मध्यप्रदेश राज्य कर्मचारी आयोग पुनर्गठन: मलय श्रीवास्तव अध्यक्ष नियुक्त

मध्यप्रदेश राज्य कर्मचारी आयोग पुनर्गठन: मलय श्रीवास्तव अध्यक्ष नियुक्त

मध्यप्रदेश राज्य कर्मचारी आयोग पुनर्गठन: मलय श्रीवास्तव अध्यक्ष नियुक्त

✎ राज्य कर्मचारी आयोग राज्य सरकार की अधिसूचना से बना परामर्शदात्री निकाय है, जो वेतनमान और पदनाम पर सिफारिशें देता है; ये बाध्यकारी नहीं हैं और अन्य राज्यों से तुलना के साथ राज्य की प्रति व्यक्ति आय व वित्तीय स्थिति का ध्यान रखा…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन: लोक सेवाएँ, सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप, कार्यपालिका की संरचना और कार्यप्रणाली  |  GS Paper II — संघीय ढाँचा: राज्य सेवाएँ और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध  |  GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था: राज्यों का सार्वजनिक वित्त, राजकोषीय प्रबंधन और राजस्व व्यय
  • Prelims: राज्य कर्मचारी आयोग (मध्यप्रदेश), वेतन आयोग (Pay Commission), सातवाँ केंद्रीय वेतन आयोग, अनुच्छेद 309, 310 और 311, राज्य सूची की प्रविष्टि 41 (राज्य लोक सेवाएँ), राज्य सूची की प्रविष्टि 42 (राज्य द्वारा देय पेंशन), राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM), प्रति व्यक्ति आय, पेंशन, भविष्य निधि एवं बीमा संचालनालय, राजपत्र अधिसूचना और विचारणीय विषय (Terms of Reference)
  • Essay: वेतन आयोग और राजकोषीय संतुलन: सरकारी कर्मचारियों के कल्याण तथा राज्य की वित्तीय क्षमता के बीच सामंजस्य, कुशल और जवाबदेह लोक सेवा: सुशासन की आधारशिला

त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य कर्मचारी आयोग राज्य सरकार की अधिसूचना से बना परामर्शदात्री निकाय है, जो वेतनमान और पदनाम पर सिफारिशें देता है; ये बाध्यकारी नहीं हैं और अन्य राज्यों से तुलना के साथ राज्य की प्रति व्यक्ति आय व वित्तीय स्थिति का ध्यान रखा जाता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

मध्यप्रदेश सरकार के वित्त विभाग ने अधिसूचना जारी कर राज्य कर्मचारी आयोग का पुनर्गठन किया है। सेवानिवृत्त IAS अधिकारी मलय श्रीवास्तव को अध्यक्ष बनाया गया है। सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश अरुण कुमार सिंह न्यायिक सेवा सदस्य, सेवानिवृत्त कार्यालय अधीक्षक बादाम सिंह सदस्य और वित्त विभाग के सेवानिवृत्त उपसचिव अजय चौबे सचिव नियुक्त हुए हैं। पेंशन, भविष्य निधि एवं बीमा संचालनालय के संचालक तथा सामान्य प्रशासन विभाग और वित्त विभाग के नामांकित सचिव-स्तर के अधिकारी भी पदेन सदस्य हैं। आयोग का गठन लगभग छह वर्ष पूर्व हुआ था, किंतु बाद में उसका कामकाज शिथिल पड़ गया था। आयोग के विचारणीय विषय राजपत्र के अनुसार यथावत रहेंगे। वह राज्य सरकार द्वारा तय समय-सीमा में सिफारिशें और रिपोर्ट सौंपेगा।

