केरल में नौवहन बोर्ड को सशक्त बनाने वाला संशोधन विधेयक: मुख्यमंत्री सत्येशन

केरल में नौवहन बोर्ड को सशक्त बनाने वाला संशोधन विधेयक: मुख्यमंत्री सत्येशन

केरल में नौवहन बोर्ड को सशक्त बनाने वाला संशोधन विधेयक: मुख्यमंत्री सत्येशन

केरल में नौवहन बोर्ड को सशक्त बनाने वाला संशोधन विधेयक: मुख्यमंत्री सत्येशन — केरल मरीन बोर्ड संशोधन विधेयक की प्रमुख विशेषताएं
आरेख: केरल मरीन बोर्ड संशोधन विधेयक की प्रमुख विशेषताएं

✎ गैर-प्रमुख बंदरगाह समवर्ती सूची (प्रविष्टि 31) में हैं, इसलिए राज्य उन पर कानून बना सकता है। केरल समुद्री बोर्ड (संशोधन) विधेयक मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एकल निर्णय-मंच, समुद्री भूमि बैंक (धारा 22A), बंदरगाह क्षेत्र विकास…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध और राज्य विधान-मंडल की विधायी शक्तियाँ; शासन में संस्थागत सुधार  |  GS Paper III — अवसंरचना (बंदरगाह, परिवहन), निवेश, सार्वजनिक-निजी भागीदारी, भूमि-उपयोग और तटीय अर्थव्यवस्था
  • Prelims: केरल समुद्री बोर्ड (Kerala Maritime Board), समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31 (गैर-प्रमुख बंदरगाह), प्रमुख एवं गैर-प्रमुख बंदरगाह, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) और रियायत अवधि, समुद्री भूमि बैंक (Maritime Land Bank), बंदरगाह क्षेत्र विकास प्राधिकरण, KINFRA, विழிঞ্জम (Vizhinjam) अंतरराष्ट्रीय गहरे जल का पारगमन बंदरगाह, सागरमाला कार्यक्रम, भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025
  • Essay: बंदरगाह-आधारित विकास: तटीय राज्यों के लिए नीली अर्थव्यवस्था के अवसर और चुनौतियाँ, संसाधन-सीमित राज्य और अवसंरचना निवेश: भूमि को पूँजी बनाकर सार्वजनिक-निजी भागीदारी का मार्ग

त्वरित पुनरावृत्ति: गैर-प्रमुख बंदरगाह समवर्ती सूची (प्रविष्टि 31) में हैं, इसलिए राज्य उन पर कानून बना सकता है। केरल समुद्री बोर्ड (संशोधन) विधेयक मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एकल निर्णय-मंच, समुद्री भूमि बैंक (धारा 22A), बंदरगाह क्षेत्र विकास प्राधिकरण (धारा 103) और अधिकतम 45 वर्ष की PPP रियायत अवधि (धारा 22) का प्रावधान करता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

केरलम के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने 14 अक्टूबर 2026 को राज्य विधानसभा में केरल समुद्री बोर्ड (संशोधन) विधेयक प्रस्तुत किया। उनके अनुसार वर्तमान कानून में बोर्ड को सौंपे गए दायित्वों के निर्वहन के लिए आवश्यक विधिक प्रावधान नहीं थे। विधेयक में मुख्यमंत्री को बोर्ड का अध्यक्ष बनाने, बंदरगाह परियोजनाओं से जुड़े सभी प्रमुख विभागों को बोर्ड में शामिल करने, राज्य समुद्री भूमि बैंक की स्थापना, प्रत्येक बंदरगाह के लिए विकास प्राधिकरण के गठन और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के अंतर्गत अधिकतम 45 वर्ष की रियायत अवधि का प्रावधान है। इसका उद्देश्य समुद्री क्षेत्र में निवेश-संबंधी निर्णय एक ही मंच पर लेना है।

