16 Oct डीएफएस ने आरक्षण नीति पर सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों के लिए कार्यशाला आयोजित की
✎ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और वित्तीय संस्थानों में आरक्षण अनुच्छेद 16 के संवैधानिक ढाँचे, इंद्रा साहनी (1992) की 50 प्रतिशत सीमा और क्रीमी लेयर सिद्धांत तथा अनुच्छेद 335 की दक्षता शर्त के अधीन लागू होता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन एवं संविधान (सामाजिक न्याय हेतु संवैधानिक प्रावधान और आरक्षण) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, बीमा कंपनियाँ और वित्तीय संस्थान)
- Prelims: अनुच्छेद 16(4), 16(4A), 16(4B) और 16(6) — आरक्षण से संबंधित प्रावधान, अनुच्छेद 335 — प्रशासनिक दक्षता के साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के दावों का संतुलन, 103वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 — आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (EWS) हेतु आरक्षण, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act, 2016) की धारा 34 — सरकारी प्रतिष्ठानों में 4 प्रतिशत आरक्षण, इंद्रा साहनी मामला (1992) — 50 प्रतिशत की सीमा और क्रीमी लेयर का सिद्धांत, एम. नागराज मामला (2006) — पदोन्नति में आरक्षण हेतु शर्तें, बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (Banking Regulation Act, 1949), कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(72) — सार्वजनिक वित्तीय संस्था (Public Financial Institution) की परिभाषा
- Essay: सामाजिक न्याय और प्रशासनिक दक्षता: सार्वजनिक वित्तीय क्षेत्र में आरक्षण की भूमिका, राष्ट्र-निर्माण में सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएँ: समावेशन, वित्तीय पहुँच और जवाबदेही
त्वरित पुनरावृत्ति: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और वित्तीय संस्थानों में आरक्षण अनुच्छेद 16 के संवैधानिक ढाँचे, इंद्रा साहनी (1992) की 50 प्रतिशत सीमा और क्रीमी लेयर सिद्धांत तथा अनुच्छेद 335 की दक्षता शर्त के अधीन लागू होता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवाएँ विभाग (DFS) ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों और सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों के लिए आरक्षण नीति पर एक कार्यशाला आयोजित की। इन संस्थानों पर सरकारी आरक्षण नीति के दिशानिर्देश लागू होते हैं, इसलिए भर्ती और पदोन्नति में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (EWS) और दिव्यांगजन के लिए निर्धारित आरक्षण के प्रावधानों की समझ और उनके एकसमान क्रियान्वयन पर बल देना ऐसी कार्यशालाओं का मुख्य उद्देश्य है। यह विषय प्रशासनिक प्रक्रिया और संवैधानिक दायित्व दोनों से जुड़ा है।
पृष्ठभूमि
- 1969 और 1980 में सरकार ने चयनित वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, जिसके बाद ये सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बने और इनमें सरकारी नीतियों के अनुरूप भर्ती की व्यवस्था लागू हुई।
- संविधान के भाग XVI में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए विधायी स्थानों के आरक्षण का प्रावधान है, जबकि सार्वजनिक सेवाओं में आरक्षण के लिए अनुच्छेद 16 मुख्य आधार है।
- मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1990 के दशक में केंद्र सरकार की सेवाओं में ओबीसी आरक्षण लागू हुआ, जिसे इंद्रा साहनी मामले (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने वैध ठहराते हुए क्रीमी लेयर के सिद्धांत को स्वीकार किया।
- 103वें संविधान संशोधन (2019) द्वारा अनुच्छेद 15(6) और 16(6) जोड़े गए, जिससे आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लिए शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक रोज़गार में 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया।
- सार्वजनिक वित्तीय संस्थाएँ, जैसे राष्ट्रीय स्तर की विकास वित्तीय संस्थाएँ, भी कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत परिभाषित होती हैं और इनमें भर्ती पर सरकारी आरक्षण नीति लागू होती है।
- आरक्षण नीति के क्रियान्वयन में रोस्टर प्रणाली, रिक्तियों की गणना और बैकलॉग भरने जैसी प्रक्रियात्मक चुनौतियाँ बनी रहती हैं, इसलिए प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
आरक्षण नीति क्या है?
