संविधान को जन-आंदोलन से बचाने की सत्याग्रह की ज़रूरत

संविधान को जन-आंदोलन से बचाने की सत्याग्रह की ज़रूरत

संविधान को जन-आंदोलन से बचाने की सत्याग्रह की ज़रूरत

सत्याग्रह बनाम सार्वजनिक व्यवस्थासत्याग्रह परंपरा (गांधी)शासन पक्ष (विधि व्यवस्था)अहिंसा और नैतिक प्रतिरोधअहिंसक विरोधविधि के दायरे में रहनानागरिक अधिकारसंविधान को साझा संपदासार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखनाविरोध का अधिकारमौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19)उचित विनियमन आवश्यकनिवारक निरोधनहींअनुच्छेद 22 के तहतज़मानत नीतिअनावश्यक गिरफ्तारी सीमितन्यायालयों द्वारा विचाराधीन बंदीमतदाता सूची विवादनागरिक भागीदारीनिर्वाचन आयोग द्वारा संशोधन
सत्याग्रह बनाम सार्वजनिक व्यवस्था

✎ शांतिपूर्ण और बिना हथियार के सभा का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(ख) के अंतर्गत मौलिक अधिकार है, जो अनुच्छेद 19(3) के आधार पर सार्वजनिक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शासन, संविधान, राजनीति और सामाजिक न्याय (मौलिक अधिकार, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग)  |  सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र I — भारतीय समाज (सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन, गांधीवादी और आंबेडकरवादी विचारधारा)
  • Prelims: अनुच्छेद 19 (वाक् एवं अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा और संगठन की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(2) और 19(3) — युक्तियुक्त निर्बंधन और सार्वजनिक व्यवस्था, अनुच्छेद 22 — निवारक निरोध (Preventive Detention) से संरक्षण, ज़मानत (Bail) का सिद्धांत — ‘ज़मानत नियम है, जेल अपवाद है’, रामलीला मैदान मामला (2012) — विरोध का अधिकार पूर्ण नहीं, स्थान और समय पर नियंत्रण संभव, अनुच्छेद 324 — निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की शक्तियाँ, मतदाता सूची (Electoral Roll) और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950, अनुच्छेद 326 — वयस्क मताधिकार (यह सांविधिक अधिकार है, मौलिक अधिकार नहीं)
  • Essay: असहमति और विरोध लोकतंत्र की जीवनशक्ति है, परंतु उसकी सीमाएँ विधि के शासन द्वारा तय होती हैं, संविधान केवल शासन का दस्तावेज़ है या नागरिकों की साझी विरासत (Constitution as commons)?

त्वरित पुनरावृत्ति: शांतिपूर्ण और बिना हथियार के सभा का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(ख) के अंतर्गत मौलिक अधिकार है, जो अनुच्छेद 19(3) के आधार पर सार्वजनिक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

यह खबर चर्चा में क्यों?

द हिंदू में 15 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक विचारप्रधान लेख में कार्यकर्ता और विधिवेत्ता कल्पना कन्नाबिरन ने देश में चल रहे नागरिक प्रदर्शनों को सत्याग्रह की परंपरा से जोड़ा है। इन प्रदर्शनों का एक प्रमुख विषय मतदाता सूचियों से जुड़े कथित अनियमितताओं के आरोप और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका से संबंधित है। लेख में पुलिस बल के प्रयोग, कुछ बंदियों की ज़मानत के मामलों में न्यायालयों के दृष्टिकोण और ‘विधिसम्मत विरोध’ की परिभाषा पर प्रश्न उठाए गए हैं। लेख का तर्क है कि संविधान को नागरिकों की साझी संपदा के रूप में देखा जाना चाहिए। यह एक लेखक का मत है। इसके विपरीत, शासन से जुड़े पक्ष सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और विधि के दायरे में रहकर विरोध करने पर बल देते हैं। UPSC की दृष्टि से मुख्य प्रश्न यह है कि विरोध का अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था, निवारक निरोध और ज़मानत की संवैधानिक व्यवस्था एक-दूसरे से कैसे संबंधित हैं।