पृष्ठभूमि

  • भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची में प्रमुख बंदरगाह संघ सूची (प्रविष्टि 27) के अंतर्गत आते हैं। इनका प्रशासन केंद्र सरकार के पास है। प्रमुख बंदरगाहों से भिन्न बंदरगाह समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31 में हैं, इसलिए राज्य इन पर कानून बना सकते हैं।
  • केरलम में कोच्चि प्रमुख बंदरगाह है, जबकि अन्य बंदरगाह गैर-प्रमुख हैं और राज्य के अधिकार-क्षेत्र में आते हैं। इनके विकास और प्रबंधन का दायित्व केरल समुद्री बोर्ड तथा बंदरगाह विभाग पर है।
  • समाचार के अनुसार अब तक न बोर्ड के पास और न बंदरगाह विभाग के पास स्वतंत्र निर्णय की शक्ति थी। प्रस्तावों को कई विभागों से गुज़रना पड़ता था, जिससे परियोजनाओं में विलंब और निवेशकों के लिए अनिश्चितता बनी रहती थी।
  • राज्य के पास बड़े निवेश के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं। इसलिए सरकार का इक्विटी योगदान मुख्यतः भूमि के रूप में होगा। उदाहरण के लिए ₹1,000 करोड़ की परियोजना में राज्य भूमि देगा और शेष निवेश अन्य स्रोतों से जुटाया जाएगा।
  • केरलम का विழிঞ্জम बंदरगाह गहरे जल का पारगमन बंदरगाह है, जिसे सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल पर विकसित किया गया है। यह राज्य में बंदरगाह-आधारित विकास की संभावनाओं का उदाहरण है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर सागरमाला कार्यक्रम बंदरगाह-आधारित विकास पर बल देता है। साथ ही भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 ने पुराने भारतीय पत्तन अधिनियम, 1908 का स्थान लिया है। इसमें राज्य समुद्री बोर्डों और राज्य स्तरीय समन्वय की भूमिका को मान्यता दी गई है।

केरल समुद्री बोर्ड (संशोधन) विधेयक क्या है?

