15 Oct उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव: इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, जानें प्रधान पद के नियम

✎ पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल पाँच वर्ष है (अनुच्छेद 243E), भंग होने पर निर्वाचन छह माह के भीतर अनिवार्य है (अनुच्छेद 243U), और निर्वाचन का संचालन राज्य निर्वाचन आयोग करता है (अनुच्छेद 243K)।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — Polity and Governance (पंचायती राज संस्थाएँ, 73वाँ संविधान संशोधन, राज्य निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका की भूमिका)
- Prelims: अनुच्छेद 243E (पंचायतों का कार्यकाल पाँच वर्ष), अनुच्छेद 243U (पंचायतों का कार्यकाल तथा भंग होने पर छह माह में निर्वाचन), अनुच्छेद 243K (राज्य निर्वाचन आयोग), अनुच्छेद 243O (निर्वाचन विषयों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक), अनुच्छेद 243D (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं हेतु आरक्षण), अनुच्छेद 243B (ग्राम सभा का गठन), ग्यारहवीं अनुसूची (पंचायतों के 29 विषय), अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता)
- Essay: लोकतंत्र की जड़ें: समय पर निर्वाचन और स्थानीय स्वशासन की वैधता, संवैधानिक दायित्व के पालन में न्यायपालिका और कार्यपालिका का संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल पाँच वर्ष है (अनुच्छेद 243E), भंग होने पर निर्वाचन छह माह के भीतर अनिवार्य है (अनुच्छेद 243U), और निर्वाचन का संचालन राज्य निर्वाचन आयोग करता है (अनुच्छेद 243K)।
यह खबर चर्चा में क्यों?
उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद नए निर्वाचन समय पर न होने को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी। प्रयागराज के इम्तियाज हुसैन और अन्य याचिकाकर्ताओं ने समय पर चुनाव कराने की मांग की। न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने राज्य सरकार को तीन माह के भीतर ग्राम पंचायत चुनाव कराने का निर्देश दिया। साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि नए चुनाव संपन्न होने तक निवर्तमान ग्राम प्रधान प्रशासक के रूप में अपने पदों पर कार्य करते रहेंगे। इस निर्णय से पंचायती राज संस्थाओं के कार्यकाल, प्रशासकों की नियुक्ति और निर्वाचन की संवैधानिक समय-सीमा से जुड़े प्रश्न एक साथ सामने आए हैं। समाचार में ग्राम प्रधान पद के लिए न्यूनतम आयु, निवास और बकाया भुगतान जैसी पात्रता शर्तों तथा प्रशासकों के मानदेय से जुड़े नियमों का भी उल्लेख है, जिन्हें परीक्षा की दृष्टि से समझना उपयोगी है।
पृष्ठभूमि
- 73वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा मिला और भाग IX जोड़ा गया। इसके अंतर्गत पंचायतों का गठन, कार्यकाल, आरक्षण तथा निर्वाचन की व्यवस्था की गई।
- अनुच्छेद 243E के अनुसार पंचायत का कार्यकाल पाँच वर्ष है। अनुच्छेद 243U के अनुसार पंचायत के भंग होने की स्थिति में छह माह के भीतर नए निर्वाचन पूरे होने चाहिए।
- पंचायत निर्वाचन की देखरेख राज्य निर्वाचन आयोग करता है, जिसका प्रावधान अनुच्छेद 243K में है। राज्य निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और कार्यकाल की रक्षा के लिए भी संवैधानिक उपाय किए गए हैं।
- उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव, प्रशासक की नियुक्ति और कार्यकाल से जुड़े मामले समय-समय पर उच्च न्यायालय के समक्ष आते रहे हैं। इससे संवैधानिक समय-सीमा और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन का प्रश्न बार-बार उठता है।
- अनुच्छेद 243O के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन या आवंटन से जुड़े विषयों में न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकते, और निर्वाचन संबंधी विवादों के लिए निर्वाचन याचिका का मार्ग निर्धारित है। फिर भी निर्वाचन कराने के संवैधानिक दायित्व को लागू करने हेतु रिट याचिकाएँ दायर होती रही हैं।
ग्राम प्रधान निर्वाचन और पंचायती राज संस्थाओं की व्यवस्था क्या है?