पृष्ठभूमि

  • गांधी जी का सत्याग्रह (1917 के चंपारण आंदोलन से प्रारंभ) अहिंसक और नैतिक प्रतिरोध की पद्धति थी, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में जन-भागीदारी की नई दिशा दी। भारतीय संविधान में शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार इसी परंपरा से जुड़ा माना जाता है।
  • संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने मौलिक अधिकारों और संवैधानिक नैतिकता पर बल दिया। प्रस्तावना (Preamble) में न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श निहित हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट ने रामलीला मैदान मामले (2012) में स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार मौलिक अधिकार है, परंतु इसे सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरों के अधिकारों के हित में उचित रूप से विनियमित किया जा सकता है।
  • निवारक निरोध की व्यवस्था अनुच्छेद 22 में दी गई है, जिसमें बंदी को गिरफ्तारी के आधार बताने और सलाहकार बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करने जैसे संरक्षण प्रदान किए गए हैं। इसके लिए निवारक निरोध से संबंधित विभिन्न विधियाँ भी बनी हैं।
  • ज़मानत के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) के संदर्भ में बार-बार यह दोहराया है कि विचाराधीन बंदी की लंबी कैद और अनावश्यक गिरफ्तारी को सीमित किया जाना चाहिए।
  • मतदाता सूची की तैयारी और संशोधन का कार्य निर्वाचन आयोग के अधीन होता है (अनुच्छेद 324), जबकि मताधिकार वयस्क नागरिकों को अनुच्छेद 326 के अंतर्गत प्राप्त है। इसलिए मतदाता सूची से जुड़े विवाद संवैधानिक और सांविधिक दोनों आयामों से जुड़े हैं।

संविधान में शांतिपूर्ण विरोध और सार्वजनिक व्यवस्था का संतुलन क्या है?

  • अनुच्छेद 19(1)(क) वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(ख) बिना हथियार के शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 19(2) और 19(3) इन स्वतंत्रताओं पर भारत की संप्रभुता, सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार और नैतिकता के आधार पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाने की अनुमति देते हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट के अनुसार निर्बंधन ‘युक्तियुक्त’ होने चाहिए, अर्थात् वे मनमाने न हों और उनका उद्देश्य वैध हो। न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) इसी आधार पर की जाती है।
  • निवारक निरोध और सामान्य आपराधिक प्रक्रिया में अंतर है। निवारक निरोध में व्यक्ति को अपराध किए बिना आशंका के आधार पर रोका जाता है, जबकि सामान्य प्रक्रिया में आरोप सिद्ध होने तक निर्दोषता की धारणा मानी जाती है।
  • ज़मानत का प्रश्न अनुच्छेद 21 में निहित व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है। न्यायालय अपराध की गंभीरता, साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की आशंका और अभियुक्त के भागने के जोखिम जैसे आधारों पर विचार करता है।
  • सत्याग्रह की पद्धति में अहिंसा, नैतिक अपील और विधि के प्रति सम्मान अपेक्षित माने जाते हैं। इसी कारण ‘विधिसम्मत’ विरोध की अवधारणा पर विचार-विमर्श होता है।
  • संविधान को नागरिकों की साझी विरासत मानने का विचार यह बल देता है कि मौलिक अधिकार, संस्थाएँ और प्रक्रियाएँ सभी नागरिकों के लिए सुलभ और जवाबदेह हों।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
सत्याग्रह का नैतिक आधार गांधीजी की अहिंसक और नैतिक प्रतिरोध की परंपरा को संवैधानिक मूल्यों के साथ जोड़ा जा रहा है। लेख के अनुसार सत्याग्रह समय के साथ नए रूप ले रहा है।
संविधान को साझी संपत्ति (Constitution as Commons) के रूप में देखना संविधान को किसी एक सत्ता का नहीं, बल्कि सभी नागरिकों का साझा ढांचा माना जा रहा है। प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता इसका केंद्र है।
नागरिकता की नई भाषा अधिकारों के प्रति जागरूकता और सक्रिय नागरिक भागीदारी बढ़ी है। मताधिकार, शिक्षा और आवास जैसे विषयों पर सार्वजनिक विमर्श नागरिकता की समझ को गहरा कर रहा है।
विधिसम्मत और अवैध विरोध प्रदर्शन का प्रश्न शांतिपूर्ण सभा के अधिकार और युक्तियुक्त निर्बंधन की सीमा पर बहस है। विरोध प्रदर्शन को विधिसम्मत मानने की कसौटी क्या हो, यह प्रश्न केंद्र में है।
न्यायपालिका की भूमिका जमानत और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में न्यायिक अनुशासन और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन पर विचार हो रहा है। लेखिका ने इस संतुलन पर अपनी आलोचनात्मक राय रखी है।
निर्वाचक नामावली से जुड़ी चिंता मताधिकार की शुद्धता और निर्वाचन आयोग की शक्तियों से संबंधित सार्वजनिक चिंता उभरी है। यह विषय अनुच्छेद 324 और अनुच्छेद 326 से सीधे जुड़ा है।