  • धारा 3 में संशोधन: मुख्यमंत्री बोर्ड के अध्यक्ष होंगे। बंदरगाह, मत्स्य पालन, उद्योग, वित्त, राजस्व, विधि और तटीय सुरक्षा विभागों के प्रतिनिधि बोर्ड के सदस्य होंगे। इससे निवेश-संबंधी निर्णय एक ही मंच पर हो सकेंगे।
  • धारा 2 में संशोधन और नई धारा 7A: जो दायित्व अब तक केवल नियमों में थे, उन्हें अधिनियम में शामिल किया गया है। धारा 7A में बोर्ड के दायित्व 48 खंडों में दिए गए हैं, जिससे बोर्ड को स्पष्ट विधिक आधार मिलता है।
  • नई धारा 22A: सरकार के नियंत्रण वाली भूमि से राज्य समुद्री भूमि बैंक बनाया जाएगा। इससे समुद्री परियोजनाओं के लिए भूमि की उपलब्धता सुनिश्चित होगी।
  • धारा 103 की पुनर्स्थापना: प्रत्येक बंदरगाह के लिए बंदरगाह क्षेत्र विकास प्राधिकरण बनाया जा सकेगा। प्राधिकरण की भूमि-उपयोग योजना नगर एवं ग्राम आयोजना अधिनियम के अंतर्गत अधिसूचित होगी। इस प्रकार प्रक्रिया मौजूदा कानूनी ढाँचे के भीतर रहेगी।
  • धारा 22 में संशोधन: सार्वजनिक-निजी भागीदारी के लिए स्पष्ट वैधानिक ढाँचा बनेगा। सरकार की स्वीकृति और निवेश के आकलन के बाद अधिकतम 45 वर्ष की रियायत अवधि दी जा सकेगी। सरकार के अनुसार उचित अवधि से निविदा प्रक्रिया में राज्य का राजस्व भी बढ़ेगा।
  • निवेश जुटाने के संभावित मार्ग: अभिरुचि की अभिव्यक्ति (Expression of Interest) प्रक्रिया, सरकार-से-सरकार व्यवस्था, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की भागीदारी और कोचीन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा लिमिटेड (CIAL) जैसा मॉडल।
  • KINFRA (केरल औद्योगिक अवसंरचना विकास निगम) को राज्य की प्रस्तावित बंदरगाह नगर परियोजना के लिए तटीय गैर-प्रमुख बंदरगाहों के निकट अधिकतम भूमि अधिगृहीत करने का निर्देश दिया गया है। सरकार की भूमिका सुविधा-प्रदाता की होगी।
  • विश्लेषण: केंद्रीकृत निर्णय से विलंब घट सकता है, पर तटीय समुदायों, मछुआरों की आजीविका, तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) के पालन और भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता जैसे प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण रहेंगे। लंबी रियायत अवधि के लिए ठोस जन-हित सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
धारा 3 में संशोधन: मुख्यमंत्री बोर्ड के अध्यक्ष; पत्तन, मत्स्य, उद्योग, वित्त, राजस्व, विधि और तटीय सुरक्षा विभागों का प्रतिनिधित्व निर्णय-प्रक्रिया एक मंच पर केंद्रित होती है। पहले प्रस्ताव कई विभागों से गुज़रते थे, अब निवेश संबंधी निर्णय सभी हितधारकों की उपस्थिति में हो सकेंगे।
धारा 2 में संशोधन और नई धारा 7A (48 खंडों में बोर्ड के दायित्व) जो दायित्व अब तक केवल नियमों में थे, उन्हें अधिनियम में वैधानिक आधार मिलता है। इससे बोर्ड की शक्तियों पर कानूनी अस्पष्टता घटती है।
नई धारा 22A: राज्य समुद्री भूमि बैंक सरकारी नियंत्रण वाली भूमि एक स्थान पर संकलित होगी। इससे समुद्री परियोजनाओं के लिए भूमि की उपलब्धता और नियोजन सुगम होगा।
धारा 103 की पुनर्स्थापना: प्रत्येक पत्तन के लिए पत्तन क्षेत्र विकास प्राधिकरण पत्तन के आसपास के क्षेत्र की भू-उपयोग योजना बनेगी। इसे नगर एवं ग्राम आयोजना अधिनियम के तहत अधिसूचित किया जाएगा, इसलिए प्रक्रिया मौजूदा विधिक ढाँचे में रहेगी।
धारा 22 में संशोधन: सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) का स्पष्ट वैधानिक ढाँचा; रियायत अवधि अधिकतम 45 वर्ष निवेशकों को नीतिगत स्पष्टता मिलती है। लंबी अवधि से निविदा-प्रक्रिया में राज्य को अधिक राजस्व मिलने की संभावना है, परंतु इसके लिए सरकारी अनुमोदन और निवेश का मूल्यांकन आवश्यक है।
राज्य की इक्विटी मुख्यतः भूमि के रूप में; EoI, सरकार-से-सरकार (G2G), सार्वजनिक उपक्रम या CIAL जैसे मॉडल से निवेश राज्य के सीमित वित्तीय संसाधनों के बीच पूँजी जुटाने का उपाय है। इसमें सरकार की भूमिका प्रत्यक्ष निवेशक की जगह सुविधा-प्रदाता की बनती है।

महत्व

आर्थिक आयाम

  • PPP के लिए वैधानिक ढाँचा और अधिकतम 45 वर्ष की रियायत अवधि से दीर्घावधि निजी निवेश आकर्षित हो सकता है। बंदरगाह परियोजनाओं की भारी पूँजी-लागत के कारण लंबी अवधि निवेशकों के लिए महत्त्वपूर्ण होती है।
  • भूमि को इक्विटी के रूप में लगाने से राज्य का राजकोषीय बोझ घटता है। उदाहरणार्थ ₹1,000 करोड़ की परियोजना में राज्य भूमि देगा और शेष निवेश अन्य स्रोतों से आएगा।
  • बंदरगाह-आधारित औद्योगिक और रसद विकास, तथा प्रस्तावित पोर्ट सिटी परियोजना से रोज़गार और व्यापार को गति मिल सकती है।

प्रशासनिक और शासन आयाम

  • एकल निर्णय-मंच से विभागीय समन्वय बेहतर होता है और अनुमोदन में लगने वाला समय घटता है।
  • बोर्ड के दायित्वों को नियमों से हटाकर अधिनियम में रखने से वैधानिक स्पष्टता और जवाबदेही बढ़ती है।
  • भू-उपयोग योजना को नगर एवं ग्राम आयोजना अधिनियम के तहत अधिसूचित करने से नियोजन विधिक ढाँचे में रहता है।