पृष्ठभूमि

  • भारत में सरकारी कर्मचारियों के वेतन और भत्तों की समीक्षा के लिए समय-समय पर वेतन आयोग बनाने की परंपरा है। केंद्र स्तर पर सातवाँ केंद्रीय वेतन आयोग न्यायमूर्ति ए.के. माथुर की अध्यक्षता में 2014 में गठित हुआ था। उसकी सिफारिशें 1 जनवरी 2016 से लागू की गईं।
  • संविधान का अनुच्छेद 309 विधानमंडल को और उसके अभाव में कार्यपालिका को संघ तथा राज्यों की लोक सेवाओं में भर्ती और सेवा-शर्तें विनियमित करने का अधिकार देता है। राज्य लोक सेवाएँ और राज्य लोक सेवा आयोग राज्य सूची की प्रविष्टि 41 के अंतर्गत आते हैं। इसलिए राज्य कर्मचारियों के वेतनमान तय करना मूलतः राज्य का विषय है।
  • राज्य द्वारा देय पेंशन राज्य सूची की प्रविष्टि 42 में आती है। इसी कारण राज्य के बजट में वेतन और पेंशन का बोझ बड़े राजस्व व्यय के रूप में दिखता है। इसकी सीधी जिम्मेदारी राज्य के सार्वजनिक वित्त पर होती है।
  • केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशें मानने के बाद प्रायः राज्य भी अपने कर्मचारियों के वेतनमान पर विचार करते हैं। इससे राज्यों के राजकोषीय घाटे और ऋण-स्तर पर दबाव पड़ता है। इसीलिए आयोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे राज्य की आर्थिक स्थिति और वित्तीय संसाधनों को ध्यान में रखें।
  • मध्यप्रदेश के आयोग का पुनर्गठन इस प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है कि आयोग की संरचना, सदस्यों और सेवा-शर्तों को नए सिरे से निर्धारित किया जाए। इससे कार्यवाही फिर सक्रिय हो सकती है। इस प्रकरण में आयोग की सिफारिशें अभी आनी हैं, इसलिए उनके वित्तीय प्रभाव का आकलन अभी संभव नहीं है।

राज्य कर्मचारी आयोग क्या है?

