केरल के इरिन्जालाकुडा टाउन सहकारी बैंक पर RBI निर्देशों का विस्तार, जानिए पूरा मामला

केरल के इरिन्जालाकुडा टाउन सहकारी बैंक पर RBI निर्देशों का विस्तार, जानिए पूरा मामला

RBI निर्देश अवधि विस्तार प्रक्रियानिर्देश जारी29 जुलाई 2025प्रथम विस्तार30 जनवरी 2026द्वितीय विस्तार30 जनवरी 2027
RBI निर्देश अवधि विस्तार प्रक्रिया

✎ धारा 35A के अंतर्गत RBI सार्वजनिक हित में निर्देश देता है, धारा 56 इसे सहकारी बैंकों पर लागू करती है, और निर्देश का विस्तार वित्तीय सुदृढ़ता का प्रमाण नहीं होता।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — अर्थव्यवस्था (बैंकिंग क्षेत्र का नियमन, RBI की भूमिका, सहकारी बैंकिंग)  |  GS Paper II — शासन (वैधानिक संस्थाओं की शक्तियाँ, सहकारी संघवाद, सार्वजनिक हित में हस्तक्षेप की प्रक्रिया)
  • Prelims: बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A (RBI के निर्देश देने की शक्ति), बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 56 (सहकारी बैंकों पर संशोधनों सहित लागू होने वाले प्रावधान), सहकारी बैंक: राज्य सूची की प्रविष्टि 32 और केंद्रीय बैंकिंग नियमन का द्वैध ढाँचा, RBI का निर्देश विस्तार: निर्देश ‘समीक्षा के अधीन’ होता है और इसे वित्तीय सुदृढ़ता का प्रमाण नहीं माना जाता, DICGC (जमा बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम) द्वारा जमाकर्ताओं को ₹5 लाख तक की बीमा सुरक्षा, संविधान का भाग IX-B (97वाँ संशोधन, 2011) और अनुच्छेद 43B (सहकारी समितियों का संवर्धन), प्रॉम्प्ट कॉरेक्टिव एक्शन (PCA) ढाँचा, जो सहकारी बैंकों पर भी लागू होता है, बैंककारी विनियमन (संशोधन) अधिनियम, 2020 द्वारा सहकारी बैंकों के लिए RBI की शक्तियों का विस्तार
  • Essay: सहकारी बैंकिंग में नियामकीय संतुलन: जमाकर्ता हित, स्वायत्तता और वित्तीय स्थिरता, कमज़ोर बैंकों के लिए नियामकीय हस्तक्षेप: सार्वजनिक हित बनाम संस्थागत स्वायत्तता

त्वरित पुनरावृत्ति: धारा 35A के अंतर्गत RBI सार्वजनिक हित में निर्देश देता है, धारा 56 इसे सहकारी बैंकों पर लागू करती है, और निर्देश का विस्तार वित्तीय सुदृढ़ता का प्रमाण नहीं होता।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने केरल के इरिंजालकुडा टाउन सहकारी बैंक लिमिटेड के संबंध में बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A के साथ धारा 56 के अंतर्गत जारी निर्देश की अवधि तीन माह और बढ़ाई है। यह विस्तार 30 अक्टूबर 2026 के बाद से 30 जनवरी 2027 के कारोबार समाप्ति तक लागू होगा और यह समीक्षा के अधीन है। RBI ने स्पष्ट किया है कि अवधि-विस्तार का अर्थ यह नहीं है कि बैंक की वित्तीय स्थिति से वह संतुष्ट है। अन्य सभी शर्तें यथावत रहेंगी। यह प्रकरण इस बात का उदाहरण है कि RBI सार्वजनिक हित में किस प्रकार नियामकीय निर्देशों को लागू रखता है और उनकी समय-सीमा का नियमित पुनरावलोकन करता है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में बैंकिंग का नियमन मुख्यतः बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 के अंतर्गत होता है, जिसे RBI लागू करता है। सहकारी बैंकों के संदर्भ में धारा 56 के माध्यम से इस अधिनियम के चुनिंदा प्रावधान संशोधनों के साथ लागू किए जाते हैं।
  • इस प्रकरण में मूल निर्देश 29 जुलाई 2025 को जारी हुआ था, जो छह माह के लिए (30 जनवरी 2026 तक) प्रभावी था। इसके बाद इसकी अवधि क्रमशः बढ़ाई गई, और अब यह 30 जनवरी 2027 तक है।
  • सहकारी बैंक सहकारी समितियों के रूप में पंजीकृत होते हैं, इसलिए उनके गठन और प्रबंधन पर राज्य सहकारी कानूनों और संबंधित रजिस्ट्रार की भूमिका होती है, जबकि बैंकिंग कार्यों के नियमन में RBI की भूमिका केंद्रीय है। यही द्वैध ढाँचा नियामकीय समन्वय की चुनौती पैदा करता है।
  • 2020 के बैंककारी विनियमन (संशोधन) अधिनियम के बाद सहकारी बैंकों पर RBI का पर्यवेक्षण अधिक सुदृढ़ हुआ, जिसमें बैंक के बोर्ड और प्रबंधन से संबंधित कुछ शक्तियाँ भी शामिल हैं।
  • कमज़ोर बैंकों के लिए RBI प्रॉम्प्ट कॉरेक्टिव एक्शन (PCA) जैसे उपाय अपनाता है, जिनमें जमा प्राप्ति, ऋण वितरण और लाभांश वितरण पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
  • जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए DICGC द्वारा प्रत्येक जमाकर्ता को ₹5 लाख तक की बीमा सुरक्षा दी जाती है, जिससे बैंक संकट में भी जमाकर्ताओं का विश्वास बना रहे।