- पंचायती राज संस्थाएँ त्रिस्तरीय हैं: ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर), क्षेत्र पंचायत (विकास खंड स्तर) और जिला पंचायत (जिला स्तर)। ग्राम पंचायत का प्रमुख निर्वाचित प्रधान होता है।
- संविधान के अनुच्छेद 243B के अनुसार ग्राम सभा गाँव के मतदाताओं से बनती है और वह ग्राम पंचायत के कार्यों की निगरानी में भूमिका निभाती है।
- अनुच्छेद 243D के अंतर्गत पंचायतों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए सीटों और पदों का आरक्षण किया जाता है। महिलाओं के लिए आरक्षण कम से कम एक-तिहाई है।
- उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधान पद के प्रत्याशी के लिए सामान्यतः न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित है। उम्मीदवार का संबंधित ग्राम पंचायत का निवासी होना आवश्यक माना गया है।
- पंचायत के पास सरकारी बकाया, जैसे कर या ऋण, होने की स्थिति में संबंधित प्रावधानों के अनुसार पात्रता पर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए चुनाव लड़ने से पहले दस्तावेज़ी पात्रता की जाँच आवश्यक होती है।
- पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने पर नए निर्वाचन होने तक राज्य सरकार प्रशासक नियुक्त कर सकती है। प्रशासक की नियुक्ति अस्थायी व्यवस्था है और उसे निर्वाचित प्रतिनिधि का दर्जा प्राप्त नहीं होता।
- ग्यारहवीं अनुसूची में पंचायतों को सौंपे जाने वाले 29 विषय सूचीबद्ध हैं, जिनमें आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय से जुड़े कार्य शामिल हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| निर्वाचित कार्यकाल की समाप्ति | ग्राम पंचायत (Gram Panchayat) का कार्यकाल पाँच वर्ष होता है। मई में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल पूरा हुआ और उसके बाद निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक बनाया गया। |
| न्यायालय का निर्देश | इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर ग्राम पंचायत चुनाव कराने का निर्देश दिया। नए चुनाव संपन्न होने तक प्रशासक अपने पदों पर कार्य करते रहेंगे। |
| प्रशासक का दर्जा | प्रशासकों को ग्राम प्रधान का दर्जा नहीं दिया जा सकता, इसलिए उन्हें प्रधान के समान मानदेय का अधिकार नहीं है। यह व्यवस्था निर्वाचित और नियुक्त पदधारियों के बीच का अंतर स्पष्ट करती है। |
| प्रधानी लड़ने की पात्रता | न्यूनतम आयु 21 वर्ष, संबंधित ग्राम पंचायत का निवासी होना और आवश्यक होने पर बकाया भुगतान जमा करना। जाति प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज़ भी जरूरी हो सकते हैं। |
| त्रि-स्तरीय पंचायत ढाँचा | उत्तर प्रदेश में 58213 ग्राम पंचायत, 827 क्षेत्र पंचायत और 75 जिला पंचायत हैं। तीनों स्तरों पर मानदेय की दरें अलग-अलग निर्धारित हैं। स्रोत के अनुसार ग्राम प्रधान को 5000 रुपये, ब्लॉक प्रमुख को 11300 रुपये और जिला पंचायत अध्यक्ष को 15500 रुपये प्रति माह मानदेय का प्रावधान है। |
महत्व
संवैधानिक महत्व
- 73वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला। इसके तहत संविधान में भाग IX और ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गई।
- अनुच्छेद 243E के अनुसार पंचायत का कार्यकाल पाँच वर्ष है और निर्धारित अवधि से पहले चुनाव कराना संवैधानिक दायित्व है।
- यदि पंचायत समय से पहले भंग हो जाए, तो अनुच्छेद 243E(3) के अनुसार छह महीने के भीतर चुनाव पूरे होने चाहिए। इसी प्रावधान के आधार पर समय-सीमा की बहस को समझा जा सकता है।
प्रशासनिक निरंतरता
- निर्वाचित निकाय न होने की स्थिति में प्रशासक की नियुक्ति से शासन में शून्यता नहीं आती और विकास कार्य तथा सेवा वितरण चलता रहता है।
- प्रशासक व्यवस्था अस्थायी होती है, इसलिए उसकी शक्तियों, दायित्वों और सीमाओं की स्पष्टता प्रशासनिक दक्षता के लिए आवश्यक है।
न्यायिक समीक्षा और विधिक पहलू
- नागरिकों के समय पर चुनाव के अधिकार से जुड़े मामलों में उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकारिता का प्रयोग करता है।
