ओबीसी क्रीमी लेयर: सर्वोच्च न्यायालय का 11 मार्च के फैसले पर अडिग रहना

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ओबीसी क्रीमी लेयर: सर्वोच्च न्यायालय का 11 मार्च के फैसले पर अडिग रहना

क्रीमी लेयर आकलन1993 कार्यालय ज्ञापनकेंद्र सरकार का आग्रहआय/संपत्ति परीक्षणमाता-पिता की वेतन आय और कृषि आय बाहरपदों की समतुल्यता और एक समान नीतिनिर्णय का क्रियान्वयनस्थगित नहींदो वर्ष का समय मांगालागूकेवल समक्ष पक्षकारों परनिर्णय से पहले की नियुक्तियों पर नहीं
क्रीमी लेयर आकलन

✎ क्रीमी लेयर का निर्धारण 1993 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार होगा, जिसमें वेतन और कृषि आय को आय परीक्षण से बाहर रखा गया है; यह निर्णय केवल पक्षकारों पर लागू है और पूर्व-नियुक्तियों को पुनः नहीं खोलता।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शासन, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय (आरक्षण, पिछड़ा वर्ग कल्याण, संवैधानिक प्रावधान)  |  सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र IV — नैतिकता और लोक प्रशासन में निष्पक्ष व समावेशी नीति-निर्माण
  • Prelims: क्रीमी लेयर (Creamy Layer), अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Classes – OBC), अनुच्छेद 15(4) और अनुच्छेद 16(4), इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992), 102वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2018 और अनुच्छेद 338B, 342A, सुपरन्यूमरेरी पद (Supernumerary Posts), कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के अधीन कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT), संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission – UPSC) और सिविल सेवा परीक्षा
  • Essay: सामाजिक न्याय और अवसर की समानता: आरक्षण में लक्षित लाभ बनाम पिछड़ेपन की वास्तविक पहचान, न्यायिक आदेश और प्रशासनिक क्रियान्वयन: नीति में समयसीमा, स्थिरता और पूर्वव्यापी प्रभाव का प्रश्न

त्वरित पुनरावृत्ति: क्रीमी लेयर का निर्धारण 1993 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार होगा, जिसमें वेतन और कृषि आय को आय परीक्षण से बाहर रखा गया है; यह निर्णय केवल पक्षकारों पर लागू है और पूर्व-नियुक्तियों को पुनः नहीं खोलता।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने 6 नवंबर 2026 को अपने 11 मार्च 2026 के निर्णय पर अडिग रहते हुए कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग की क्रीमी लेयर स्थिति का आकलन 1993 के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) के अनुसार होगा, जिसमें माता-पिता की वेतन आय और कृषि आय को आय/संपत्ति परीक्षण से बाहर रखा गया था। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार के उस आग्रह को स्वीकार नहीं किया, जिसमें क्रीमी लेयर के लिए पदों की समतुल्यता स्थापित करने और एक समान नीति बनाने हेतु दो वर्ष का समय माँगा गया था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सिविल सेवा परीक्षा 2025 का परिणाम 6 मार्च 2026 को घोषित हो चुका है, किंतु सेवाओं का आवंटन अभी नहीं हुआ है, इसलिए निर्णय के क्रियान्वयन को टालने का कोई उचित आधार नहीं है। अदालत ने यह भी दोहराया कि यह निर्णय केवल उसके समक्ष पक्षकारों पर लागू होगा और निर्णय से पहले हो चुकी नियुक्तियों को पुनः खोलने के लिए इसका प्रयोग नहीं होगा। यह मामला सेवा आवंटन, वरिष्ठता, प्रवेश और आरक्षण के प्रशासन पर व्यापक प्रभाव से जुड़ा है, इसलिए इसका प्रशासनिक और संवैधानिक दोनों दृष्टि से महत्व है।