महत्व

संवैधानिक

  • अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देते हैं, जिनका प्रयोग विरोध प्रदर्शन में होता है।
  • संविधान की सर्वोच्चता और मौलिक अधिकारों की रक्षा में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की भूमिका केंद्रीय है।
  • विरोध प्रदर्शन को विधिसम्मत मानने की कसौटी संवैधानिक व्याख्या से तय होती है, इसलिए यह विषय व्याख्या की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

सामाजिक

  • सहभागी लोकतंत्र में नागरिकों की भागीदारी से नीति-निर्माण अधिक समावेशी बनता है।
  • प्रस्तावना का बंधुता का मूल्य सामाजिक सौहार्द और संवाद की आवश्यकता पर बल देता है।
  • मौलिक कर्तव्यों (अनुच्छेद 51A) में संविधान और उसके आदर्शों के प्रति सम्मान शामिल है, जो असहमति के शांतिपूर्ण प्रयोग से भी जुड़ता है।

विधिक और न्यायिक

  • निवारक निरोध (Preventive Detention) में अनुच्छेद 22 के सुरक्षोपाय और अनुच्छेद 21 के अंतर्गत वैयक्तिक स्वतंत्रता की रक्षा आवश्यक है।
  • जमानत का प्रश्न स्वतंत्रता और न्याय की प्रक्रिया के बीच संतुलन का विषय है, जिसकी व्याख्या न्यायालय करते हैं।

नैतिक और शासन

  • अहिंसक प्रतिरोध लोकतांत्रिक शासन में असहमति को व्यक्त करने का वैध माध्यम माना जाता है।
  • शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही से नागरिक विश्वास बढ़ता है और असहमति की तीव्रता कम हो सकती है।

चुनौतियाँ

1. सार्वजनिक व्यवस्था और मौलिक अधिकार के बीच संतुलन

  • शांतिपूर्ण सभा का अधिकार असीमित नहीं है। अनुच्छेद 19(3) के अंतर्गत सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं।
  • यह तय करना कठिन है कि कौन सा विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण है और कौन सा सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बनता है।
  • अधिक सख्ती से असहमति दब सकती है, जबकि ढिलाई से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

2. निवारक निरोध और जमानत में विलंब

  • निवारक निरोध में व्यक्ति को बिना दोषसिद्धि के सीमित अवधि तक हिरासत में रखा जा सकता है। अनुच्छेद 22 इसके लिए सलाहकार बोर्ड और सूचना के अधिकार जैसे सुरक्षोपाय देता है।
  • जमानत के मामलों में लंबी प्रतीक्षा से विचाराधीन कैदियों की संख्या बढ़ती है और वैयक्तिक स्वतंत्रता पर प्रश्न उठते हैं।
  • जमानत पर न्यायिक विवेक और कानूनी प्रावधानों की सख्ती के बीच संतुलन कठिन होता है।

3. पुलिस बल का प्रयोग और पुलिस सुधार

  • विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा बल प्रयोग की मात्रा और तरीके पर सार्वजनिक प्रश्न उठते हैं।
  • प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधार के लिए निर्देश दिए थे, जिनका क्रियान्वयन राज्यों में असमान रहा है।
  • पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा, दोनों की जिम्मेदारी निभानी होती है।

4. निर्वाचक नामावली की शुद्धता और मताधिकार

  • निर्वाचक नामावली में त्रुटियों और संशोधन प्रक्रिया को लेकर विवाद होने पर मताधिकार की सुरक्षा का प्रश्न उठता है।
  • निर्वाचन आयोग के अधीक्षण में नामावली तैयार और संशोधित होती है, इसलिए प्रक्रिया की पारदर्शिता आवश्यक है।
  • दावे और आपत्ति की प्रक्रिया की जानकारी और पहुंच सभी नागरिकों तक समान रूप से होना आवश्यक है।