धारा 35A और धारा 56 के अंतर्गत RBI के निर्देश क्या हैं?

  • धारा 35A RBI को यह शक्ति देती है कि वह जनहित, जमाकर्ताओं के हित या बैंक के उचित संचालन के लिए किसी बैंक को निर्देश जारी कर सके।
  • ये निर्देश बैंक के कामकाज पर प्रतिबंध या नियंत्रण से संबंधित हो सकते हैं, जैसे जमा स्वीकार करने, ऋण देने या निधियों के उपयोग पर सीमाएँ।
  • धारा 56 इस शक्ति को सहकारी बैंकों पर भी लागू करती है, जिसमें आवश्यक संशोधन सम्मिलित हैं।
  • निर्देश की अवधि सीमित होती है और उसे आवश्यकता होने पर विस्तारित या संशोधित किया जा सकता है; प्रत्येक विस्तार का आधार सार्वजनिक हित होना आवश्यक है।
  • अवधि-विस्तार का अर्थ यह नहीं है कि बैंक की वित्तीय स्थिति संतोषजनक मानी गई है; यह केवल नियामकीय पर्यवेक्षण की निरंतरता को दर्शाता है।
  • ऐसे निर्देश जमाकर्ताओं की सुरक्षा और बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता सुनिश्चित करने का साधन हैं, दंड का प्रावधान नहीं।
  • संविधान के अनुच्छेद 43B के अंतर्गत सहकारी समितियों के स्वायत्त, लोकतांत्रिक और व्यावसायिक संचालन को बढ़ावा देने की राज्य की नीति निर्धारित की गई है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
निर्देश की कानूनी आधार बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (Banking Regulation Act, 1949) की धारा 35A के उपधारा (1) के अंतर्गत भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India, RBI) को शक्ति प्राप्त है। यह शक्ति धारा 56 के माध्यम से सहकारी बैंकों पर भी लागू होती है।
अवधि विस्तार की प्रकृति निर्देश को तीन माह के लिए, 30 अक्टूबर 2026 के कारोबार समाप्ति से 30 जनवरी 2027 के कारोबार समाप्ति तक बढ़ाया गया है। यह विस्तार ‘समीक्षा के अधीन’ है, अर्थात् अवधि के भीतर स्थिति के आधार पर इसमें परिवर्तन संभव है।
विस्तार का औचित्य RBI ने जनहित में इस विस्तार को आवश्यक माना है। निर्देश का उद्देश्य बैंक के कामकाज को नियंत्रित रखना और जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करना है।
वित्तीय स्थिति पर स्पष्टीकरण विस्तार का अर्थ यह नहीं है कि RBI बैंक की वित्तीय स्थिति से संतुष्ट है। यह स्पष्टीकरण नियामक पारदर्शिता का उदाहरण है, क्योंकि अवधि-विस्तार को अक्सर बैंक की सुदृढ़ता का प्रमाण मान लिया जाता है।
शेष शर्तों की स्थिति पूर्ववर्ती निर्देश की अन्य सभी शर्तें अपरिवर्तित रहेंगी। इससे स्पष्ट होता है कि यह केवल समय-सीमा का विस्तार है, नीति में बदलाव नहीं।