सामरिक और सुरक्षा आयाम

  • तटीय सुरक्षा विभाग को बोर्ड में शामिल करने से बंदरगाह विकास में तटीय सुरक्षा संबंधी चिंताएँ आरंभ से ही निर्णयों में शामिल हो सकती हैं।
  • केरल अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार-मार्ग के निकट स्थित है, इसलिए राज्य के बंदरगाहों की क्षमता बढ़ने से राष्ट्रीय समुद्री अर्थव्यवस्था को सहारा मिलता है।

संघीय और विकासात्मक आयाम

  • गैर-प्रमुख बंदरगाह राज्यों के विकास-क्षेत्र में आते हैं। राज्य समुद्री बोर्ड को सशक्त करना सहकारी संघवाद की भावना के अनुरूप है।
  • KINFRA द्वारा छोटे बंदरगाहों के निकट भूमि अधिग्रहण से तटीय क्षेत्र का समन्वित विकास संभव है।

चुनौतियाँ

1. शक्ति का केंद्रीकरण और संस्थागत स्वायत्तता

  • मुख्यमंत्री के अध्यक्ष होने से निर्णय तेज़ हो सकते हैं, परंतु बोर्ड की तकनीकी और व्यावसायिक स्वायत्तता पर प्रश्न उठ सकते हैं।
  • निर्णय राजनीतिक चक्र से प्रभावित हुए तो परियोजनाओं की निरंतरता बाधित हो सकती है।

2. भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास

  • तटीय क्षेत्र घनी आबादी वाले हैं। भूमि बैंक और अधिग्रहण से विस्थापन की आशंका रहती है।
  • मछुआरा समुदाय की आजीविका और तट-तक पहुँच प्रभावित हो सकती है।

3. पर्यावरण और तटीय पारिस्थितिकी

  • बंदरगाह और पोर्ट सिटी परियोजनाओं से तटीय कटाव, मैंग्रोव और समुद्री जैव-विविधता पर दबाव पड़ सकता है।
  • तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) के मानदंडों का पालन अनिवार्य है।

4. PPP की लंबी अवधि से जुड़े जोखिम

  • 45 वर्ष की रियायत में माँग-पूर्वानुमान की विफलता, शुल्क-निर्धारण और विवाद-समाधान जैसे जोखिम बने रहते हैं।
  • भूमि जैसी सार्वजनिक संपत्ति का मूल्यांकन पारदर्शी न हुआ तो राज्य को उचित प्रतिफल न मिलने की आशंका रहती है।

5. राज्य के वित्तीय संसाधनों की सीमा

  • सरकार स्वयं बड़े निवेश करने में समर्थ नहीं है, इसलिए परियोजना की सफलता निजी या बाहरी निवेश जुटने पर निर्भर है।
  • बाहरी निवेश न मिला तो भूमि बैंक का उपयोग सीमित रह जाएगा।

6. केंद्र-राज्य और बहु-स्तरीय समन्वय

  • बंदरगाह परियोजनाओं में पर्यावरण, तटीय सुरक्षा और केंद्रीय अनुमतियाँ जुड़ी होती हैं। राज्य अधिनियम इनका स्थान नहीं ले सकता।
  • स्थानीय निकायों और पत्तन क्षेत्र विकास प्राधिकरण के बीच अधिकार-क्षेत्र का टकराव संभव है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
निर्णय-संरचना अध्यक्ष के रूप में मुख्यमंत्री से बोर्ड की व्यावसायिक स्वायत्तता और विशेषज्ञ भागीदारी प्रभावित हो सकती है।
भूमि भूमि बैंक के लिए अधिग्रहण से विस्थापन और सामाजिक प्रभाव का जोखिम है।
पर्यावरण तटीय पारिस्थितिकी और CRZ मानदंडों के अनुपालन का दबाव रहता है।
रियायत अवधि 45 वर्ष की अवधि में शुल्क, माँग और अनुबंध-पुनर्विचार के जोखिम हैं।
वित्त निवेश जुटाने की सफलता बाज़ार की रुचि और परियोजना की व्यवहार्यता पर निर्भर है।
समन्वय केंद्र की अनुमतियों और स्थानीय निकायों के साथ अधिकार-क्षेत्र का तालमेल आवश्यक है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • सागरमाला कार्यक्रम (Sagarmala Programme): बंदरगाह-आधारित विकास और तटीय आर्थिक क्षेत्रों का केंद्रीय कार्यक्रम, जो राज्य की पोर्ट सिटी की अवधारणा से सीधे जुड़ता है।
  • भारतीय बंदरगाह अधिनियम, 2025 (Indian Ports Act, 2025): गैर-प्रमुख बंदरगाहों के शासन में राज्य समुद्री बोर्डों की वैधानिक भूमिका का राष्ट्रीय ढाँचा प्रदान करता है।
  • मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 (Maritime India Vision 2030): बंदरगाह क्षमता और समुद्री क्षेत्र में निवेश का राष्ट्रीय रोडमैप।
  • विझिंजम अंतरराष्ट्रीय गहरे जल का बहुउद्देश्यीय बंदरगाह (Vizhinjam International Deepwater Multipurpose Seaport): केरल में PPP मॉडल पर विकसित बंदरगाह, जो राज्य के लिए प्रासंगिक उदाहरण है।