- आरक्षण नीति का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों को सार्वजनिक सेवाओं और शिक्षा में उचित प्रतिनिधित्व दिलाना है, जो संविधान के समानता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14 से 16) की व्याख्या का हिस्सा है।
- अनुच्छेद 16(4) राज्य को पिछड़े वर्गों के उचित प्रतिनिधित्व हेतु नियुक्तियों में आरक्षण देने की शक्ति देता है, जबकि अनुच्छेद 16(4A) पदोन्नति में आरक्षण की अनुमति देता है।
- अनुच्छेद 16(4B) के अंतर्गत किसी वर्ष की अधूरी रिक्तियों को अगले वर्ष में आगे ले जाने (कैरी फ़ॉरवर्ड) की व्यवस्था है, जिसे कुल आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा से अलग रखा जाता है।
- इंद्रा साहनी मामले में 50 प्रतिशत की सीमा का सिद्धांत स्थापित हुआ, जबकि एम. नागराज मामले में पदोन्नति में आरक्षण के लिए पिछड़ेपन, प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता और प्रशासनिक दक्षता पर विचार करने की शर्तें रखी गईं।
- अनुच्छेद 335 के अनुसार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के दावों पर प्रशासन की दक्षता बनाए रखने की दृष्टि से विचार किया जाता है।
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 34 के अनुसार सरकारी प्रतिष्ठानों में दिव्यांगजनों के लिए 4 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।
- सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 और राष्ट्रीयकरण संबंधी अधिनियमों के अधीन कार्य करते हैं, जबकि उनकी भर्ती पर सरकारी आरक्षण दिशानिर्देश वित्तीय सेवाएँ विभाग द्वारा समन्वित किए जाते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| कार्यशाला का आयोजन | वित्तीय सेवाएँ विभाग (Department of Financial Services — DFS) ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों और सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों के लिए आरक्षण नीति पर कार्यशाला आयोजित की। यह सरकारी नीति के क्रियान्वयन पर केंद्रित प्रशासनिक पहल है। |
| संस्थागत दायरा | सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, बीमा कंपनियाँ और वित्तीय संस्थान एक ही नीतिगत ढाँचे में आते हैं। इन संस्थानों की भर्ती और पदोन्नति में आरक्षण के प्रावधान लागू होते हैं। |
| संवैधानिक आधार | अनुच्छेद 16(4) पिछड़े वर्गों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण का आधार है। अनुच्छेद 16(4A) अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की पदोन्नति में परिणामी वरिष्ठता की व्यवस्था करता है। |
| कार्यान्वयन का उपकरण | रोस्टर प्रणाली (Roster System) के माध्यम से रिक्तियों को क्रमबद्ध किया जाता है और हर पद को आरक्षित या अनारक्षित के रूप में चिह्नित किया जाता है। इससे आरक्षण का हिसाब रखा जाता है। |
| नीति-समन्वय की भूमिका | आरक्षण से जुड़े सामान्य दिशानिर्देश कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय के स्तर पर जारी होते हैं। वित्तीय क्षेत्र के संस्थानों में इन्हें लागू करने का काम वित्त मंत्रालय के अंतर्गत विभाग के माध्यम से होता है। |
महत्व
सामाजिक न्याय और समावेशन
- सार्वजनिक वित्तीय क्षेत्र में सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना संवैधानिक समता के लक्ष्य से जुड़ा है।
- अनुच्छेद 15 और 16 में निहित समानता के सिद्धांत को संस्थागत स्तर पर लागू करने का माध्यम यह नीति है।
- निर्णय-निर्माण के पदों पर विविध सामाजिक पृष्ठभूमि के अधिकारी होने से नीतियों का सामाजिक दृष्टिकोण व्यापक होता है।
आर्थिक और वित्तीय क्षेत्र