महत्व

नियामकीय (Regulatory)

  • धारा 35A के अंतर्गत निर्देश RBI का एक सुधारात्मक और निवारक उपकरण है, जिससे किसी बैंक के कामकाज को जमाकर्ताओं और बैंकिंग प्रणाली के हित में नियंत्रित किया जाता है।
  • सहकारी बैंकों पर धारा 56 के माध्यम से RBI की पर्यवेक्षी शक्ति का प्रयोग यह दर्शाता है कि सहकारी बैंक भी बैंकिंग नियमन के दायरे में आते हैं।

वित्तीय स्थिरता (Financial Stability)

  • छोटे और क्षेत्रीय सहकारी बैंकों की विफलता का प्रभाव सीमित क्षेत्र के जमाकर्ताओं और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। समय पर हस्तक्षेप से यह जोखिम नियंत्रित होता है।
  • निर्देश की अवधि बढ़ाकर RBI बैंक को सुधार का अवसर देता है, जबकि बैंकिंग प्रणाली पर पड़ने वाले संक्रमण (Contagion) के जोखिम को सीमित रखता है।

जमाकर्ता संरक्षण (Depositor Protection)

  • बैंकिंग व्यवस्था में जमाकर्ताओं का विश्वास बनाए रखना नियामक का प्रमुख उद्देश्य है। जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम (Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation, DICGC) प्रति जमाकर्ता प्रति बैंक 5 लाख रुपये तक की जमा राशि का बीमा करता है, परंतु निर्देश का उद्देश्य बैंक को जोखिम की स्थिति से निकालना भी है।

सहकारी क्षेत्र का सुशासन (Co-operative Governance)

  • सहकारी बैंकों में प्रबंधन, निदेशक मंडल और ऋण-वितरण की गुणवत्ता पर निगरानी आवश्यक होती है। ऐसे निर्देश सहकारी संस्थाओं के सुशासन को सुदृढ़ करने का माध्यम बनते हैं।

चुनौतियाँ

1. वित्तीय सुदृढ़ता की कमी

  • निर्देश का लंबे समय तक विस्तार बताता है कि बैंक की वित्तीय स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है।
  • पूंजी पर्याप्तता, परिसंपत्ति गुणवत्ता और लाभप्रदता में सुधार की गति पर निरंतर नज़र रखना आवश्यक होता है।

2. दोहरी नियामकीय संरचना

  • सहकारी बैंकों के बैंकिंग पक्ष पर RBI नियामक है, जबकि उनके पंजीकरण, प्रबंधन और चुनाव संबंधी पक्ष राज्य सहकारी कानूनों और राज्य के सहकारी रजिस्ट्रार के अधीन आते हैं।
  • दोनों प्राधिकरणों के बीच समन्वय की कमी से सुधार प्रक्रिया धीमी हो सकती है।

3. जमाकर्ताओं के विश्वास पर प्रभाव

  • लंबी अवधि के निर्देश स्थानीय जमाकर्ताओं में अनिश्चितता पैदा कर सकते हैं, जिससे जमा निकासी का दबाव बन सकता है।
  • बीमा सीमा से ऊपर की जमा राशि वाले जमाकर्ता अधिक जोखिम में होते हैं, इसलिए स्पष्ट सूचना देना आवश्यक है।

4. नियामकीय विलंब और सुधार की गति

  • बार-बार विस्तार से यह प्रश्न उठता है कि समस्या का स्थायी समाधान कब होगा।
  • समय पर पुनर्गठन, विलय या अन्य विकल्पों का चयन न होने पर बैंक की समस्याएं और गहरी हो सकती हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