आगे की राह

  • बोर्ड में स्वतंत्र बंदरगाह, वित्त और पर्यावरण विशेषज्ञों को शामिल किया जाए, ताकि निर्णयों की व्यावसायिक गुणवत्ता और स्वायत्तता बनी रहे।
  • भूमि बैंक में शामिल भूमि का सार्वजनिक रजिस्टर बनाया जाए। भूमि का मूल्यांकन पारदर्शी हो और इक्विटी-निर्धारण स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर हो।
  • अधिग्रहण की स्थिति में उचित प्रतिकर, पुनर्वास और विशेषकर मछुआरा समुदाय की आजीविका-सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
  • 45 वर्ष की रियायत में नियमित समीक्षा, प्रदर्शन-आधारित शर्तें और स्पष्ट विवाद-समाधान तंत्र रखे जाएँ।
  • परियोजनाओं के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन और CRZ मानदंडों का कड़ाई से पालन हो, और स्थानीय समुदायों से परामर्श लिया जाए।
  • पत्तन क्षेत्र विकास प्राधिकरण की भू-उपयोग योजना को स्थानीय निकायों और नगर एवं ग्राम आयोजना की व्यवस्था के साथ समन्वित किया जाए।
  • निवेशकों के चयन में EoI, G2G और CIAL जैसे मॉडलों की तुलनात्मक व्यवहार्यता जाँचकर परियोजना-विशेष के अनुकूल मॉडल अपनाया जाए।
  • तटीय सुरक्षा एजेंसियों और केंद्र सरकार के साथ नियमित समन्वय रखा जाए, ताकि राज्य के निर्णय राष्ट्रीय नीति से सुसंगत रहें।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

गैर-प्रमुख बंदरगाह (Minor Ports) और समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31 · राज्य समुद्री बोर्ड (State Maritime Board) · सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) · सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) और रियायत अवधि (Concession Period) · समुद्री भूमि बैंक (Maritime Land Bank) · बंदरगाह क्षेत्र विकास प्राधिकरण · एकल-खिड़की निर्णय तंत्र (Single-Window Decision Mechanism) · बंदरगाह-आधारित विकास (Port-led Development) और सागरमाला · तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) और मछुआरों की आजीविका · भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास (RFCTLARR अधिनियम, 2013) · प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण अधिनियम, 2021 · विझिंजम अंतरराष्ट्रीय पारपोत बंदरगाह

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • सातवीं अनुसूची, संघ सूची प्रविष्टि 27: प्रमुख बंदरगाह संघ के अधीन
  • सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची प्रविष्टि 31: प्रमुख बंदरगाहों से भिन्न बंदरगाह
  • अनुच्छेद 162: राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
  • अनुच्छेद 298: राज्य द्वारा व्यापार और कारोबार संचालन
  • अनुच्छेद 300A: विधि के प्राधिकार बिना संपत्ति से वंचन नहीं