पृष्ठभूमि

  • अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 15(4) और अनुच्छेद 16(4) में है, जो राज्य को सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करने की शक्ति देते हैं।
  • इंद्रा साहनी मामले (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण को वैध ठहराया, परंतु यह सिद्धांत दिया कि पिछड़े वर्गों में से सम्पन्न और उन्नत वर्ग (क्रीमी लेयर) को आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाना चाहिए।
  • भारत सरकार के कार्मिक विभाग द्वारा जारी 1993 के कार्यालय ज्ञापन में क्रीमी लेयर निर्धारण के लिए आय और संपत्ति की कसौटी तय की गई थी, जिसमें कुछ स्रोतों की आय को बाहर रखा गया था।
  • 102वें संविधान संशोधन (2018) के द्वारा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को संवैधानिक दर्जा मिला, अनुच्छेद 338B जोड़ा गया और अनुच्छेद 342A के अंतर्गत पिछड़े वर्गों की सूची तैयार करने की प्रक्रिया को राष्ट्रपति और संसद की भूमिका से जोड़ा गया।
  • संसदीय समिति (अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण) की 21वीं रिपोर्ट में भी कार्मिक विभाग द्वारा सुपरन्यूमरेरी पद सृजित करने का आश्वासन दर्ज था, जिसे मार्च 2026 के निर्णय में भी उल्लेख मिला।

क्रीमी लेयर सिद्धांत क्या है?

  • क्रीमी लेयर वह सिद्धांत है, जिसके अंतर्गत अन्य पिछड़ा वर्ग के उन सम्पन्न और सामाजिक रूप से उन्नत परिवारों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाता है, जो पिछड़े वर्ग के भीतर अपेक्षाकृत आगे बढ़ चुके हैं।
  • इसका उद्देश्य आरक्षण का लाभ उन्हीं तक पहुँचाना है, जो वास्तव में सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन से प्रभावित हैं, ताकि आरक्षण की वास्तविक लक्षित प्रकृति बनी रहे।
  • क्रीमी लेयर का निर्धारण आय, संपत्ति, व्यवसाय और सामाजिक स्थिति जैसे मानदंडों के आधार पर होता है, और इसकी आय सीमा समय-समय पर सरकारी आदेश से संशोधित की जाती है।
  • इंद्रा साहनी निर्णय के बाद यह सिद्धांत अनुच्छेद 15(4) और 16(4) की व्याख्या का अभिन्न हिस्सा बन गया है, क्योंकि समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) के साथ संतुलन आवश्यक है।
  • विवाद का एक मुख्य बिंदु यह है कि वेतनभोगी माता-पिता की आय और कृषि आय को गणना में शामिल किया जाए या नहीं, क्योंकि इससे क्रीमी लेयर की पहचान का दायरा बदल जाता है।
  • सुपरन्यूमरेरी पद वे अतिरिक्त पद हैं, जो किसी संवर्ग की स्वीकृत संख्या से परे अस्थायी रूप से सृजित किए जाते हैं, ताकि विशेष परिस्थिति में पात्र अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी जा सके, बिना नियमित रिक्तियों को प्रभावित किए।
  • निर्णय का पूर्वव्यापी प्रभाव सीमित रखना प्रशासन में स्थिरता बनाए रखने का एक सिद्धांत है, क्योंकि पहले से पूर्ण हुई भर्तियों और वरिष्ठता को पुनः खोलने से व्यापक प्रशासनिक अव्यवस्था हो सकती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
निर्णय की प्रकृति सर्वोच्च न्यायालय ने 11 मार्च 2026 के अपने निर्णय को बनाए रखा। इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Classes – OBC) की क्रीमी लेयर (Creamy Layer) स्थिति का आकलन 1993 के कार्यालय ज्ञापन के आधार पर करने को सही ठहराया गया है।
आय-परीक्षण का आधार 1993 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार क्रीमी लेयर आय-परीक्षण में माता-पिता की वेतन आय और कृषि आय को शामिल नहीं किया जाता। इससे पात्रता का दायरा सीमित रहता है।
सरकार की याचिका केंद्र सरकार ने समानता स्थापित करने और एक समान नीति या तंत्र बनाने के लिए दो वर्ष का ‘उचित समय’ माँगा था। न्यायालय ने इसे स्वीकार नहीं किया।
सिविल सेवा परीक्षा 2025 पर प्रभाव परीक्षा का परिणाम 6 मार्च 2026 को घोषित हो चुका था, पर सेवा आवंटन लंबित था। इसलिए न्यायालय ने माना कि निर्णय के क्रियान्वयन को टालने का कोई उचित आधार नहीं है।
पक्षकारों तक सीमित प्रभाव निर्णय उन्हीं पक्षकारों पर लागू होगा जो मामले में शामिल हैं। निर्णय से पहले पूर्ण हो चुकी नियुक्तियों को दोबारा नहीं खोला जाएगा।
लंबित दावों की समय-सीमा लंबित व्यक्तिगत दावों पर उनके अपने गुणों के आधार पर विचार होगा। मूल निर्णय में छह महीने की समय-सीमा थी, जिसे अब आठ सप्ताह बढ़ाया गया है।