समस्या चिंता
पूंजी और परिसंपत्ति गुणवत्ता बैंक की वित्तीय स्थिति में स्थायी सुधार का प्रमाण अभी स्पष्ट नहीं है।
दोहरी नियामकीय जिम्मेदारी RBI और राज्य सहकारी प्राधिकरणों के बीच समन्वय सुधार की गति को प्रभावित कर सकता है।
जमाकर्ता विश्वास अवधि-विस्तार से स्थानीय जमाकर्ताओं में असमंजस और निकासी का दबाव बन सकता है।
बीमा सीमा से अधिक जमा 5 लाख रुपये से अधिक जमा वाले खाताधारक आंशिक जोखिम में रहते हैं।
नियामकीय विलंब बार-बार विस्तार से समाधान में देरी और सुधार की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ सकते हैं।

आगे की राह

  • बैंक की वित्तीय स्थिति की नियमित और सार्वजनिक रूप से सुलभ समीक्षा की जाए, ताकि अवधि-विस्तार के कारण स्पष्ट हों।
  • RBI और राज्य सहकारी रजिस्ट्रार के बीच सूचना-साझाकरण और संयुक्त निगरानी तंत्र को सुदृढ़ किया जाए।
  • पूंजी पर्याप्तता और परिसंपत्ति गुणवत्ता के लक्ष्य तय कर उनकी प्रगति का समय-बद्ध मूल्यांकन किया जाए।
  • जमाकर्ताओं को DICGC बीमा सीमा, जमा की स्थिति और अपने अधिकारों के बारे में सरल भाषा में जानकारी दी जाए।
  • सुधार न होने की स्थिति में विलय या पुनर्गठन जैसे विकल्पों पर समय पर निर्णय लिया जाए।
  • सहकारी बैंकों के निदेशक मंडल की योग्यता, स्वतंत्रता और जवाबदेही से जुड़े मानकों को मजबूत किया जाए।
  • ऋण-वितरण में उचित जोखिम-मूल्यांकन और सुशासन की प्रणाली को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

धारा 35A, बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (Section 35A, Banking Regulation Act, 1949) · धारा 56 और सहकारी बैंकों पर लागू संशोधित प्रावधान (Section 56) · भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India) का सहकारी बैंक नियमन · लोक हित और जमाकर्ता संरक्षण · निदेश का विस्तार और समीक्षा-आधारित नियंत्रण · सहकारी संघवाद और राज्य सूची की प्रविष्टि 32 · 97वाँ संविधान संशोधन, भाग IX-ख (Part IX-B) और अनुच्छेद 243ZH · जमा बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम (DICGC) · वैद्यनाथन समिति (Vaidyanathan Committee, 2005) की सिफ़ारिशें · बैंकिंग में नैतिक जोखिम और पर्यवेक्षी हस्तक्षेप · सहकारी बैंकों की वित्तीय स्थिरता

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 43B: सहकारी समितियों का संवर्धन
  • सप्तम अनुसूची, संघ सूची प्रविष्टि 45: बैंकिंग का विषय
  • सप्तम अनुसूची, राज्य सूची प्रविष्टि 32: सहकारी समितियों का विनियमन

अवधारणा प्रवाह

बैंक में वित्तीय या प्रबंधन संबंधी अनियमितताएं या जोखिम उत्पन्न होते हैं।  →  RBI धारा 35A के अंतर्गत जमाकर्ताओं और जनहित की रक्षा हेतु निर्देश जारी करता है।  →  धारा 56 के माध्यम से यह निर्देश सहकारी बैंक पर भी लागू होता है।  →  निर्देश की अवधि समीक्षा के आधार पर बढ़ाई जाती है, जिससे सुधार के लिए समय मिलता है।  →  विस्तार का अर्थ वित्तीय सुदृढ़ता का प्रमाण नहीं माना जाता, और सुधार की स्थिति के अनुसार अगला निर्णय लिया जाता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A के अंतर्गत भारतीय रिज़र्व बैंक लोक हित में या जमाकर्ताओं और बैंक के हितों के विरुद्ध कार्य रोकने हेतु बैंकिंग कंपनियों को निदेश जारी कर सकता है।
2. धारा 56 बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के कुछ प्रावधानों को संशोधनों सहित सहकारी समितियों पर लागू करती है।
3. धारा 35A के अंतर्गत जारी निदेश का विस्तार अपने-आप यह सिद्ध करता है कि रिज़र्व बैंक बैंक की वित्तीय स्थिति से संतुष्ट है।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: धारा 35A लोक हित और जमाकर्ता संरक्षण के लिए निदेश देने की शक्ति देती है। कथन 2 सही है: धारा 56 सहकारी बैंकों पर संशोधनों सहित लागू होती है। कथन 3 गलत है, क्योंकि ऐसे विस्तार को रिज़र्व बैंक की संतुष्टि नहीं माना जा सकता, जैसा कि निदेश में स्पष्ट किया गया है। अतः सही उत्तर ‘केवल दो’ है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): भारतीय रिज़र्व बैंक धारा 35A के अंतर्गत जारी निदेश की अवधि को सीमित अवधि के लिए आगे बढ़ा सकता है।
कारण (R): ऐसे निदेश लोक हित में जारी किए जाते हैं और उनकी समय-समय पर समीक्षा की जाती है।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
  2. (b) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. (c) A सही है, परंतु R गलत है
  4. (d) A गलत है, परंतु R सही है