अवधारणा प्रवाह

विद्यमान अधिनियम में बोर्ड के दायित्वों और शक्तियों का वैधानिक अभाव  →  निर्णय अनेक विभागों से गुज़रने के कारण विलंब और स्वतंत्र निर्णय-क्षमता का अभाव  →  संशोधन: मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में बहु-विभागीय बोर्ड और धारा 7A में 48 खंडों के दायित्व  →  भूमि बैंक (धारा 22A) और पत्तन क्षेत्र विकास प्राधिकरण (धारा 103) से भूमि और नियोजन की व्यवस्था  →  धारा 22 के तहत PPP और 45 वर्ष तक की रियायत अवधि से निजी निवेश को आकर्षित करना  →  राज्य की भूमि-आधारित इक्विटी और निवेश के अन्य मॉडलों (EoI, G2G, CIAL जैसे) से पूँजी जुटाना  →  बंदरगाह और पोर्ट सिटी परियोजनाओं का विकास तथा राज्य की राजस्व-वृद्धि और आर्थिक संवृद्धि

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. भारत में बंदरगाहों के शासन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रमुख बंदरगाह संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची का विषय हैं।
2. प्रमुख बंदरगाह घोषित बंदरगाहों से भिन्न बंदरगाह समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31 में आते हैं।
3. प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण अधिनियम, 2021 के अंतर्गत प्रमुख बंदरगाहों का प्रशासन संबंधित राज्य सरकारों को सौंपा गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: प्रमुख बंदरगाह संघ सूची में हैं। कथन 2 सही है: गैर-प्रमुख बंदरगाह समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31 में हैं, इसलिए राज्य उन पर विधि बना सकते हैं। कथन 3 गलत है: 2021 का अधिनियम प्रमुख बंदरगाहों के लिए केंद्र द्वारा बनाया गया है और वे केंद्र के अधीन ही रहते हैं।

Q2. अभिकथन (A): राज्य विधानमंडल राज्य के समुद्री बोर्ड से संबंधित अधिनियम में संशोधन कर सकता है।
कारण (R): प्रमुख बंदरगाह घोषित बंदरगाहों से भिन्न बंदरगाह समवर्ती सूची में हैं, जिस पर संसद और राज्य विधानमंडल दोनों विधि बना सकते हैं।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, किंतु R गलत है
  4. A गलत है, किंतु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — गैर-प्रमुख बंदरगाह समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31 में आते हैं, इसलिए राज्य विधानमंडल को उन पर विधि बनाने की शक्ति है (अनुच्छेद 246)। यही शक्ति राज्य के समुद्री बोर्ड के अधिनियम में संशोधन का संवैधानिक आधार है। यदि संसद की विधि से विरोध हो तो अनुच्छेद 254 लागू होता है।

Q3. संविधान के अनुच्छेदों को उनके विषय से सुमेलित कीजिए:
स्तंभ I (अनुच्छेद)
A. अनुच्छेद 246
B. अनुच्छेद 254
C. अनुच्छेद 162
D. अनुच्छेद 298
स्तंभ II (विषय)
1. संसद और राज्य विधानमंडलों द्वारा निर्मित विधियों की विषय-वस्तु का वितरण
2. समवर्ती सूची के विषय पर संघ और राज्य की विधियों में असंगति
3. राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
4. व्यापार या कारबार करने और संपत्ति के अर्जन की शक्ति

  1. A-1, B-2, C-3, D-4
  2. A-2, B-1, C-4, D-3
  3. A-1, B-3, C-2, D-4
  4. A-3, B-2, C-1, D-4

उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — अनुच्छेद 246 संसद और राज्य विधानमंडलों के बीच विधायी विषयों का वितरण करता है। अनुच्छेद 254 समवर्ती सूची में संघ और राज्य की विधियों की असंगति से संबंधित है। अनुच्छेद 162 राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार बताता है। अनुच्छेद 298 संघ और राज्यों को व्यापार या कारबार करने और संपत्ति अर्जित करने की शक्ति देता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ केरल समुद्री बोर्ड (संशोधन) विधेयक में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाला बोर्ड, समुद्री भूमि बैंक, बंदरगाह क्षेत्र विकास प्राधिकरण और 45 वर्ष तक की रियायत अवधि के साथ सार्वजनिक-निजी भागीदारी का प्रावधान है। गैर-प्रमुख बंदरगाहों के शासन में राज्यों की संवैधानिक भूमिका के संदर्भ में इन प्रावधानों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि बंदरगाह-आधारित विकास में निवेश-आकर्षण को सामाजिक-पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों से कैसे संतुलित किया जा सकता है। (15 Marks)