  • यह राज्य सरकार द्वारा कार्यपालिका की अधिसूचना से गठित एक परामर्शदात्री निकाय है। यह राज्य कर्मचारियों के वेतनमान, पदनाम और सेवा-शर्तों से जुड़े विषयों का अध्ययन करके सरकार को सिफारिशें देता है। यह संवैधानिक निकाय नहीं है, जैसे राज्य लोक सेवा आयोग अनुच्छेद 315 के अंतर्गत है। इसकी सिफारिशें सरकार पर बाध्यकारी नहीं होतीं।
  • संरचना: अध्यक्ष (सेवानिवृत्त IAS अधिकारी), न्यायिक सेवा सदस्य (सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश), एक सदस्य (सेवानिवृत्त कार्यालय अधीक्षक), पेंशन, भविष्य निधि एवं बीमा संचालनालय के संचालक, सामान्य प्रशासन विभाग और वित्त विभाग के नामांकित अधिकारी, तथा सचिव (वित्त विभाग के सेवानिवृत्त उपसचिव)। इस मिश्रित संरचना में प्रशासनिक, न्यायिक, वित्तीय और कर्मचारी-स्तर के अनुभव का समावेश है।
  • कार्य: आयोग अन्य राज्यों में समान पदों पर कार्यरत शासकीय कर्मचारियों के वेतनमान और पदनाम का तुलनात्मक अध्ययन करेगा। इसके आधार पर वह राज्य की स्थिति के अनुरूप सिफारिशें बनाएगा।
  • सिफारिशें बनाते समय ध्यान रखे जाने वाले आर्थिक कारक: प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय, वर्तमान आर्थिक स्थिति, लोक वित्त प्रबंधन, उपलब्ध वित्तीय संसाधन और राज्य के आर्थिक विकास की आवश्यकताएँ। इससे स्पष्ट है कि वेतन-निर्धारण को राजकोषीय अनुशासन से जोड़ा गया है।
  • कार्यप्रणाली और अधिकार: आयोग अपनी कार्यप्रणाली स्वयं तय करेगा और आवश्यक जानकारी प्राप्त करने का उसे अधिकार होगा। राज्य सरकार दस्तावेज और सहायता उपलब्ध कराएगी। इससे आयोग की प्रक्रियात्मक स्वायत्तता बनी रहती है।
  • समय-सीमा: आयोग राज्य शासन द्वारा निर्धारित समय-सीमा में सिफारिशें और विस्तृत रिपोर्ट सौंपेगा। जिन विचारणीय विषयों पर सिफारिशें अंतिम रूप ले चुकी होंगी, उन पर आयोग अलग से भी प्रतिवेदन दे सकता है। यह प्रावधान समाचार के उपलब्ध अंश में अधूरा है, इसलिए इसके ब्योरे की पुष्टि अधिसूचना से करनी चाहिए।
  • सेवा-शर्तें: अध्यक्ष, सदस्यों और सचिव की सेवा-शर्तें राज्य सरकार अलग से तय करेगी। इससे आयोग की संरचना पर कार्यपालिका का नियंत्रण बना रहता है, जबकि उसका सलाहकारी स्वरूप स्पष्ट रहता है।
  • परीक्षा-दृष्टि: ऐसे आयोगों के संदर्भ में दो प्रश्न उठते हैं। पहला, कर्मचारी कल्याण और प्रशासनिक दक्षता में संतुलन कैसे हो। दूसरा, बढ़ते वेतन-पेंशन व्यय के बीच राज्य अपने राजकोषीय उत्तरदायित्व का पालन कैसे करें और विकास-व्यय के लिए गुंजाइश कैसे रखें।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
आयोग का पुनर्गठन: वित्त विभाग ने अधिसूचना जारी की आयोग का गठन लगभग छह वर्ष पहले हुआ था, पर उसका कामकाज शिथिल पड़ गया था। पुनर्गठन से उसकी कार्यप्रक्रिया फिर शुरू होने की संभावना बनी है। यह कार्यपालिका की आदेश-आधारित (गैर-संवैधानिक) व्यवस्था है और उसकी सिफारिशें सलाहकारी प्रकृति की होती हैं।
मिश्रित संरचना: सेवानिवृत्त IAS अधिकारी अध्यक्ष, सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश न्यायिक सदस्य, सेवानिवृत्त कार्यालय अधीक्षक सदस्य प्रशासनिक अनुभव, विधिक दृष्टि और कर्मचारी स्तर की व्यावहारिक समझ का संतुलन बनता है। इससे सिफारिशों की विश्वसनीयता और स्वीकार्यता बढ़ती है।
पदेन और नामित सदस्य: पेंशन, भविष्य निधि एवं बीमा संचालनालय के संचालक (अतिरिक्त प्रभार), सामान्य प्रशासन विभाग और वित्त विभाग के सचिव-स्तर के नामित अधिकारी सेवा-नियम, पेंशन-दायित्व और राजकोषीय स्थिति से जुड़ी जानकारी आयोग के भीतर ही उपलब्ध रहती है। दूसरी ओर, सरकारी अधिकारियों की अधिक संख्या से आयोग की स्वायत्तता पर प्रश्न उठ सकते हैं।
विचारणीय विषय राजपत्र के अनुसार यथावत; अन्य राज्यों के समान पदों के वेतनमान और पदनाम का तुलनात्मक अध्ययन नीति में निरंतरता रहती है। राज्यों के बीच तुलना से वेतन-संरचना में असंतुलन घटाने में सहायता मिलती है।
सिफारिशों के समय प्रति व्यक्ति आय, राज्य की आर्थिक स्थिति, लोक वित्त प्रबंधन, उपलब्ध संसाधन और विकास की आवश्यकताओं का ध्यान कर्मचारियों की अपेक्षाओं और राज्य की वित्तीय क्षमता के बीच संतुलन का सिद्धांत तय होता है। इससे राजकोषीय विवेक सुनिश्चित होता है।
कार्यप्रणाली स्वयं तय करने और जानकारी प्राप्त करने का अधिकार; निश्चित समय-सीमा में रिपोर्ट; सेवा-शर्तें सरकार अलग से तय करेगी आयोग को कार्यात्मक स्वतंत्रता मिलती है और रिपोर्ट के लिए जवाबदेही भी तय होती है। फिर भी सेवा-शर्तें सरकार के हाथ में रहने से संस्थागत स्वायत्तता सीमित रहती है।

महत्व

प्रशासनिक और सेवा-प्रबंधन

  • वेतनमान, पदनाम और सेवा-शर्तों की विसंगतियों का एक स्थायी मंच पर अध्ययन संभव होता है। इससे विभागवार असंतोष और मुकदमेबाजी घट सकती है।
  • आयोग मानव संसाधन प्रबंधन में प्रमाण-आधारित (साक्ष्य पर आधारित) निर्णय की संस्कृति को बढ़ावा दे सकता है।
  • राज्य के विभिन्न विभागों में एक जैसे पदों के लिए समान वेतन-संरचना तय करने का आधार मिलता है।