उत्तर: (a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — हाल के उदाहरण में निदेश की अवधि तीन-तीन महीने के विस्तार द्वारा बढ़ाई गई और हर विस्तार ‘समीक्षा के अधीन’ रखा गया। इसलिए R, A की सही व्याख्या करता है। विस्तार का आधार लोक हित का निर्धारण है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलित सूची पर विचार कीजिए:

सूची I (प्रावधान/संस्था)
1. धारा 35A, बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949
2. धारा 56, बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949
3. जमा बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम (DICGC)
4. भाग IX-ख, संविधान (अनुच्छेद 243ZH से संबंधित)

सूची II (विशेषता)
(a) लोक हित में निदेश जारी करने की रिज़र्व बैंक की शक्ति
(b) सहकारी बैंकों पर बैंकिंग विनियमन अधिनियम के प्रावधानों का संशोधनों सहित प्रयोग
(c) जमाकर्ताओं को एक निश्चित सीमा तक बीमा सुरक्षा
(d) सहकारी समितियों के निगमन, विनियमन और समापन से संबंधित राज्य विधान

सही सुमेलन चुनिए:

  1. 1-b, 2-c, 3-a, 4-d
  2. 1-a, 2-d, 3-b, 4-c
  3. 1-a, 2-b, 3-c, 4-d
  4. 1-d, 2-a, 3-c, 4-b

उत्तर: 1-a, 2-b, 3-c, 4-d — धारा 35A रिज़र्व बैंक को लोक हित में निदेश देने की शक्ति देती है (1-a)। धारा 56 सहकारी बैंकों पर संशोधनों सहित प्रावधान लागू करती है (2-b)। DICGC जमाकर्ताओं को सीमित बीमा सुरक्षा देता है (3-c)। अनुच्छेद 243ZH से संबंधित भाग IX-ख सहकारी समितियों के निगमन और विनियमन पर राज्य विधान की बात करता है (4-d)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ सहकारी बैंकों के नियमन में भारतीय रिज़र्व बैंक को प्राप्त निदेशात्मक शक्तियाँ (जैसे बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A के अंतर्गत) जमाकर्ता संरक्षण और सहकारी स्वायत्तता के बीच संतुलन को किस प्रकार प्रभावित करती हैं? इन शक्तियों के संवैधानिक आधार की आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि जब ऐसे निदेशों का बार-बार विस्तार किया जाता है, तो नियामक पारदर्शिता और बैंक के दीर्घकालिक पुनरुद्धार पर क्या प्रभाव पड़ते हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल उत्तर के बिंदु:

1. प्रस्तावना: केरल के इरिंजालकुडा टाउन सहकारी बैंक लिमिटेड पर लागू निदेश का तथ्यात्मक सार। निदेश 29 जुलाई 2025 को छह महीने के लिए जारी हुआ, फिर 30 जनवरी 2026 से 30 अक्टूबर 2026 तक बढ़ा और अब 30 जनवरी 2027 तक तीन महीने के लिए बढ़ाया गया। विस्तार ‘लोक हित’ के आधार पर है और यह बैंक की वित्तीय स्थिति पर संतुष्टि का संकेत नहीं है।