महत्व

संवैधानिक एवं विधिक

  • क्रीमी लेयर का सिद्धांत इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) के निर्णय से आया है, जिसमें पिछड़े वर्गों के आरक्षण को वैध ठहराते हुए आरक्षण का लाभ आर्थिक रूप से संपन्न वर्गों तक सीमित रखने की बात कही गई थी।
  • इस मामले से स्पष्ट होता है कि क्रीमी लेयर की परिभाषा और उसकी व्याख्या न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आती है, और न्यायालय कार्यकारी आदेशों की संवैधानिकता जाँच सकता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख दिखाता है कि प्रशासनिक सुविधा के तर्क से समानता के मौलिक अधिकार को अनिश्चित काल तक स्थगित नहीं किया जा सकता।

सामाजिक न्याय एवं समानता

  • सामाजिक न्याय की दृष्टि से यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में सबसे वंचित पिछड़े वर्गों तक पहुँचे और संपन्न परिवारों के बच्चे इसका अनुचित लाभ न लें।
  • आय-परीक्षण में वेतन आय और कृषि आय को शामिल न करने से यह बहस उठती है कि क्या आय के वास्तविक स्रोतों का आकलन पर्याप्त रूप से हो रहा है।

प्रशासनिक एवं सेवा प्रबंधन

  • सेवा आवंटन, संवर्ग आवंटन, वरिष्ठता और पदोन्नति जैसे विषयों पर पूर्वव्यापी प्रभाव पड़ने की आशंका ने प्रशासनिक जटिलता को उजागर किया है।
  • सरकार की याचिका में कहा गया कि पूर्वव्यापी क्रियान्वयन से लाखों व्यक्तियों पर असर पड़ सकता है। इससे आरक्षण प्रशासन के व्यापक प्रभावों पर ध्यान गया है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों तक सीमित रखकर और पूर्ण हो चुकी नियुक्तियों को न छेड़कर प्रशासनिक स्थिरता और न्याय के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है।

संसदीय एवं नीतिगत आयाम

  • संसदीय स्थायी समिति (पिछड़ा वर्ग कल्याण) की 21वीं रिपोर्ट में भी विभाग की इसी स्थिति का उल्लेख था, जिससे संसदीय निगरानी की भूमिका रेखांकित होती है।
  • क्रीमी लेयर की सीमा और आय-परीक्षण के मानदंड नीति-निर्माण के स्तर पर बार-बार विचार का विषय रहे हैं, इसलिए एक समान और स्पष्ट नीति की आवश्यकता बनी रहती है।

चुनौतियाँ

1. पूर्वव्यापी प्रभाव की समस्या

  • निर्णय को पूर्वव्यापी रूप से लागू करने पर पहले से हो चुकी नियुक्तियों, वरिष्ठता और पदोन्नति में बदलाव की स्थिति बन सकती है।
  • इससे सेवा में कार्यरत अधिकारियों के हितों और विश्वास-संरक्षण के सिद्धांत के बीच टकराव उत्पन्न हो सकता है।
  • इसी कारण न्यायालय ने निर्णय को केवल पक्षकारों तक सीमित रखा है।