- सार्वजनिक बैंक और बीमा कंपनियाँ वित्तीय समावेशन की प्रमुख संस्थागत कड़ियाँ हैं, इसलिए उनके कार्मिक ढाँचे का सीधा असर सेवा-वितरण पर पड़ता है।
- सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों में प्रतिनिधित्व से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों की ऋण-आवश्यकताओं की समझ बेहतर होती है।
- संस्थागत विश्वसनीयता और जनता का भरोसा तभी बढ़ता है जब भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी और नियमों के अनुरूप हो।
शासन और प्रशासनिक सुधार
- रोस्टर और रिक्तियों के नियमित पुनरीक्षण से भर्ती प्रक्रिया में मनमानी की गुंजाइश कम होती है।
- नीति की व्याख्या और क्रियान्वयन पर संयुक्त कार्यशालाएँ विभिन्न संस्थानों के बीच एकरूपता लाती हैं।
- न्यायिक निर्णयों के अनुरूप प्रशासनिक व्यवहार विधिक जोखिम को कम करता है।
चुनौतियाँ
1. बैकलॉग रिक्तियों की समस्या
- आरक्षित श्रेणी के पद वर्षों तक भरे न जाने से बैकलॉग (Backlog) बनता है।
- बैकलॉग रिक्तियों को विशेष भर्ती अभियान के माध्यम से भरने की व्यवस्था की आवश्यकता रहती है।
- भर्ती की कमी से आरक्षण का वास्तविक लाभ लक्षित वर्गों तक नहीं पहुँच पाता।
यूपीएससी लिंक: GS-2: सामाजिक न्याय — संवैधानिक प्रावधान और उनका क्रियान्वयन
2. दक्षता बनाम प्रतिनिधित्व का संतुलन
- अनुच्छेद 335 प्रशासनिक दक्षता बनाए रखने की शर्त के साथ अनुसूचित जाति और जनजाति के दावों पर विचार करने की बात करता है।
- संस्थानों में विशेषज्ञता की आवश्यकता और सामाजिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है।
- इस संतुलन के लिए प्रशिक्षण और क्षमता-विकास के उपाय आवश्यक हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: शासन — लोक प्रशासन में दक्षता और समावेशन
3. पदोन्नति में परिणामी वरिष्ठता और आंकड़ों की आवश्यकता
- अनुच्छेद 16(4A) के अंतर्गत पदोन्नति में आरक्षण के लिए संबंधित वर्ग के पिछड़ेपन और अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के आंकड़े आवश्यक माने गए हैं।
- एम. नागराज वाद (M. Nagaraj Case, 2006) में इस प्रकार के आंकड़ों की आवश्यकता पर बल दिया गया।
- आंकड़ों का अभाव या अपूर्ण रिकॉर्ड विवादों और न्यायिक चुनौतियों का कारण बन सकता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संविधान और न्यायपालिका — न्यायिक निर्णय और संवैधानिक व्याख्या
4. 50 प्रतिशत की सीमा और न्यायिक दृष्टिकोण
- इंदिरा साहनी वाद (Indra Sawhney Case, 1992) में आरक्षण की अधिकतम सीमा सामान्यतः 50 प्रतिशत मानी गई है।
- विभिन्न श्रेणियों के आरक्षण को जोड़ते समय इस न्यायिक सीमा का पालन करना आवश्यक है।
- क्रीमी लेयर (Creamy Layer) का सिद्धांत अन्य पिछड़े वर्गों पर लागू होता है, इसलिए श्रेणीवार नियमों की स्पष्ट समझ आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संविधान — न्यायिक समीक्षा और सामाजिक न्याय
5. संस्थानों में नीति की एकरूपता
- सार्वजनिक बैंक, बीमा कंपनियाँ और वित्तीय संस्थान अलग-अलग प्रशासनिक ढाँचों और भर्ती-संस्थाओं के अंतर्गत कार्य करते हैं।
- एक समान रोस्टर और रिपोर्टिंग प्रणाली के अभाव में निगरानी कठिन होती है।
- संस्थानों के बीच नियमों की व्याख्या में भिन्नता से भ्रम और विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: भारतीय अर्थव्यवस्था — सार्वजनिक वित्तीय क्षेत्र का शासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| बैकलॉग रिक्तियाँ | आरक्षित पदों का वर्षों तक खाली रहना आरक्षण के उद्देश्य को कमजोर करता है। |
| रोस्टर का सही अनुपालन | गलत रोस्टर या अपूर्ण रिकॉर्ड से आरक्षण का वास्तविक प्रभाव सीमित हो जाता है। |