- अनुच्छेद 243O चुनाव संबंधी विवादों में न्यायालयीन हस्तक्षेप को सीमित करता है। इसलिए न्यायालय का हस्तक्षेप प्रायः चुनाव की समय-सीमा और प्रशासनिक लोप जैसे विषयों तक सीमित रहता है।
लोकतांत्रिक जवाबदेही और सहभागिता
- ग्राम स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधि सीधे मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी होते हैं। समय पर चुनाव इस जवाबदेही की कड़ी को बनाए रखते हैं।
- प्रधानी के लिए पात्रता नियम (आयु, निवास, बकाया भुगतान) स्थानीय नेतृत्व की न्यूनतम गुणवत्ता और प्रशासनिक जिम्मेदारी सुनिश्चित करते हैं।
चुनौतियाँ
1. प्रशासक व्यवस्था में जवाबदेही की कमी
- प्रशासक जनता द्वारा निर्वाचित नहीं होते, इसलिए उनकी जनता के प्रति प्रत्यक्ष जवाबदेही कमजोर रहती है।
- लंबे समय तक प्रशासक व्यवस्था बने रहने से स्थानीय निर्णयों की वैधता और जनभागीदारी पर प्रश्न उठते हैं।
यूपीएससी लिंक: शासन में जवाबदेही और पारदर्शिता (GS-2)
2. मानदेय और आर्थिक असमानता
- प्रशासकों को मानदेय न मिलने से निवर्तमान प्रधानों की आर्थिक स्थिति और कार्य-प्रेरणा प्रभावित हो सकती है।
- पंचायत के विभिन्न स्तरों पर मानदेय की अलग दरें होने से संस्थागत समानता और वित्तीय व्यवस्था की स्पष्टता पर भी विचार आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: स्थानीय शासन की वित्तीय व्यवस्था (GS-2)
3. चुनाव की समय-सीमा और प्रशासनिक तैयारी
- तीन महीने की समय-सीमा में मतदाता सूची, आरक्षण, प्रशासनिक तैयारी और चुनाव कार्यक्रम पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
- राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार के बीच समन्वय की कमी से चुनाव में देरी हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: राज्य निर्वाचन आयोग की भूमिका और निर्वाचन प्रबंधन (GS-2)
4. पात्रता दस्तावेज़ों की प्रशासनिक बाधाएँ
- जाति प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज़ों के लिए ग्रामीण उम्मीदवारों को राजस्व कर्मचारियों के बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं।
- दस्तावेज़ी प्रक्रिया में देरी से वास्तविक पात्र उम्मीदवार भी चुनाव प्रक्रिया से वंचित हो सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: सेवा वितरण में सुशासन और ई-गवर्नेंस की भूमिका (GS-2)
5. न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा
- अनुच्छेद 243O के कारण चुनाव प्रक्रिया में न्यायालय का हस्तक्षेप सीमित है, जबकि समय-सीमा से जुड़े निर्देश संवैधानिक दायित्वों की याद दिलाते हैं।
- न्यायपालिका और कार्यपालिका की भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतांत्रिक शासन की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: न्यायपालिका और कार्यपालिका के संबंध (GS-2)
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| प्रशासक की जवाबदेही | निर्वाचित प्रतिनिधि की तुलना में जनता के प्रति सीधी जवाबदेही कमजोर रहती है। |
| मानदेय का अभाव | प्रशासकों को मानदेय न मिलने से आर्थिक असंतोष और कार्य-प्रेरणा में कमी आ सकती है। |
| समय-सीमा का दबाव | तीन महीने में चुनाव पूरा करने के लिए तैयारी का समय सीमित रहता है। |
| दस्तावेज़ी बाधाएँ | जाति प्रमाण पत्र आदि के लिए प्रशासनिक देरी से पात्र उम्मीदवार वंचित हो सकते हैं। |
| न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा | अनुच्छेद 243O के कारण चुनाव विवादों में न्यायालय की भूमिका सीमित रहती है। |
आगे की राह
- चुनाव की समय-सीमा के भीतर मतदाता सूची, आरक्षण, अधिसूचना और मतदान कार्यक्रम का समयबद्ध खाका तैयार करना।
- राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार के बीच नियमित समन्वय और स्पष्ट जिम्मेदारी-विभाजन सुनिश्चित करना।
- प्रशासक की शक्तियों, दायित्वों और कार्यावधि की विधिक परिभाषा स्पष्ट करना, ताकि संक्रमण काल में मनमानी की आशंका न रहे।
- संक्रमण काल में प्रशासकों के मानदेय और वित्तीय व्यवस्था पर एकरूप और पारदर्शी नीति बनाना।
- जाति प्रमाण पत्र जैसे पात्रता दस्तावेज़ों के लिए प्रक्रिया को सरल और समयबद्ध बनाना, ताकि ग्रामीण उम्मीदवारों को अनावश्यक कठिनाई न हो।