रूपरेखा: भूमिका (2-3 पंक्तियाँ): विधेयक का उद्देश्य निर्णय-प्रक्रिया का केंद्रीकरण और निवेश के लिए स्पष्ट वैधानिक ढाँचा बनाना है।

1. संवैधानिक स्थिति: प्रमुख बंदरगाह संघ सूची में हैं और उनके लिए प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण अधिनियम, 2021 है। गैर-प्रमुख बंदरगाह समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31 में हैं, जिन पर राज्य विधि बना सकते हैं (अनुच्छेद 246)। केंद्रीय विधि से विरोध होने पर अनुच्छेद 254 लागू होगा। भारतीय पत्तन अधिनियम, 1908 की पृष्ठभूमि बताइए। राज्य समुद्री बोर्ड का गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अनुभव और सागरमाला तथा राज्य समुद्री विकास परिषद के माध्यम से सहकारी संघवाद का संदर्भ दीजिए।

2. विधेयक के प्रावधानों का मूल्यांकन (सकारात्मक): धारा 3 के संशोधन से बंदरगाह, मत्स्य, उद्योग, वित्त, राजस्व, विधि और तटीय सुरक्षा विभागों के एक मंच पर आने से अंतर-विभागीय विलंब घटेगा। धारा 7A के 48 खंडों में बोर्ड के दायित्व पहले केवल नियमों में थे, अब अधिनियम में हैं, जिससे विधिक स्पष्टता और जवाबदेही बढ़ती है। धारा 22A का भूमि बैंक और धारा 103 का बंदरगाह क्षेत्र विकास प्राधिकरण, जिसकी भूमि-उपयोग योजना नगर एवं ग्राम आयोजना अधिनियम के अंतर्गत अधिसूचित होगी, योजनाबद्ध विकास का आधार बनते हैं। धारा 22 में 45 वर्ष तक की रियायत से दीर्घ-परिपक्वता परियोजनाओं के लिए निवेशक का भरोसा और निविदा से राजस्व बढ़ सकता है। राज्य की इक्विटी भूमि के रूप में होने से राजकोषीय दबाव कम होता है (CIAL मॉडल का उल्लेख)।

3. आलोचनात्मक पक्ष: मुख्यमंत्री के अध्यक्ष होने से निर्णय-शक्ति का कार्यपालिका में संकेंद्रण और विभागीय विशेषज्ञता तथा संस्थागत स्वायत्तता के कमजोर पड़ने का खतरा। लंबी रियायत अवधि में शुल्क-निर्धारण, निष्पादन-मानक और अनुबंध-पुनर्वार्ता के जोखिम तथा संभावित एकाधिकार। भूमि को इक्विटी मानने पर मूल्यांकन की पारदर्शिता का प्रश्न। भूमि अधिग्रहण में RFCTLARR अधिनियम, 2013 के अनुसार सहमति और सामाजिक प्रभाव आकलन की आवश्यकता। तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) अधिसूचना, पर्यावरणीय मंजूरी और मछुआरा समुदायों की आजीविका पर प्रभाव, जैसे विझिंजम बंदरगाह के संदर्भ में उठे प्रश्न।

4. सुझाव और संतुलन: स्वतंत्र विनियामक या शुल्क-निर्धारण निकाय, खुली और प्रतिस्पर्धी निविदा, भूमि बैंक का सार्वजनिक प्रकटीकरण, मत्स्य समुदायों और स्थानीय निकायों का प्रतिनिधित्व, पुनर्वास का स्पष्ट प्रावधान, CAG और विधानमंडल द्वारा लेखा-परीक्षा और निगरानी, पर्यावरणीय और तटीय सुरक्षा मानदंडों का अनुपालन।

निष्कर्ष: बंदरगाह-आधारित आर्थिक संवृद्धि और सतत विकास के बीच संतुलन, जिसमें पारदर्शी शासन, सहभागी निर्णय और पर्यावरणीय न्याय केंद्र में हों।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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