| पदोन्नति में आंकड़ों की आवश्यकता | एम. नागराज वाद के अनुसार अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के आंकड़ों के बिना पदोन्नति में आरक्षण विवादित हो सकता है। |
| दक्षता और प्रतिनिधित्व का संतुलन | अनुच्छेद 335 के अनुसार प्रशासनिक दक्षता बनाए रखना आवश्यक है, जिससे नीति-निर्माण में संतुलन की चुनौती आती है। |
| न्यायिक सीमा का पालन | इंदिरा साहनी वाद में निर्धारित 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक आरक्षण संवैधानिक जाँच के दायरे में आ सकता है। |
| संस्थानों के बीच एकरूपता | विभिन्न संस्थानों में अलग-अलग व्याख्या और प्रक्रिया से निगरानी और जवाबदेही कमजोर होती है। |
आगे की राह
- सभी संस्थानों में रोस्टर रजिस्टर का नियमित पुनरीक्षण और मानकीकृत डिजिटल प्रणाली अपनाई जाए।
- बैकलॉग रिक्तियों की पहचान कर उनके लिए समयबद्ध विशेष भर्ती अभियान चलाए जाएँ।
- पदोन्नति में आरक्षण से पहले अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और पिछड़ेपन से संबंधित आंकड़ों का व्यवस्थित संग्रह किया जाए।
- भर्ती और पदोन्नति अधिकारियों के लिए आरक्षण नियमों और न्यायिक निर्णयों पर नियमित प्रशिक्षण दिया जाए।
- आरक्षण की शिकायतों के निवारण के लिए स्पष्ट और सुलभ शिकायत तंत्र स्थापित किया जाए।
- कार्मिक मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के बीच नीतिगत समन्वय को संस्थागत रूप दिया जाए, ताकि दिशानिर्देशों की व्याख्या में एकरूपता रहे।
- प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक प्रतिनिधित्व के संतुलन पर आधारित मूल्यांकन-पद्धति विकसित की जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
आरक्षण नीति (Reservation Policy) · अनुच्छेद 16(4) और 16(4A)–16(4B) · अनुच्छेद 335 और प्रशासनिक दक्षता · इंद्रा साहनी मामला (1992) · एम. नागराज मामला (2006) · जरनैल सिंह मामला (2018) · 103वाँ संविधान संशोधन (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) · उन्नत वर्ग (Creamy Layer) · सार्वजनिक वित्तीय संस्थान (Public Financial Institutions) · वित्तीय सेवा विभाग (Department of Financial Services) · सामाजिक न्याय और समावेशी प्रतिनिधित्व · सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (Public Sector Banks)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 16(4): पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व हेतु आरक्षण का आधार
- अनुच्छेद 16(4A): अनुसूचित जाति/जनजाति की पदोन्नति में परिणामी वरिष्ठता
- अनुच्छेद 16(6): आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों हेतु आरक्षण का प्रावधान
- अनुच्छेद 335: प्रशासनिक दक्षता के साथ अनुसूचित जाति/जनजाति दावों का संतुलन
अवधारणा प्रवाह
संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 16 और 335) सार्वजनिक सेवाओं में आरक्षण का विधिक आधार देते हैं। → कार्मिक मंत्रालय के सामान्य दिशानिर्देश आरक्षण के व्यापक नियम तय करते हैं। → वित्तीय सेवाएँ विभाग सार्वजनिक बैंकों, बीमा कंपनियों और वित्तीय संस्थानों में इन नियमों के क्रियान्वयन पर कार्यशाला आयोजित करता है। → संस्थान रोस्टर प्रणाली से रिक्तियों का वर्गीकरण कर आरक्षित और अनारक्षित पदों का निर्धारण करते हैं। → भर्ती और पदोन्नति में नियमों का पालन होने पर प्रतिनिधित्व बढ़ता है और सामाजिक न्याय का लक्ष्य आगे बढ़ता है। → न्यायिक निर्णय (इंदिरा साहनी और एम. नागराज वाद) इन प्रक्रियाओं की वैधता की कसौटी तय करते हैं। → नियमित निगरानी, आंकड़ा-आधारित समीक्षा और प्रशिक्षण से नीति के परिणाम लगातार सुधरते हैं।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 16(4) राज्य को ऐसे पिछड़े वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों में आरक्षण का उपबंध करने की शक्ति देता है, जिसका राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न हो।