2. समानता के सिद्धांत और आय-मापन की कठिनाई

  • वेतन आय और कृषि आय को आय-परीक्षण से बाहर रखने पर आलोचना होती है कि इससे संपन्न परिवारों की वास्तविक आर्थिक स्थिति का सही आकलन नहीं हो पाता।
  • कृषि आय और असंगठित क्षेत्र की आय का सटीक मापन कठिन है, जिससे दस्तावेज़ों के आधार पर निर्धारण में विवाद होते हैं।
  • पिछड़े वर्गों में आर्थिक विभेद बढ़ने पर एक समान मानदंड बनाना और कठिन हो जाता है।

3. समान पद-समतुल्यता स्थापित करने की चुनौती

  • सरकार ने पदों की समतुल्यता स्थापित करने के लिए समय माँगा था, जो दिखाता है कि विभिन्न सेवाओं और पदों के बीच तुलनात्मक मानदंड अभी स्पष्ट नहीं हैं।
  • एक समान मानदंड बनाने के लिए हितधारकों से परामर्श और नीति-निर्माण की लंबी प्रक्रिया आवश्यक होती है।

4. न्यायिक निर्णय और नीति-निर्माण के बीच संतुलन

  • न्यायालय द्वारा कार्यकारी निर्णयों की व्याख्या करना और सरकार द्वारा नीति बदलने की माँग के बीच संस्थागत संतुलन बनाना आवश्यक होता है।
  • समय-सीमा बढ़ाने के बावजूद लंबित दावों का शीघ्र निस्तारण न होने पर न्याय में विलंब की समस्या बनी रहती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
पूर्वव्यापी क्रियान्वयन पहले से पूर्ण नियुक्तियों, वरिष्ठता और संवर्ग आवंटन पर प्रभाव पड़ने की आशंका है।
आय-परीक्षण की सीमाएँ वेतन और कृषि आय को बाहर रखने से संपन्न परिवारों की वास्तविक स्थिति का आकलन अधूरा रह सकता है।
प्रशासनिक जटिलता आरक्षण प्रशासन, पदोन्नति और प्रवेश प्रक्रियाओं पर व्यापक असर पड़ सकता है।
समतुल्यता का अभाव विभिन्न पदों की तुलनात्मक समतुल्यता के लिए स्पष्ट और एक समान मानदंड अभी विकसित नहीं हैं।
लंबित दावों का निस्तारण व्यक्तिगत दावों पर विलंब से न्याय प्रक्रिया धीमी होती है और अनिश्चितता बनी रहती है।

आगे की राह

  • क्रीमी लेयर के आकलन के लिए एक समान, पारदर्शी और सत्यापन-योग्य मानदंड विकसित किए जाएँ, जिनमें आय के सभी स्रोतों की स्पष्ट परिभाषा हो।
  • पदों की समतुल्यता तय करने के लिए विभागों और हितधारकों से व्यापक परामर्श कर एक मानकीकृत तंत्र बनाया जाए।
  • कार्यकारी नीति में बदलाव करते समय पूर्वव्यापी प्रभाव का मूल्यांकन पहले से किया जाए, ताकि प्रशासनिक स्थिरता और न्याय में संतुलन रहे।
  • लंबित व्यक्तिगत दावों के निस्तारण के लिए समयबद्ध तंत्र बनाया जाए, जिससे न्याय में विलंब कम हो।
  • आय-परीक्षण के आँकड़ों के संग्रह और सत्यापन के लिए प्रशासनिक डेटा की गुणवत्ता में सुधार किया जाए।
  • संसदीय समितियों की सिफारिशों पर समय पर कार्रवाई सुनिश्चित हो, ताकि नीति में निरंतरता और जवाबदेही बनी रहे।
  • सेवा आवंटन और भर्ती प्रक्रिया में लाभार्थियों को सूचना और स्पष्टता उपलब्ध कराई जाए, ताकि विवाद कम हों।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