2. विधिक ढाँचा: (क) धारा 35A(1), बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में लोक हित में या जमाकर्ताओं के हित के विरुद्ध कार्य रोकने हेतु निदेश देने की शक्ति। (ख) धारा 56 द्वारा सहकारी बैंकों पर संशोधनों सहित प्रावधान लागू होना। (ग) धारा 36AB (बैंकिंग विधि (संशोधन) अधिनियम, 2020 द्वारा जोड़ी गई) के अंतर्गत प्रशासक नियुक्ति जैसे उपायों का उल्लेख, जिसे सावधानीपूर्वक ही प्रस्तुत करें।

3. संवैधानिक आयाम: बैंकिंग संविधान की संघ सूची की प्रविष्टि 45 में आता है, जबकि सहकारी समितियाँ राज्य सूची की प्रविष्टि 32 में हैं। 97वें संविधान संशोधन (2011) द्वारा भाग IX-ख और अनुच्छेद 243ZH से 243ZT जोड़े गए तथा अनुच्छेद 19(1)(ग) के अंतर्गत सहकारी समिति बनाने का अधिकार मौलिक अधिकार बना। इससे केंद्र-राज्य समन्वय और सहकारी संघवाद का प्रश्न उठता है।

4. संतुलन के पक्ष: जमाकर्ता संरक्षण, प्रणालीगत स्थिरता, नैतिक जोखिम (moral hazard) की रोकथाम, और जमा बीमा तंत्र (DICGC, प्रति जमाकर्ता 5 लाख रुपये तक, 2020 से)। नरसिम्हन समिति (1991, 1998) की सिफ़ारिशें नियामक सुदृढ़ता पर आधारित थीं।

5. स्वायत्तता के पक्ष: सहकारी लोकतंत्र, सदस्य-नियंत्रित प्रबंधन, राज्य रजिस्ट्रार की भूमिका और अति-केंद्रीकरण की आलोचना। वैद्यनाथन समिति (2005) ने अल्पकालिक सहकारी ऋण संरचना के पुनरुद्धार हेतु केंद्र-राज्य समन्वय और प्रबंधन सुधारों की सिफ़ारिश की थी।

6. समीक्षा और पारदर्शिता: तीन-तीन महीने की अवधि, ‘समीक्षा के अधीन’ शर्त और ‘अन्य शर्तें अपरिवर्तित’ का अर्थ। बार-बार विस्तार से पुनरुद्धार की समय-सीमा का अनिश्चित होना, जमाकर्ता विश्वास पर प्रभाव, और नियामक विवेक की जवाबदेही का प्रश्न।

7. निष्कर्ष: संतुलित दृष्टिकोण, जिसमें समयबद्ध पुनरुद्धार योजना, स्पष्ट मानदंड, न्यायिक समीक्षा की उपलब्धता और सहकारी स्वायत्तता के संरक्षण के बीच संतुलन सुझाया जाए।

स्रोत: RBI

Kerala PCS (Kerala PSC (KAS)) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: भारतीय बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A और धारा 56 के तहत निर्देशों के संदर्भ में, हाल ही में इरिंजालकुडा टाउन सहकारी बैंक लिमिटेड, केरल को दिए गए ‘पेरी’ (PERI) के विस्तार का मुख्य उद्देश्य क्या है?

  1. A. बैंक की तरलता स्थिति में सुधार करना
  2. B. बैंक के ग्राहकों को अतिरिक्त ऋण सुविधाएं प्रदान करना
  3. C. बैंक के परिचालन क्षेत्र में वृद्धि करना
  4. D. बैंक के कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि करना

उत्तर: A. बैंक की तरलता स्थिति में सुधार करना — निर्देशों का उद्देश्य बैंक की तरलता स्थिति में सुधार करना है, ताकि वह अपने ग्राहकों की मांगों को पूरा कर सके।

Mains: भारतीय बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A और धारा 56 के तहत निर्देशों के संदर्भ में, सहकारी बैंकों के विनियमन में केरल सरकार की भूमिका की चर्चा करें। इसके अतिरिक्त, इरिंजालकुडा टाउन सहकारी बैंक लिमिटेड के मामले में ‘पेरी’ (PERI) के विस्तार के प्रभावों का विश्लेषण करें।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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