5. संवैधानिक विमर्श का ध्रुवीकरण

  • संवैधानिक शब्दों जैसे विधिसम्मत, न्यायिक अनुशासन और लोकतंत्र की व्याख्या पर सार्वजनिक मतभेद गहरे हो सकते हैं।
  • विरोधी दृष्टिकोणों को एक-दूसरे के प्रति अविश्वास में बदलने से संवाद की जगह सिकुड़ती है।
  • लेख एक व्यक्तिगत आलोचनात्मक दृष्टिकोण है, इसलिए विद्यार्थी को इसे विभिन्न पक्षों के तर्कों के साथ परखना चाहिए।

6. संस्थागत संतुलन और शक्ति पृथक्करण

  • न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्ति पृथक्करण में प्रत्येक संस्था की सीमा स्पष्ट रहनी चाहिए।
  • न्यायिक समीक्षा से संवैधानिक संकट में न्यायालय की भूमिका बढ़ती है, परंतु न्यायिक संयम भी आवश्यक है।
  • संस्थाओं पर सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने के लिए उनकी स्वायत्तता और जवाबदेही दोनों सुनिश्चित करनी होती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
विरोध प्रदर्शन की वैधता शांतिपूर्ण विरोध और सार्वजनिक व्यवस्था भंग के बीच स्पष्ट कसौटी का अभाव बहस का विषय है।
बल प्रयोग अधिक बल प्रयोग से नागरिक विश्वास घटता है और असहमति का तनाव बढ़ता है।
निवारक निरोध और जमानत लंबी हिरासत और जमानत में विलंब से वैयक्तिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
निर्वाचक नामावली मताधिकार की सुरक्षा और प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सार्वजनिक भरोसा आवश्यक है।
वैधानिक अधिवक्ता की सुरक्षा विधिक सहायता देने वाले अधिवक्ताओं की पेशेवर स्वतंत्रता पर प्रश्न उठता है।
संवाद का अभाव नीतिगत विवाद जब संवाद के बजाय ध्रुवीकरण में बदलते हैं, तो समाधान कठिन हो जाता है।

आगे की राह

  • विरोध प्रदर्शन के लिए स्पष्ट प्रक्रियात्मक दिशानिर्देश बनाए जाएं, जिनमें प्रशासन और आयोजकों के बीच पूर्व संवाद की व्यवस्था हो।
  • पुलिस प्रशिक्षण में मानवाधिकार और न्यूनतम बल प्रयोग के सिद्धांत को केंद्र में रखा जाए तथा प्रकाश सिंह मामले (2006) के निर्देशों के क्रियान्वयन की समीक्षा हो।
  • निवारक निरोध और जमानत से जुड़े मामलों में त्वरित सुनवाई सुनिश्चित की जाए और विचाराधीन कैदियों की संख्या घटाने पर ध्यान दिया जाए।
  • निर्वाचक नामावली संशोधन में दावे और आपत्ति की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और सार्वजनिक रूप से सुलभ बनाया जाए।
  • विधिक सहायता तंत्र को सुदृढ़ किया जाए और अधिवक्ताओं की पेशेवर स्वतंत्रता की रक्षा के लिए स्पष्ट प्रावधान हों।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) जैसी स्वतंत्र संस्थाओं की भूमिका को प्रभावी बनाया जाए, ताकि राज्य बल के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो।
  • स्कूल और उच्च शिक्षा स्तर पर संविधान साक्षरता और मौलिक कर्तव्यों की शिक्षा दी जाए, ताकि असहमति का शांतिपूर्ण और संवैधानिक प्रयोग बढ़े।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

सत्याग्रह (Satyagraha) · संविधान की साझी संपदा (Constitution as Commons) · शांतिपूर्ण और निहत्थे सभा का अधिकार · अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) · उचित निर्बंध (Reasonable Restrictions) · अनुच्छेद 21 और प्रक्रिया द्वारा स्थापित विधि · निवारक निरोध (Preventive Detention) · अनुच्छेद 22 · आनुपातिकता परीक्षण (Proportionality Test) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · निर्वाचक नामावली (Electoral Roll) · अनुच्छेद 324 और निर्वाचन आयोग (Election Commission) · प्रस्तावना के मूल्य (Values of the Preamble) · सिविल अवज्ञा और संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 19(1)(a) और (b) — अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार
  • अनुच्छेद 19(2) और (3) — सार्वजनिक व्यवस्था पर युक्तियुक्त निर्बंधन
  • अनुच्छेद 21 — जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता की रक्षा
  • अनुच्छेद 22 — निवारक निरोध के संवैधानिक सुरक्षोपाय
  • अनुच्छेद 32 और 226 — रिट के माध्यम से न्यायिक उपचार
  • अनुच्छेद 324 — निर्वाचक नामावली पर निर्वाचन आयोग का अधीक्षण
  • अनुच्छेद 326 — वयस्क मताधिकार का सिद्धांत