क्रीमी लेयर (Creamy Layer) · अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Classes, OBC) · इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (Indra Sawhney v. Union of India) · अनुच्छेद 16(4) · 1993 का कार्यालय ज्ञापन · सामाजिक न्याय और समतुल्यता · अतिरिक्त पद (Supernumerary Posts) · पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective Effect) · राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for Backward Classes) · अनुच्छेद 338B · कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) · संसदीय स्थायी समिति की 21वीं रिपोर्ट

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 14: समानता एवं युक्तिसंगत वर्गीकरण का सिद्धांत
  • अनुच्छेद 15(4): सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों हेतु विशेष प्रावधान
  • अनुच्छेद 16(4): पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी पदों पर आरक्षण
  • अनुच्छेद 340: पिछड़े वर्गों की दशा की जाँच हेतु आयोग

अवधारणा प्रवाह

1993 के कार्यालय ज्ञापन के तहत क्रीमी लेयर का आय-परीक्षण वेतन और कृषि आय को बाहर रखकर किया जाता रहा।  →  11 मार्च 2026 के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने इसी मूल्यांकन को वैध ठहराया और पक्षकारों के लिए सुपरन्यूमरेरी पदों का आश्वासन दर्ज हुआ।  →  सरकार ने निर्णय के क्रियान्वयन के लिए दो वर्ष का समय माँगा, जिसे न्यायालय ने अस्वीकार किया।  →  6 नवंबर 2026 को न्यायालय ने निर्णय को बनाए रखा, सेवा आवंटन को उसी के अनुरूप करने को कहा और पूर्ण नियुक्तियों को न खोलने का स्पष्टीकरण दिया।  →  लंबित व्यक्तिगत दावों पर उनके गुणों के आधार पर विचार होगा और इसके लिए समय-सीमा आठ सप्ताह बढ़ाई गई।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. क्रीमी लेयर सिद्धांत के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसका प्रतिपादन इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने किया था।
2. यह अनुच्छेद 16(4) के अंतर्गत पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण पर लागू होता है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने पदोन्नति में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों पर इसे उसी रूप में लागू करने का निर्देश दिया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: क्रीमी लेयर की अवधारणा इंद्रा साहनी (1992) में विकसित हुई और OBC आरक्षण से उसे बाहर रखा गया। कथन 2 सही है: यह अनुच्छेद 16(4) के अंतर्गत पिछड़े वर्गों के आरक्षण का एक सीमित करने वाला सिद्धांत है। कथन 3 गलत है: जरनैल सिंह (2018) में सर्वोच्च न्यायालय ने SC/ST की पदोन्नति में क्रीमी लेयर लागू न करने का दृष्टिकोण अपनाया।

Q2. निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को 102वें संविधान संशोधन द्वारा संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
कारण (R): इस संशोधन द्वारा संविधान में अनुच्छेद 338B सम्मिलित किया गया, जो आयोग की संरचना और कार्यों से संबंधित है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
  3. (A) सही है, परंतु (R) गलत है
  4. (A) गलत है, परंतु (R) सही है

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — 102वें संविधान संशोधन (2018) द्वारा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा मिला और अनुच्छेद 338B सम्मिलित हुआ। अनुच्छेद 338B आयोग की संरचना, कर्तव्यों और शक्तियों का प्रावधान करता है, इसलिए कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:
सूची-I (संवैधानिक प्रावधान):
A. अनुच्छेद 15(4)
B. अनुच्छेद 16(4)
C. अनुच्छेद 338B
D. अनुच्छेद 342A

सूची-II (विषय):
1. राष्ट्रपति द्वारा सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की सूची अधिसूचित करने की शक्ति
2. नियुक्तियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न पाने वाले पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण
3. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की संरचना और कार्य
4. शिक्षा में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति हेतु विशेष उपबंध

सही सुमेलन का चयन कीजिए:

  1. A-2, B-1, C-3, D-4
  2. A-1, B-2, C-4, D-3
  3. A-1, B-2, C-3, D-4
  4. A-3, B-4, C-1, D-2

उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — अनुच्छेद 15(4) शिक्षा में सामाजिक-शैक्षिक पिछड़े वर्गों की उन्नति हेतु विशेष उपबंध है (4)। अनुच्छेद 16(4) नियुक्तियों में आरक्षण से संबंधित है (2)। अनुच्छेद 338B राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से संबंधित है (3)। अनुच्छेद 342A के अंतर्गत राष्ट्रपति सूची अधिसूचित करते हैं (1)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर की पहचान के लिए आय और संपत्ति की कसौटी अपनाना सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से तर्कसंगत है, परंतु इसकी व्यावहारिक कार्यप्रणाली अनेक प्रशासनिक और संवैधानिक प्रश्न खड़े करती है। इस कथन की समालोचनात्मक परीक्षा कीजिए। साथ ही बताइए कि पहले से चल रही भर्ती प्रक्रियाओं पर किसी निर्णय को पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू करने के क्या प्रशासनिक और संवैधानिक परिणाम हो सकते हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: 1. संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 15(4), 16(4), 16(4A)-16(4B) और अनुच्छेद 340 के अंतर्गत पिछड़े वर्गों की पहचान; अनुच्छेद 14 और 16(1) में समानता का सिद्धांत; अनुच्छेद 335 में प्रशासनिक दक्षता का संतुलन; अनुच्छेद 338B और 342A (102वाँ संशोधन, 2018) द्वारा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग और सूची-निर्धारण की व्यवस्था।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: काका कालेलकर आयोग (1953) और मंडल आयोग (1980 में रिपोर्ट) की सिफारिशें; इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) में 27 प्रतिशत OBC आरक्षण की वैधता और क्रीमी लेयर का अपवर्जन; 1993 के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के कार्यालय ज्ञापन में आय-संपत्ति कसौटी और कुछ आय स्रोतों (वेतन व कृषि आय) के अपवर्जन पर विवाद।
3. न्यायिक विकास: अशोक कुमार ठाकुर (2008) में क्रीमी लेयर सिद्धांत की संवैधानिक वैधता; जरनैल सिंह (2018) में SC/ST की पदोन्नति में क्रीमी लेयर लागू न करने का दृष्टिकोण; 11 मार्च 2026 का निर्णय, जिसमें 1993 के ज्ञापन के अनुसार मूल्यांकन को सही ठहराया गया और सरकार की दो वर्ष की समय-सीमा की माँग अस्वीकार की गई।
4. समालोचनात्मक विश्लेषण: (क) आय को सामाजिक पिछड़ेपन का प्रॉक्सी मानने की सीमाएँ; (ख) वेतनभोगी और कृषि आय में असमानता का प्रश्न; (ग) मूल्यांकन में समतुल्यता (equivalence of posts) का कठिन कार्य; (घ) संसदीय स्थायी समिति (OBC कल्याण) की 21वीं रिपोर्ट में DoPT के आश्वासन का महत्व।
5. परिणाम-प्रश्न: पूर्वव्यापी प्रभाव से भर्ती, सेवा-आवंटन, cadre, वरिष्ठता और प्रवेश पर पड़ने वाला असर; अनुच्छेद 141 के अंतर्गत निर्णय की बाध्यकारी प्रकृति और यह स्पष्टीकरण कि निर्णय केवल पक्षकारों पर लागू होगा और पूर्व-नियुक्तियाँ पुनः नहीं खुलेंगी; अतिरिक्त पद (supernumerary posts) सृजन का प्रशासनिक औचित्य; लंबित दावों के गुण-दोष पर निर्णय हेतु आठ सप्ताह की विस्तारित अवधि।
6. संतुलित निष्कर्ष: सामाजिक न्याय (वास्तविक पिछड़ेपन तक लाभ) बनाम विश्वास-संरक्षण व प्रशासनिक स्थिरता; सुझाव के रूप में नियमित, साक्ष्य-आधारित और पारदर्शी मानदंड तथा रोहिणी आयोग (उप-वर्गीकरण) जैसी पहल का उल्लेख; न्यायिक निर्णय और विधायी-कार्यकारी नीति के बीच संतुलन।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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