-आईवीएफ तकनीक
- जीन एडिटिंग तकनीक
- क्लोनिंग तकनीक
- टिश्यू कल्चर तकनीक
उत्तर: ओपीयू-आईवीएफ तकनीक — ओपीयू-आईवीएफ तकनीक (ओसाइट पिकअप-इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) के माध्यम से बद्री नस्ल के मवेशियों में बछड़े का जन्म हुआ है, जो उनकी आनुवंशिक गुणवत्ता सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
Mains: बद्री मवेशियों की देसी नस्ल के संरक्षण एवं आनुवंशिक सुधार में ओपीयू-आईवीएफ तकनीक की भूमिका एवं महत्व पर प्रकाश डालते हुए, उत्तराखंड सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों का वर्णन कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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