2. अनुच्छेद 16(4B) के अंतर्गत किसी वर्ष की अभरी आरक्षित रिक्तियों को अगले वर्षों में आगे ले जाया जा सकता है और ऐसी रिक्तियाँ उस वर्ष की 50 प्रतिशत की सीमा में नहीं गिनी जातीं।
3. 103वें संविधान संशोधन के द्वारा शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश और सार्वजनिक नियोजन में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत तक आरक्षण का उपबंध किया गया।
4. सर्वोच्च न्यायालय ने 50 प्रतिशत की सीमा का सिद्धांत स्वयं संविधान के मूल पाठ में निहित माना है, इसलिए यह सीमा संसद द्वारा संशोधन से भी नहीं बदली जा सकती।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी चार
उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 16(4) पिछड़े वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों में आरक्षण की शक्ति देता है। कथन 2 सही है: 81वें संशोधन (2000) द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 16(4B) बैकलॉग रिक्तियों को 50 प्रतिशत सीमा से बाहर रखता है। कथन 3 सही है: 103वें संशोधन (2019) द्वारा अनुच्छेद 15(6) और 16(6) जोड़े गए। कथन 4 गलत है: 50 प्रतिशत की सीमा इंद्रा साहनी मामले (1992) में न्यायिक व्याख्या से निर्धारित हुई, संविधान के मूल पाठ में यह सीमा नहीं लिखी गई है।
Q2. कथन (A): सर्वोच्च न्यायालय ने जरनैल सिंह मामले (2018) में निर्णय दिया कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को पदोन्नति में आरक्षण देने से पहले राज्य को उनके पिछड़ेपन और अपर्याप्त प्रतिनिधित्व से संबंधित मात्रात्मक आँकड़े एकत्र करने की आवश्यकता नहीं है।
कारण (R): इसी निर्णय में न्यायालय ने कहा कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों पर भी उन्नत वर्ग (Creamy Layer) का सिद्धांत उसी प्रकार लागू होता है जैसा अन्य पिछड़े वर्गों पर।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सत्य हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सत्य है, किंतु (R) असत्य है।
- (A) असत्य है, किंतु (R) सत्य है।
उत्तर: (A) सत्य है, किंतु (R) असत्य है। — कथन (A) सही है: जरनैल सिंह (2018) में न्यायालय ने एम. नागराज (2006) के मात्रात्मक आँकड़ों वाले उपबंध को अनुसूचित जाति/जनजाति की पदोन्नति के संदर्भ में आवश्यक नहीं माना। कारण (R) गलत है: इसी निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति/जनजाति पर उन्नत वर्ग का सिद्धांत लागू नहीं होता, जबकि अन्य पिछड़े वर्गों पर यह लागू होता है।
Q3. निम्नलिखित प्रावधानों को उनकी विषय-वस्तु से सुमेलित कीजिए:
सूची I (प्रावधान)
1. अनुच्छेद 15(4)
2. अनुच्छेद 16(4A)
3. अनुच्छेद 335
4. अनुच्छेद 16(6)
सूची II (विषय-वस्तु)
A. पदोन्नति में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के पक्ष में आरक्षण का उपबंध
B. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के दावों पर प्रशासन की दक्षता बनाए रखने की शर्त के साथ विचार
C. आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सार्वजनिक नियोजन में आरक्षण का उपबंध
D. सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए विशेष उपबंध, जिसमें शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश भी सम्मिलित है
सही सुमेलन चुनिए:
- 1-D, 2-A, 3-B, 4-C
- 1-A, 2-D, 3-C, 4-B
- 1-D, 2-C, 3-A, 4-B
- 1-B, 2-A, 3-D, 4-C