राजकोषीय और आर्थिक

  • वेतन और पेंशन राज्य के प्रतिबद्ध व्यय (Committed Expenditure) का बड़ा हिस्सा होते हैं। आयोग का वित्तीय क्षमता पर ध्यान देना राजकोषीय घाटे के प्रबंधन में सहायक है।
  • प्रति व्यक्ति आय और संसाधनों को आधार बनाने से वेतन-वृद्धि का राज्य की आर्थिक संवृद्धि और विकास-व्यय पर पड़ने वाला प्रभाव आंका जा सकता है।
  • सरकारी वेतन-ढांचे का असर स्थानीय अर्थव्यवस्था में उपभोग-मांग और निजी क्षेत्र के पारिश्रमिक पर भी पड़ता है।

संस्थागत और शासन

  • सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी की उपस्थिति से प्रक्रियात्मक निष्पक्षता और विधिक परीक्षण को बल मिलता है।
  • सरकार और कर्मचारियों के बीच संवाद का संस्थागत माध्यम बनता है, जिससे औद्योगिक और सेवा संबंधी तनाव कम होते हैं।
  • आयोग की रिपोर्ट और सिफारिशों की समय-सीमा तय होने से नीतिगत निर्णय में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है।

संघीय परिप्रेक्ष्य

  • राज्य लोक सेवाएं राज्य सूची का विषय हैं, इसलिए राज्य अपनी वेतन-संरचना स्वयं तय करने के लिए स्वतंत्र हैं। राज्य आयोग इसी संघीय स्वायत्तता की अभिव्यक्ति है।
  • केंद्रीय वेतन आयोग और अन्य राज्यों से तुलना करने पर राज्यों में प्रतिभा के लिए प्रतिस्पर्धा और सुसंगतता का संतुलन बनता है।

चुनौतियाँ

1. राजकोषीय दबाव और प्रतिबद्ध व्यय

  • वेतन-वृद्धि और पेंशन-दायित्व से राज्य के राजस्व व्यय का बड़ा हिस्सा पहले ही बंध जाता है। इससे पूंजीगत व्यय और कल्याणकारी योजनाओं के लिए गुंजाइश घटती है।
  • राज्य राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) की सीमाओं के भीतर बंधे हैं। इसलिए सिफारिशों का क्रियान्वयन चरणबद्ध करना पड़ सकता है।

2. आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता

  • आयोग कार्यपालिका की अधिसूचना से बना है और उसकी सेवा-शर्तें सरकार अलग से तय करेगी। इससे सरकारी प्रभाव की आशंका बनी रहती है।
  • सचिव-स्तर के नामित अधिकारी स्वयं नियोक्ता-पक्ष के प्रतिनिधि हैं, इसलिए कर्मचारी-हित और राजकोषीय-हित के बीच हितों का टकराव संभव है।

3. सिफारिशों की बाध्यता और क्रियान्वयन

  • आयोग की सिफारिशें सलाहकारी हैं और सरकार उन्हें मानने के लिए बाध्य नहीं है। इससे अपेक्षा और क्रियान्वयन के बीच अंतर रह जाता है।
  • पूर्व में आयोग का कामकाज शिथिल पड़ने से नीतिगत निरंतरता का अभाव दिखा। सरकार बदलने पर संस्थाओं की निरंतरता का प्रश्न उठता है।

4. वेतन-असमानता और क्षैतिज समानता

  • अन्य राज्यों से तुलना करते समय आर्थिक क्षमता में अंतर के कारण समान वेतनमान अपनाना व्यावहारिक नहीं हो सकता।
  • राज्य के भीतर विभिन्न संवर्गों की अपेक्षाओं में टकराव और पदनाम-संबंधी विवाद सिफारिशों को जटिल बनाते हैं।

5. निजी क्षेत्र और आम नागरिक पर असर

  • सरकारी वेतन-वृद्धि से सरकारी और निजी क्षेत्र के पारिश्रमिक के बीच अंतर बढ़ सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर मुद्रास्फीति (Inflation) का दबाव भी बन सकता है।
  • वेतन पर व्यय बढ़ने से आम नागरिक के लिए सेवा-वितरण की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ, तो जन-अपेक्षाएं अधूरी रहेंगी।