- प्रधानी उम्मीदवारों के लिए चुनाव व्यय के ब्योरे और निर्धारित नियमों की जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध कराना।
- ग्राम स्तर पर मतदाता जागरूकता अभियान चलाकर भागीदारी बढ़ाना और चुनाव की विश्वसनीयता को मजबूत करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अनुच्छेद 243-E (पाँच वर्ष का कार्यकाल और विघटन की स्थिति) · अनुच्छेद 243-K और 243-ZA (राज्य निर्वाचन आयोग) · अनुच्छेद 243-O (निर्वाचन मामलों में न्यायालयीय हस्तक्षेप पर रोक) · अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता) · 73वाँ संविधान संशोधन, 1992 (73rd Constitutional Amendment) · लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण और स्थानीय स्वशासन · प्रशासक की नियुक्ति और संवैधानिक निरंतरता · उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 (Uttar Pradesh Panchayat Raj Act, 1947) · बलवंत राय मेहता समिति (Balwant Rai Mehta Committee) · एल.एम. सिंघवी समिति (L.M. Singhvi Committee) · पंचायती राज संस्थाओं में वित्तीय स्वायत्तता और राज्य वित्त आयोग
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 243E — पंचायत का पाँच वर्ष का कार्यकाल और समय पर चुनाव
- अनुच्छेद 243K — राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा पंचायत चुनाव का अधीक्षण
- अनुच्छेद 243O — चुनाव विवादों में न्यायालयीन हस्तक्षेप पर सीमा
- अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता
अवधारणा प्रवाह
पाँच वर्ष के निर्वाचित कार्यकाल की समाप्ति (मई) से पंचायत में निर्वाचित व्यवस्था का अंत → नए चुनाव से पहले निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में नियुक्ति → प्रशासक को ग्राम प्रधान का दर्जा न होने से मानदेय का अधिकार नहीं → समय पर चुनाव की मांग के साथ इम्तियाज हुसैन और अन्य की याचिका पर उच्च न्यायालय में सुनवाई → न्यायालय द्वारा राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर चुनाव कराने का निर्देश → चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक प्रशासक व्यवस्था के माध्यम से शासन की निरंतरता → नए निर्वाचित प्रधानों के कार्यभार ग्रहण के साथ सामान्य पंचायत व्यवस्था की बहाली
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए, जो पंचायती राज संस्थाओं से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों से जुड़े हैं:
1. ग्राम पंचायत का कार्यकाल पाँच वर्ष होता है, और उसका पहला अधिवेशन होने की तिथि से यह अवधि गिनी जाती है।
2. संविधान के अनुच्छेद 243-O के अनुसार पंचायतों के निर्वाचन से जुड़े मामलों में न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकते, और ऐसे विवाद निर्वाचन याचिका के माध्यम से ही उठाए जा सकते हैं।
3. विघटित पंचायत के स्थान पर नया निर्वाचन कराने के लिए भारत के निर्वाचन आयोग की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 243-E के अनुसार पंचायत का कार्यकाल पाँच वर्ष है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 243-O निर्वाचन मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप को सीमित करता है, और निर्वाचन विवाद निर्वाचन याचिका द्वारा ही उठते हैं। कथन 3 गलत है: विघटित पंचायत के पुनर्गठन के लिए निर्वाचन की प्रक्रिया राज्य निर्वाचन आयोग के अधीक्षण में होती है, इसके लिए केंद्रीय निर्वाचन आयोग की स्वीकृति आवश्यक नहीं है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों को ध्यान से पढ़िए:
अभिकथन (A): यदि किसी पंचायत का कार्यकाल पूरा होने से पहले उसे विघटित किया जाता है, तो संविधान के अनुसार विघटन की तिथि से छह मास के भीतर नए निर्वाचन पूरे होने चाहिए।
कारण (R): संविधान में यह सीमा इसलिए रखी गई है ताकि स्थानीय स्वशासन की लोकतांत्रिक निरंतरता बनी रहे और शासन लंबे समय तक बिना निर्वाचित प्रतिनिधियों के न चले।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, लेकिन (R) गलत है।