अवधारणा प्रवाह

संवैधानिक अधिकारों और नागरिकता के प्रति सार्वजनिक जागरूकता बढ़ती है।  →  मताधिकार, शिक्षा और आवास जैसे मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन और सत्याग्रह के नए रूप सामने आते हैं।  →  प्रशासन और पुलिस की प्रतिक्रिया में बल प्रयोग और निरोध पर विवाद उठता है।  →  विधिक प्रक्रिया में जमानत याचिकाएं आती हैं और न्यायालयों में विधिसम्मत विरोध प्रदर्शन की परिभाषा पर बहस होती है।  →  संविधान को साझी संपत्ति मानने की अवधारणा सार्वजनिक विमर्श में केंद्रीय बनती है।  →  नीति-निर्माण में पुलिस सुधार, निर्वाचन पारदर्शिता और विधिक सहायता की मांग उठती है।  →  संस्थागत सुधार और संवाद से असहमति को संवैधानिक दायरे में व्यक्त करने का वातावरण बनता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 19(1)(ख) के अंतर्गत नागरिकों को शांतिपूर्ण और निहत्थे सभा करने का अधिकार प्राप्त है।
2. अनुच्छेद 19(3) के अंतर्गत भारत की संप्रभुता और अखंडता तथा सार्वजनिक व्यवस्था के हित में सभा के अधिकार पर उचित निर्बंध लगाए जा सकते हैं।
3. अनुच्छेद 22(4) के अनुसार निवारक निरोध में किसी व्यक्ति को सलाहकार बोर्ड की राय के बिना कितनी भी अवधि तक निरुद्ध रखा जा सकता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। अनुच्छेद 19(1)(ख) केवल नागरिकों को शांतिपूर्ण और निहत्थे सभा का अधिकार देता है, और 19(3) सभा पर भारत की संप्रभुता, अखंडता तथा सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर निर्बंध की अनुमति देता है। कथन 3 गलत है, क्योंकि अनुच्छेद 22(4) के अंतर्गत सलाहकार बोर्ड की राय के बिना निरोध की अधिकतम अवधि तीन माह है।

Q2. अभिकथन (A): निवारक निरोध की व्यवस्था संविधान के अंतर्गत व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीमित अपवाद के रूप में स्वीकृत है।
कारण (R): अनुच्छेद 22 निवारक निरोध की विधि का प्रावधान करता है और निरुद्ध व्यक्ति को निरोध के आधारों की सूचना तथा प्रतिनिधित्व करने के अधिकार जैसे सुरक्षा उपाय देता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (क) A और R दोनों सत्य हैं और R, A का सही स्पष्टीकरण है
  2. (ख) A और R दोनों सत्य हैं, किंतु R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है
  3. (ग) A सत्य है, किंतु R असत्य है
  4. (घ) A असत्य है, किंतु R सत्य है

उत्तर: (क) A और R दोनों सत्य हैं और R, A का सही स्पष्टीकरण है — अनुच्छेद 21 की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर निवारक निरोध एक संवैधानिक अपवाद है, इसलिए A सत्य है। अनुच्छेद 22(3) से (7) में निरोध के आधारों की सूचना, प्रतिनिधित्व का अवसर और सलाहकार बोर्ड जैसे सुरक्षा उपाय दिए गए हैं, जो इस अपवाद की वैधता का आधार हैं। अतः R, A को सही ढंग से स्पष्ट करता है।

Q3. सूची-I (संवैधानिक प्रावधान) और सूची-II (विषय) को सुमेलित कीजिए:
सूची-I
1. अनुच्छेद 32
2. अनुच्छेद 226
3. अनुच्छेद 324
4. अनुच्छेद 22

सूची-II
क. निर्वाचन आयोग में निहित निर्वाचन की अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति
ख. निरोध के आधारों की सूचना और प्रतिनिधित्व का अधिकार
ग. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट जारी करने की शक्ति
घ. उच्च न्यायालय द्वारा मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट जारी करने की शक्ति