6. पेंशन-दायित्व और भविष्य की देनदारी

  • पेंशन, भविष्य निधि और बीमा से जुड़े दीर्घकालिक दायित्व राज्य के लोक वित्त पर बढ़ता बोझ बनते हैं।
  • पुरानी और नई पेंशन व्यवस्था के बीच अंतर कर्मचारियों की अपेक्षाओं और राजकोषीय स्थिरता के बीच तनाव पैदा करता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
राजकोषीय क्षमता वेतन और पेंशन का बढ़ा हुआ बोझ राज्य के पूंजीगत व्यय और विकास-निवेश को सीमित कर सकता है।
स्वायत्तता आयोग की सेवा-शर्तें सरकार तय करेगी और अनेक सदस्य सरकारी अधिकारी हैं, इसलिए निष्पक्षता पर प्रश्न उठ सकता है।
सिफारिशों की प्रकृति सलाहकारी होने के कारण सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं और क्रियान्वयन पूरी तरह राजनीतिक-प्रशासनिक इच्छा पर निर्भर है।
संस्थागत निरंतरता आयोग के कामकाज में पहले आई शिथिलता से संस्थाओं की स्थिरता पर विश्वास कमजोर होता है।
अंतर-राज्यीय तुलना आर्थिक क्षमता में भिन्नता के कारण दूसरे राज्यों के वेतनमान की नकल करना उचित नहीं हो सकता।
पारदर्शिता रिपोर्ट सार्वजनिक न होने पर आम नागरिक और कर्मचारी संगठनों को आधार की जानकारी नहीं मिलती।

आगे की राह

  • आयोग की सिफारिशों को समय-सीमा के भीतर तैयार कराकर विधानमंडल में रखने या सार्वजनिक करने की व्यवस्था की जाए, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़े।
  • अध्यक्ष और सदस्यों की सेवा-शर्तें, कार्यकाल और पद से हटाने की प्रक्रिया पहले से स्पष्ट हों, जिससे आयोग की स्वायत्तता सुदृढ़ हो।
  • वेतन-वृद्धि के प्रत्येक प्रस्ताव के साथ राजकोषीय प्रभाव का मूल्यांकन और मध्यम अवधि का वित्तीय अनुमान संलग्न किया जाए।
  • वेतन को कार्य-निष्पादन और सेवा-वितरण की गुणवत्ता से जोड़ा जाए, ताकि अतिरिक्त व्यय का लाभ नागरिकों तक पहुंचे।
  • कर्मचारी संगठनों, विभागों और विशेषज्ञों से नियमित परामर्श की संस्थागत व्यवस्था हो, जिससे असंतोष की जड़ें समय रहते पहचानी जाएं।
  • पेंशन देनदारियों का वैज्ञानिक आकलन (एक्चुअरियल) कर दीर्घकालिक वित्तीय योजना बनाई जाए।
  • अन्य राज्यों और केंद्रीय वेतन आयोग से तुलना करते समय प्रति व्यक्ति आय, जीवन-यापन की लागत और राजकोषीय क्षमता जैसे समायोजक अपनाए जाएं।
  • चरणबद्ध क्रियान्वयन की रूपरेखा अपनाई जाए, ताकि वेतन-वृद्धि का भार बजट पर अचानक न पड़े।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

वेतन आयोग (Pay Commission) · अनुच्छेद 309 – सेवा-शर्तों का विनियमन · राजकोषीय विवेक और राजकोषीय घाटा · सिफारिशों की परामर्शी प्रकृति · समान कार्य के लिए समान वेतन · राज्य की राजकोषीय क्षमता और प्रति व्यक्ति आय · अंतर-राज्यीय वेतन तुलना · पेंशन देयता और राजस्व व्यय · गैर-संवैधानिक / कार्यपालिका द्वारा गठित निकाय · सेवा-शर्तों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा · लोक वित्त प्रबंधन · प्रशासनिक दक्षता और कर्मचारी मनोबल