- (A) गलत है, लेकिन (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 243-E(2) के अनुसार विघटित पंचायत के लिए निर्वाचन विघटन की तिथि से छह मास के भीतर पूरा होना चाहिए, इसलिए (A) सही है। यह प्रावधान स्थानीय स्वशासन की निरंतरता सुनिश्चित करता है, अतः (R) (A) की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित समितियों को उनकी प्रमुख सिफारिशों से सुमेलित कीजिए:
सूची-I (समिति):
A. बलवंत राय मेहता समिति (1957)
B. अशोक मेहता समिति (1978)
C. एल.एम. सिंघवी समिति (1986)
सूची-II (सिफारिश):
1. पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता देना
2. त्रि-स्तरीय ढाँचा: ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद
3. द्वि-स्तरीय ढाँचा: जिला परिषद और मंडल पंचायत
सही सुमेलन चुनिए:
- A-2, B-3, C-1
- A-3, B-2, C-1
- A-1, B-2, C-3
- A-2, B-1, C-3
उत्तर: A-2, B-3, C-1 — बलवंत राय मेहता समिति ने त्रि-स्तरीय ढाँचे (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद) की सिफारिश की। अशोक मेहता समिति ने द्वि-स्तरीय ढाँचे (जिला परिषद और मंडल पंचायत) का सुझाव दिया। एल.एम. सिंघवी समिति ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता देने की सिफारिश की, जिसके परिणामस्वरूप 73वाँ संशोधन आया।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में पंचायती राज संस्थाओं को संविधान के 73वें संशोधन द्वारा संवैधानिक संरक्षण दिया गया है और अनुच्छेद 243-E के अंतर्गत उनका कार्यकाल पाँच वर्ष निर्धारित है। फिर भी कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचन में विलंब और निर्वाचित प्रतिनिधियों के स्थान पर प्रशासकों की नियुक्ति जैसी स्थितियाँ बार-बार सामने आती हैं। इस संदर्भ में संवैधानिक ढाँचे की सीमाओं का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि उच्च न्यायालय द्वारा निर्वाचन के लिए समय-सीमा तय करने से स्थानीय स्वशासन की लोकतांत्रिक निरंतरता पर क्या प्रभाव पड़ता है। (15 Marks)
रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
1. भूमिका: 73वाँ संविधान संशोधन, 1992 द्वारा भाग IX (अनुच्छेद 243 से 243-O) जोड़ा गया; 11वीं अनुसूची में 29 विषय। बलवंत राय मेहता समिति (1957) से लेकर सिंघवी समिति (1986) तक की पृष्ठभूमि का उल्लेख।
2. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 243-E(1) के अनुसार पाँच वर्ष का कार्यकाल; अनुच्छेद 243-E(2) के अनुसार विघटन की स्थिति में विघटन की तिथि से छह मास के भीतर निर्वाचन; अनुच्छेद 243-K के अंतर्गत राज्यपाल द्वारा राज्य निर्वाचन आयोग की नियुक्ति; अनुच्छेद 243-ZA के अंतर्गत निर्वाचन के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का दायित्व राज्य निर्वाचन आयोग का; अनुच्छेद 243-D में आरक्षण (SC, ST, महिलाओं के लिए एक-तिहाई)।
3. न्यायिक दृष्टिकोण: अनुच्छेद 243-O द्वारा निर्वाचन मामलों में न्यायालयीय हस्तक्षेप पर सीमा, परंतु अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता; नगरपालिका से संबंधित अनुच्छेद 243-ZG पर किशन सिंह तोमर वाद (2006) में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय, जिससे निर्वाचन-पूर्व और निर्वाचन-संबंधी मामलों का अंतर स्पष्ट हुआ। समय-सीमा के आदेश को संवैधानिक दायित्व की पूर्ति के रूप में देखना।
4. प्रशासक व्यवस्था की समालोचना: निर्वाचित प्रतिनिधियों के स्थान पर प्रशासक की नियुक्ति से जवाबदेही और लोकतांत्रिक वैधता पर प्रश्न; मानदेय और दर्जे से जुड़े विवाद; उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 के प्रावधानों की भूमिका।
5. वित्तीय और प्रशासनिक पक्ष: अनुच्छेद 243-I के अंतर्गत राज्य वित्त आयोग; पंचायतों की वित्तीय स्वायत्तता पर प्रभाव।
6. संतुलित दृष्टिकोण: एक ओर प्रशासनिक निरंतरता और विधि-व्यवस्था हेतु प्रशासक का तर्क; दूसरी ओर लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के लिए नियमित निर्वाचन की अनिवार्यता। निष्कर्ष में राज्य निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता और समयबद्ध निर्वाचन को सुदृढ़ करने के सुझाव।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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