सही सुमेलन चुनिए:

  1. 1-ग, 2-घ, 3-क, 4-ख
  2. 1-घ, 2-ग, 3-ख, 4-क
  3. 1-ग, 2-क, 3-घ, 4-ख
  4. 1-ख, 2-ग, 3-क, 4-घ

उत्तर: 1-ग, 2-घ, 3-क, 4-ख — अनुच्छेद 32 सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट जारी करने की शक्ति देता है (1-ग)। अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय की व्यापक रिट शक्ति है, जो मौलिक और अन्य कानूनी अधिकारों के लिए है (2-घ)। अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग में निर्वाचन के अधीक्षण और नियंत्रण की शक्ति निहित करता है (3-क)। अनुच्छेद 22 निरोध के आधारों की सूचना और प्रतिनिधित्व का अधिकार देता है (4-ख)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ संविधान को साझी संपदा (Constitution as Commons) मानने की धारणा के अनुसार, नागरिकों का शांतिपूर्ण सत्याग्रह और सार्वजनिक असहमति संवैधानिक लोकतंत्र का अभिन्न अंग है। इस दावे के आलोक में, सभा और अभिव्यक्ति के अधिकार तथा सार्वजनिक व्यवस्था एवं राज्य की सुरक्षा के बीच संतुलन की संवैधानिक सीमाओं की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए। साथ ही बताइए कि निवारक निरोध और अन्य प्रतिबंधों के कथित दुरुपयोग की स्थिति में न्यायिक समीक्षा के कौन-से उपाय उपलब्ध हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की संरचना: (1) भूमिका: गांधी का सत्याग्रह (हिंद स्वराज, 1909; चंपारण 1917; नमक सत्याग्रह 1930) और अंबेडकर का संविधान सभा में 25 नवंबर 1949 का भाषण, जिसमें उन्होंने ‘अराजकता के व्याकरण’ (Grammar of Anarchy) से सावधान किया और संवैधानिक तरीकों की आवश्यकता बताई; प्रस्तावना के न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के मूल्य। (2) संवैधानिक ढांचा: अनुच्छेद 19(1)(क) (अभिव्यक्ति), 19(1)(ख) (शांतिपूर्ण सभा), 19(1)(ग) (संघ); 19(2) और 19(3) के उचित निर्बंध; अनुच्छेद 21 की प्रक्रिया द्वारा स्थापित विधि; अनुच्छेद 22 के निवारक निरोध के सुरक्षा उपाय (22(3) से 22(7)); राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 और विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) की धारा 43D(5) के अंतर्गत जमानत की कठोर शर्तें। (3) न्यायिक निर्णय: श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) में धारा 66A को अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के उल्लंघन के आधार पर रद्द किया गया और ‘उकसावे’ व ‘चर्चा’ के अंतर को स्पष्ट किया गया; अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में इंटरनेट बंदी की आनुपातिकता की समीक्षा; के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) में आनुपातिकता परीक्षण को निजता के संदर्भ में अपनाया गया; केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में मूल ढांचे का सिद्धांत। (4) निर्वाचन पक्ष: निर्वाचक नामावली की शुद्धता और मतदाता अधिकार; अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग का अधीक्षण; लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के आपत्ति और दावे की प्रक्रिया; नागरिक संगठनों द्वारा प्रक्रिया पर प्रश्न उठाने का वैध अधिकार। (5) संतुलित दृष्टिकोण: राज्य का पक्ष (सार्वजनिक व्यवस्था, हिंसा की रोकथाम, कानून का शासन) और नागरिक समाज का पक्ष (भय उत्पन्न करने वाला प्रभाव, प्रक्रिया के दुरुपयोग की आशंका, लंबी विचाराधीन निरुद्धि)। ग्रेनविल ऑस्टिन के ‘Working a Democratic Constitution’ का संदर्भ लेकर संवैधानिक नैतिकता पर निष्कर्ष। (6) निष्कर्ष: असहमति को अवैध मानना और वैध असहमति को संरक्षित करना, दोनों में अंतर; न्यायिक समीक्षा और आनुपातिकता की भूमिका; नागरिक सहभागिता के द्वारा संवैधानिक मूल्यों का सुदृढ़ीकरण।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


Related guides on our sites

No Comments

Post A Comment