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 309 — राज्य सेवाओं की भर्ती और सेवा-शर्तें
  • अनुच्छेद 162 — राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
  • अनुच्छेद 16 — लोक नियोजन में अवसर की समानता
  • अनुच्छेद 293 — राज्य की उधार लेने की शक्ति
  • सातवीं अनुसूची, राज्य सूची — राज्य की लोक सेवाएं (प्रविष्टि 41)

अवधारणा प्रवाह

राज्य कर्मचारी आयोग का गठन और उसके कामकाज में शिथिलता  →  वित्त विभाग की अधिसूचना से आयोग का पुनर्गठन  →  अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य, सदस्यों और सचिव की नियुक्ति  →  वेतनमान, पदनाम और आर्थिक परिस्थितियों का तुलनात्मक अध्ययन  →  राजकोषीय क्षमता, प्रति व्यक्ति आय और विकास-आवश्यकताओं का मूल्यांकन  →  निर्धारित समय-सीमा में सिफारिशें और रिपोर्ट सरकार को सौंपना  →  सरकार का निर्णय, राजकोषीय प्रभाव और चरणबद्ध क्रियान्वयन

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. वेतन आयोगों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. केंद्रीय वेतन आयोग संविधान के किसी अनुच्छेद द्वारा स्थापित स्थायी निकाय है।
2. वेतन आयोग की सिफारिशें सरकार पर विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं होतीं।
3. अनुच्छेद 309 के अंतर्गत राज्य की सेवाओं में नियुक्त व्यक्तियों की भर्ती और सेवा-शर्तों का विनियमन राज्य विधान-मंडल कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है: वेतन आयोग कार्यपालिका के संकल्प से गठित अस्थायी (तदर्थ) और परामर्शदात्री निकाय है, संवैधानिक नहीं। कथन 2 सही है: सिफारिशें मानना या न मानना सरकार का निर्णय है। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 309 के अधीन विधान-मंडल अधिनियम बना सकता है और उसके अभाव में राज्यपाल नियम बना सकते हैं।

Q2. अभिकथन (A): राज्य कर्मचारी आयोग जैसे निकाय को वेतनमान की सिफारिश करते समय राज्य की राजकोषीय स्थिति और प्रति व्यक्ति आय पर विचार करना चाहिए।
कारण (R): वेतन, भत्ते और पेंशन राज्य के राजस्व व्यय का बड़ा हिस्सा होते हैं और राज्य राजकोषीय उत्तरदायित्व की सीमाओं से बंधे होते हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, किंतु R गलत है
  4. A गलत है, किंतु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — वेतन-पेंशन का भार राज्य के बजट पर प्रत्यक्ष पड़ता है। इसलिए राजकोषीय क्षमता का आकलन सिफारिशों का अनिवार्य आधार है। R इसी तर्क को स्पष्ट करता है, अतः R, A की सही व्याख्या है।

Q3. सूची-I (अनुच्छेद) को सूची-II (विषय) से सुमेलित कीजिए:
सूची-I: (A) अनुच्छेद 309 (B) अनुच्छेद 310 (C) अनुच्छेद 311 (D) अनुच्छेद 315
सूची-II: 1. लोक सेवा आयोगों की स्थापना 2. सिविल सेवकों की पदावधि राष्ट्रपति/राज्यपाल के प्रसादपर्यंत 3. जाँच और सुनवाई के अवसर के बिना पद से हटाने के विरुद्ध सुरक्षा 4. भर्ती और सेवा-शर्तों का विनियमन