उत्तर: 1-D, 2-A, 3-B, 4-C — अनुच्छेद 15(4) सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जाति/जनजाति सहित) की उन्नति हेतु विशेष उपबंध करता है, जिसमें शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश शामिल है (D)। अनुच्छेद 16(4A) पदोन्नति में अनुसूचित जाति/जनजाति के आरक्षण से संबंधित है (A)। अनुच्छेद 335 इन वर्गों के दावों को प्रशासन की दक्षता के अनुरूप रखने की शर्त देता है (B)। अनुच्छेद 16(6) आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए नियोजन में आरक्षण देता है (C)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों और सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों में आरक्षण नीति का प्रशासनिक अनुपालन संवैधानिक प्रतिबद्धता और प्रशासनिक दक्षता, दोनों के बीच संतुलन की माँग करता है। इस संदर्भ में संवैधानिक ढाँचे का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि क्या 103वें संविधान संशोधन के पश्चात 50 प्रतिशत की समग्र सीमा का पुनर्विचार न्यायोचित है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. भूमिका: वित्तीय सेवा विभाग (DFS), वित्त मंत्रालय द्वारा इन संस्थानों में आरक्षण नीति पर कार्यशाला का संदर्भ; आरक्षण को समानता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14, 16) और राज्य-नीति के निदेशक तत्व (अनुच्छेद 46) से जोड़ना।
2. संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 15(4), 15(5), 15(6); अनुच्छेद 16(1), 16(4), 16(4A), 16(4B), 16(6); अनुच्छेद 335 (प्रशासनिक दक्षता की शर्त)। सार्वजनिक वित्तीय संस्थान की परिभाषा कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(72) के संदर्भ में।
3. न्यायिक विकास: इंद्रा साहनी मामला (1992) में 50 प्रतिशत सीमा और उन्नत वर्ग (Creamy Layer) का सिद्धांत, पदोन्नति में आरक्षण पर प्रारंभिक रोक; 77वाँ संशोधन (1995) के बाद अनुच्छेद 16(4A); एम. नागराज मामला (2006) में 77वें, 81वें, 82वें और 85वें संशोधनों की वैधता, तथा तीन कसौटियाँ, पिछड़ापन, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक दक्षता; जरनैल सिंह मामला (2018) में अनुसूचित जाति/जनजाति पर उन्नत वर्ग का सिद्धांत लागू न होना; जनहित अभियान मामला (2022) में 103वें संशोधन की वैधता (बहुमत 3:2) की पुष्टि।
4. आँकड़े और ढाँचा: अनुसूचित जाति 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति 7.5 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग 27 प्रतिशत, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग 10 प्रतिशत; दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 34 के अंतर्गत दिव्यांगजनों के लिए न्यूनतम 4 प्रतिशत आरक्षण; बैंक भर्ती में IBPS जैसी भर्ती एजेंसियों की भूमिका और बैकलॉग रिक्तियों का प्रबंधन।
5. विभिन्न दृष्टिकोण: (क) सामाजिक न्याय और वास्तविक समानता (डॉ. बी.आर. अंबेडकर की संकल्पना; सामाजिक प्रतिनिधित्व और संस्थागत विविधता); (ख) दक्षता और योग्यता का तर्क (अनुच्छेद 335; वित्तीय क्षेत्र में तकनीकी दक्षता की आवश्यकता); (ग) उन्नत वर्ग का बहिष्करण और आरक्षण के लाभों का असमान वितरण; OBC उप-वर्गीकरण हेतु रोहिणी आयोग (2017) की रिपोर्ट पर बहस।
6. निष्कर्ष: 50 प्रतिशत सीमा के पुनर्विचार पर संवैधानिक संतुलन का मूल्यांकन; सुझाव: डेटा-आधारित समीक्षा, उन्नत वर्ग मानदंडों की नियमित समीक्षा, और सार्वजनिक संस्थानों में प्रतिनिधित्व व दक्षता के मध्य संतुलित नीति।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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