  1. A-4, B-2, C-3, D-1
  2. A-2, B-4, C-3, D-1
  3. A-4, B-3, C-2, D-1
  4. A-1, B-2, C-3, D-4

उत्तर: A-4, B-2, C-3, D-1 — अनुच्छेद 309 भर्ती और सेवा-शर्तों से, 310 प्रसादपर्यंत सिद्धांत से, 311 बर्खास्तगी, पदच्युति या पदावनति के विरुद्ध सुरक्षा से और 315 संघ तथा राज्यों के लोक सेवा आयोगों से संबंधित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ वेतन आयोग जैसे निकाय सरकारी कर्मचारियों के वेतन और सेवा-शर्तों के निर्धारण में विशेषज्ञ परामर्श देते हैं, परंतु उनकी सिफारिशें राज्यों की राजकोषीय क्षमता से टकराती रही हैं। मध्यप्रदेश में राज्य कर्मचारी आयोग के पुनर्गठन के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि वेतन-निर्धारण के मामलों में न्यायपालिका की भूमिका की सीमाएँ क्या हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: भूमिका: मध्यप्रदेश के वित्त विभाग की अधिसूचना से आयोग का पुनर्गठन हुआ है। अध्यक्ष सेवानिवृत्त IAS अधिकारी हैं, एक सदस्य सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश हैं, और पेंशन संचालनालय, सामान्य प्रशासन विभाग तथा वित्त विभाग के अधिकारी सदस्य हैं। आयोग को अन्य राज्यों के वेतनमान, प्रति व्यक्ति आय, राज्य की आर्थिक स्थिति और लोक वित्त प्रबंधन का ध्यान रखना है।

भाग 1 – संस्थागत और विधिक ढाँचा: वेतन आयोग कार्यपालिका के संकल्प से बना अस्थायी, परामर्शी, गैर-संवैधानिक निकाय है और सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं। सेवा-शर्तों का स्रोत अनुच्छेद 309 है; साथ में अनुच्छेद 310 (प्रसादपर्यंत) और 311 (सुरक्षा) हैं। केंद्र के उदाहरण: 6वाँ वेतन आयोग (न्यायमूर्ति बी. एन. श्रीकृष्ण), 7वाँ (न्यायमूर्ति ए. के. माथुर, 2016 से लागू); 8वें वेतन आयोग की घोषणा 2025 में हुई। राज्य प्रायः केंद्र का अनुसरण करते हैं।

भाग 2 – पक्ष में तर्क: साक्ष्य-आधारित और तटस्थ वेतन-निर्धारण; अन्य राज्यों के साथ तुलना से पदनाम और वेतन में असमानता घटती है; कर्मचारी मनोबल, प्रतिभा-आकर्षण और प्रशासनिक दक्षता; विवाद-निवारण का मंच; न्यायिक और वित्तीय सदस्य होने से संतुलन।

भाग 3 – चुनौतियाँ: वेतन, पेंशन और ब्याज से राजस्व व्यय का बढ़ना और पूँजीगत व्यय का दबना; राज्य के FRBM अधिनियम की राजकोषीय घाटा सीमा (GSDP का लगभग 3%, 15वें वित्त आयोग के अनुसार) और उधार पर अनुच्छेद 293 की सीमाएँ; केंद्र की तुलना में राज्य की कम राजस्व क्षमता; कर्मचारियों की अपेक्षाओं और आम नागरिक के लिए विकास-व्यय के बीच प्रतिस्पर्धा; आयोग के कार्य में लंबी शिथिलता और समय-सीमा की अनिश्चितता; सदस्यों में सरकारी अधिकारियों की बहुलता से स्वायत्तता पर प्रश्न।

भाग 4 – न्यायपालिका की सीमाएँ (अनुवर्ती प्रश्न): वेतन-निर्धारण मूलतः कार्यपालिका और विशेषज्ञ क्षेत्र है। रणधीर सिंह बनाम भारत संघ (1982) में ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ को अनुच्छेद 14, 16 और 39(घ) से जोड़ा गया। पंजाब राज्य बनाम जगजीत सिंह (2016) में समान कार्य करने वाले अस्थायी कर्मचारियों के लिए वही सिद्धांत लागू किया गया। फिर भी न्यायालय सामान्यतः वेतनमान तय नहीं करते और केवल मनमानेपन, भेदभाव या प्रक्रियात्मक अनुचितता की समीक्षा करते हैं, क्योंकि इसमें राजकोषीय और नीतिगत प्रश्न निहित होते हैं।

सुझाव और निष्कर्ष: सिफारिशों का चरणबद्ध क्रियान्वयन, पेंशन-देयता का पृथक आकलन, राजस्व-वृद्धि और व्यय-प्रबंधन से तालमेल, पारदर्शी रिपोर्ट और निश्चित समय-सीमा। संतुलित निष्कर्ष: कर्मचारी कल्याण और राजकोषीय स्थिरता परस्पर विरोधी नहीं, पूरक लक्ष्य हों।

स्रोत: amarujala.com


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